लोक संस्कृति समुदाय की स्मृति के रूप में

राजस्थान की लोक संस्कृति को समुदाय की जीवित स्मृति के रूप में पढ़ना चाहिए। इसमें मौखिक वीरगाथाएं, स्थानीय देवस्थान, मेले, गीत, नृत्य, वेशभूषा, आभूषण और पूजा से जुड़ी लोक-प्रस्तुतियां साथ-साथ चलती हैं। यह केवल मनोरंजन नहीं है। गांव के जीवन में एक ही अवसर पर पूजा, व्यापार, विवाह की रस्में, पशुओं की खरीद-बिक्री, संगीत और कुल की पहचान—सब जुड़े हो सकते हैं। दरबारी, पशुपालक, जनजातीय और नगरीय परंपराओं को अलग-अलग खानों में नहीं, आपस में जोड़कर पढ़ें। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के लिए हर लोक रूप को उसके क्षेत्र, समुदाय, लोकदेवता, त्योहार या प्रदर्शन के अवसर से जोड़कर याद करें।

इस विषय को समझने का सबसे अच्छा आधार लोकदेवताओं की परंपरा है। पंचपीर में पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, मेहाजी मांगलिया और हरभूजी आते हैं। पाबूजी कोलू और फलोदी-जोधपुर क्षेत्र से जुड़े हैं और ऊंट तथा पशुधन के रक्षक माने जाते हैं, खासकर रैबारी और नायक समुदायों में। गोगाजी ददरेवा, चूरू, गोगामेड़ी, हनुमानगढ़, सर्प-पूजा और जाहर पीर नाम से जुड़े हैं। रामदेवजी रूणीचा या रामदेवरा, जैसलमेर, समानता और साझा हिंदू-मुस्लिम भक्ति से जुड़े हैं। तेजाजी खर्नाल, नागौर तथा पशुओं और सर्पदंश से रक्षा की मान्यता से जुड़े हैं। हरभूजी फलोदी के पास बेंगटी और पशुओं की रक्षा से जुड़े हैं।

लोकदेवी पूजा भी संस्कृति का महत्वपूर्ण आधार है। देशनोक की करणी माता, सीकर में रेवासा के पास जीण माता मंदिर, करौली की कैला देवी, आमेर की शिला देवी और जैसलमेर की तनोट माता को मंदिरों, मेलों, राजपरिवारों या समुदायों से संबंध और तीर्थ मार्गों के ज़रिए याद रखा जाता है।

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