राजस्थान का इतिहास (8वीं से 18वीं शताब्दी) — राजवंश और शासक
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गुर्जर-प्रतिहार और आरंभिक गुहिल आधार
8वीं से 10वीं शताब्दी में राजस्थान की मध्यकालीन राजनीति का आरंभिक स्वरूप बना। गुर्जर-प्रतिहारों ने पश्चिमी राजस्थान, मालवा और कन्नौज को जोड़ा, इसलिए उन्हें 712 में सिंध पर अरब अधिकार के बाद सीमांत रक्षा, पाल और राष्ट्रकूटों के साथ त्रिपक्षीय संघर्ष तथा ओसियां-अबानेरी क्षेत्र के मंदिर संरक्षण से याद करना चाहिए। नागभट्ट प्रथम पश्चिमी रक्षा से, वत्सराज कन्नौज के संघर्ष से और लगभग 836 से 885 तक शासन करने वाले मिहिर भोज प्रतिहार सत्ता के उत्कर्ष तथा आदिवाराह सिक्कों से जुड़े हैं। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में प्रतिहारों को केवल राजस्थान का स्थानीय राजवंश न मानें; वे उत्तर भारत की बड़ी शक्ति थे। उनका राजस्थान वाला क्षेत्र इसलिए महत्त्वपूर्ण था क्योंकि वह मरुस्थलीय मार्गों, मालवा और गंगा के मैदान को जोड़ता था। ओसियां में 8वीं से 11वीं शताब्दी के जैन और वैष्णव मंदिर मिलते हैं, जबकि आभानेरी का हर्षत माता मंदिर इसी व्यापक कला-परंपरा में आता है। इसी पृष्ठभूमि के साथ आरंभिक गुहिल वंश को रखें। बप्पा रावल 734 की चित्तौड़ परंपरा और नागदा-आहड़ क्षेत्र से जुड़े हैं, जिससे मेवाड़ की आरंभिक वंश-परंपरा सामने आती है। प्रतिहारों को साम्राज्य और सीमांत रक्षा से, जबकि गुहिलों को मेवाड़ के आरंभिक वंश और आगे के सिसोदिया शासन से जोड़कर याद रखें।
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