मुख्य तथ्य

  • पंचपीर मारवाड़ के 5 प्रमुख लोक देवताओं—पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, हरभूजी और मेहाजी मांगलिया—का समूह है;
  • दादू दयाल (1544–1603 ई.) ने दादू पंथ की स्थापना की। उनका जन्म अहमदाबाद में हुआ, वे नागौर जिले के नरैना में बसे और लगभग 5,000 पदों वाली दादू वाणी से जु...
  • मीराबाई (लगभग 1498–1547 ई.) नागौर के मेड़ता और कृष्ण-भक्ति से जुड़ी राजस्थान की प्रमुख सगुण भक्ति संत हैं; परंपरा में अनेक भजन उनके नाम से जुड़े हैं।

मुख्य बिंदु

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    पंचपीर मारवाड़ के 5 प्रमुख लोक देवताओं—पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, हरभूजी और मेहाजी मांगलिया—का समूह है; इनकी उपासना मौखिक महाकाव्यों, मेलों और स्थानीय देवस्थलों से जुड़ी है।

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    रामदेवजी जैसलमेर में पोकरण के पास रुणिचा या रामदेवरा से जुड़े हैं। हिंदू और अनेक मुसलमान उनका सम्मान करते हैं, इसलिए वे सामाजिक समानता और साझा भक्ति का महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।

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    दादू दयाल (1544–1603 ई.) ने दादू पंथ की स्थापना की। उनका जन्म अहमदाबाद में हुआ, वे नागौर जिले के नरैना में बसे और लगभग 5,000 पदों वाली दादू वाणी से जुड़े हैं।

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    मीराबाई (लगभग 1498–1547 ई.) नागौर के मेड़ता और कृष्ण-भक्ति से जुड़ी राजस्थान की प्रमुख सगुण भक्ति संत हैं; परंपरा में अनेक भजन उनके नाम से जुड़े हैं।

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    ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने आरंभिक मध्यकाल में अजमेर को चिश्ती परंपरा का प्रमुख केंद्र बनाया। अजमेर दरगाह और रजब में होने वाला उर्स साझा धार्मिक संस्कृति के प्रमुख प्रतीक हैं।

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    राजस्थानी भक्ति साहित्य भजन, पद, वाणी और फड़ गायन जैसी लोकभाषाई विधाओं से विकसित हुआ; इसमें राजस्थानी, ब्रज भाषा, हिंदी और संबंधित क्षेत्रीय बोलियों का प्रयोग हुआ।

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    दिलवाड़ा और रणकपुर राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध जैन मंदिर-स्थल हैं; जैन समुदायों ने पांडुलिपि-संरक्षण, शाकाहारी संस्कृति और व्यापारी संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

RSSB की वस्तुनिष्ठ परीक्षा के लिए विषय का दायरा

इस विषय को लंबे निबंध की तरह नहीं, बल्कि संस्कृति से जुड़ी तथ्यात्मक इकाई के रूप में पढ़ें। RSSB की वस्तुनिष्ठ परीक्षाओं में नाम, स्थान, संप्रदाय, ग्रंथ, मेले, धार्मिक धाराएँ और समुदायों से संबंध पूछे जाते हैं। इसलिए हर व्यक्ति को एक स्थान और एक योगदान से जोड़कर याद रखें—दादू दयाल को नरैना और दादू पंथ से, मीराबाई को कृष्ण-भक्ति और भजनों से, रामदेवजी को रामदेवरा और हिंदू-मुस्लिम भक्ति से तथा ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती को अजमेर और चिश्ती परंपरा से।

यह विषय राजस्थानी साहित्य और बोलियों में हुई अभिव्यक्ति से भी जुड़ा है। अनेक संतों ने अभिजात संस्कृत में रचना नहीं की। उनके विचार राजस्थानी, ब्रज भाषा, हिंदी, गुजराती भक्ति परंपरा, मेवाती-हिंदी परंपरा और मौखिक प्रस्तुतियों के ज़रिए फैले। इसलिए भाषा भी परीक्षा का महत्वपूर्ण बिंदु है—संत साहित्य, लोक महाकाव्य और फड़ गायन ने धार्मिक विचारों को आम समुदायों तक पहुँचाया।

इसे इस तरह याद रखें: RSSB में व्यक्ति, स्थान, संप्रदाय, ग्रंथ और सामाजिक संदेश का सही मिलान अधिक उपयोगी होता है।

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