राजस्थान के प्राकृतिक संसाधन, कृषि, खनिज, सिंचाई परियोजनाएँ और वन्यजीव
मुख्य तथ्य
- 2024-25 में राज्य के कुल प्रतिवेदित क्षेत्र का 53.02 प्रतिशत भाग शुद्ध बोया गया क्षेत्र था, जो खेती के बड़े फैलाव को दिखाता है।
- 2023-24 में राजस्थान बाजरा उत्पादन में प्रथम था और राष्ट्रीय उत्पादन में 41.34 प्रतिशत योगदान देता था।
- 2023-24 में राजस्थान राई और सरसों में प्रथम था और राष्ट्रीय योगदान 43.43 प्रतिशत था।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 1 जुलाई 2015 को शुरू हुई; राजस्थान में जलागम, बूँद-बूँद और फुहार सिंचाई इसका महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं।
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना खरीफ 2016 से लागू है; खरीफ खाद्यान्न और तिलहन पर किसान प्रीमियम 2 प्रतिशत, रबी पर 1.5 प्रतिशत और वार्षिक वाणिज्यिक या बागव...
मुख्य बिंदु
- 1
राजस्थान में कृषि दस कृषि-जलवायु क्षेत्रों में फैली है; इसलिए राज्य की खेती को केवल मरुस्थलीय खेती मानना गलत है।
- 2
2024-25 में राज्य के कुल प्रतिवेदित क्षेत्र का 53.02 प्रतिशत भाग शुद्ध बोया गया क्षेत्र था, जो खेती के बड़े फैलाव को दिखाता है।
- 3
2023-24 में राजस्थान बाजरा उत्पादन में प्रथम था और राष्ट्रीय उत्पादन में 41.34 प्रतिशत योगदान देता था।
- 4
2023-24 में राजस्थान राई और सरसों में प्रथम था और राष्ट्रीय योगदान 43.43 प्रतिशत था।
- 5
ग्वार, जीरा, धनिया, इसबगोल और मेथी जैसी फसलें शुष्क क्षेत्रों को मंडी, प्रसंस्करण और निर्यात से जोड़ती हैं।
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प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 1 जुलाई 2015 को शुरू हुई; राजस्थान में जलागम, बूँद-बूँद और फुहार सिंचाई इसका महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं।
- 7
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना खरीफ 2016 से लागू है; खरीफ खाद्यान्न और तिलहन पर किसान प्रीमियम 2 प्रतिशत, रबी पर 1.5 प्रतिशत और वार्षिक वाणिज्यिक या बागवानी फसलों पर 5 प्रतिशत है।
- 8
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, काज़री जोधपुर, 1952 में मरुस्थलीय वनीकरण केंद्र के रूप में शुरू हुआ और 1959 में केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान बना।
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राजस्थान में कृषि-जलवायु क्षेत्र फसल पद्धति को कैसे तय करते हैं?
राजस्थान में कृषि-जलवायु क्षेत्र वर्षा, मिट्टी, सिंचाई और धरातल के अंतर के आधार पर फसल पद्धति तय करते हैं, इसलिए पश्चिमी शुष्क जिलों और हाड़ौती जैसे नम क्षेत्रों की खेती अलग दिखती है। राजस्थान सरकार के कृषि-जलवायु क्षेत्र अवलोकन के अनुसार शुष्क पश्चिमी मैदान का कुल क्षेत्र 47.4 लाख हेक्टेयर है। राजस्थान की कृषि जलवायु, मिट्टी, वर्षा, सिंचाई और धरातल के अंतर से तय होती है। इसी कारण बाड़मेर-जोधपुर के शुष्क हिस्से की फसल पद्धति और कोटा-बूंदी की फसल पद्धति एक जैसी नहीं होती। राज्य के दस कृषि-जलवायु क्षेत्र वर्षा, मिट्टी, स्थलाकृति और फसल पद्धति के आधार पर कृषि को समझाते हैं। शुष्क पश्चिमी मैदान 47.4 लाख हेक्टेयर में फैला है और आधिकारिक तालिका में बाड़मेर तथा जोधपुर के हिस्से से जुड़ा है; यहाँ कम वर्षा, रेतीली मिट्टी और ऊँचे तापमान के अनुसार फसल चुनी जाती है।
खरीफ में बाजरा, मक्का, मूंगफली, कपास, ग्वार, दलहन और तिल महत्त्वपूर्ण हैं। रबी में गेहूँ, सरसों, जौ और चना आते हैं। जीरा, धनिया और मेथी जैसी नकदी तथा मसाला फसलें सूखे और सिंचित दोनों क्षेत्रों में मिलती हैं। शुष्क पश्चिमी मैदान में बाजरा, मोठ और तिल जैसी कठोर खरीफ फसलें स्वाभाविक हैं, जबकि सिंचित उत्तर-पश्चिमी मैदान में नहर जल के कारण कपास, ग्वार, गेहूँ और सरसों का महत्त्व बढ़ता है।
परीक्षा में निष्कर्ष यही रखें: राजस्थान में फसल पद्धति का सही उत्तर हमेशा क्षेत्र, ऋतु, जल और मिट्टी को साथ रखकर बनेगा।
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