मुख्य तथ्य

  • 1991 के आर्थिक सुधार भुगतान-संतुलन संकट, घटते विदेशी मुद्रा भंडार, महंगाई और दबे औद्योगिक उत्पादन की पृष्ठभूमि में शुरू हुए।
  • नई औद्योगिक नीति 1991 ने अधिकांश उद्योगों में लाइसेंसिंग घटाकर राज्य की भूमिका को द्वारपाल से सुविधादाता, विनियामक और अवसंरचना निवेशक की ओर मोड़ा।
  • औद्योगिक विकास को 2022-23 आधार-वर्ष वाले आईआईपी, सकल मूल्यवर्धन, कारखाना सर्वे, निर्यात और राज्य-आंकड़ों को साथ पढ़कर समझा जाता है।
  • जीएसटी 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ; इसका आधार 101वां संविधान संशोधन और जीएसटी परिषद रहा।
  • आईबीसी 2016 ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण के सामने 180 दिन की कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया और बाद में 330 दिन की बाहरी सीमा वाला ऋणदाता-नियंत्रि...

मुख्य बिंदु

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    1991 के आर्थिक सुधार भुगतान-संतुलन संकट, घटते विदेशी मुद्रा भंडार, महंगाई और दबे औद्योगिक उत्पादन की पृष्ठभूमि में शुरू हुए।

  2. 2

    नई औद्योगिक नीति 1991 ने अधिकांश उद्योगों में लाइसेंसिंग घटाकर राज्य की भूमिका को द्वारपाल से सुविधादाता, विनियामक और अवसंरचना निवेशक की ओर मोड़ा।

  3. 3

    औद्योगिक विकास को 2022-23 आधार-वर्ष वाले आईआईपी, सकल मूल्यवर्धन, कारखाना सर्वे, निर्यात और राज्य-आंकड़ों को साथ पढ़कर समझा जाता है।

  4. 4

    जीएसटी 1 जुलाई 2017 से लागू हुआ; इसका आधार 101वां संविधान संशोधन और जीएसटी परिषद रहा।

  5. 5

    आईबीसी 2016 ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण के सामने 180 दिन की कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया और बाद में 330 दिन की बाहरी सीमा वाला ऋणदाता-नियंत्रित ढांचा दिया।

  6. 6

    सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनःपूंजीकरण के लिए अक्टूबर 2017 में दो वित्त वर्षों में ₹2,11,000 करोड़ की घोषणा की गई।

  7. 7

    पीएलआई योजना 14 प्रमुख क्षेत्रों के लिए ₹1.97 लाख करोड़ के केंद्रीय परिव्यय वाला उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन साधन है।

  8. 8

    पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान 13 अक्टूबर 2021 को शुरू हुआ और अवसंरचना योजना को डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर जोड़ने का प्रयास करता है।

भारत में 1991 के आर्थिक सुधार क्यों जरूरी हो गए थे?

भारत में 1991 के आर्थिक सुधार इसलिए जरूरी हो गए थे क्योंकि भुगतान-संतुलन संकट, घटता विदेशी मुद्रा भंडार, तेज महंगाई और बाहरी ऋणदाताओं का अविश्वास मिलकर अर्थव्यवस्था को तत्काल नीति-मोड़ की ओर धकेल रहे थे। भारत में 1991 के आर्थिक सुधार सामान्य नीति-संशोधन नहीं थे, बल्कि भुगतान-संतुलन संकट से निकला बड़ा मोड़ थे। उस समय विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम था, महंगाई तेज थी, बाहरी ऋणदाता सतर्क थे और आयात-संपीड़न से औद्योगिक उत्पादन दबा हुआ था। 1991-92 के बजट भाषण के अनुसार विदेशी मुद्रा भंडार करीब ₹2,500 करोड़ की सीमा में था, जो केवल एक पखवाड़े के आयात के लिए पर्याप्त था। इसी बजट भाषण में यह भी बताया गया कि 1990-91 में ऋण-सेवा बोझ चालू खाते की प्राप्तियों का लगभग 21 प्रतिशत आंका गया था, यानी संकट केवल नकदी की कमी नहीं बल्कि बाहरी देनदारियों के दबाव से भी जुड़ा था। इसी पृष्ठभूमि में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की दिशा बनी।

इन सुधारों ने क्षमता पर लाइसेंसिंग, ऊंचे आयात संरक्षण, कई क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र के प्रभुत्व और विदेशी निवेश पर कड़े नियंत्रण जैसी बाधाओं को कम करने की कोशिश की। डॉ. मनमोहन सिंह के 1991-92 बजट भाषण में व्यापार नीति और औद्योगिक नीति को साथ रखा गया, जबकि पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार ने इस बदलाव को राजनीतिक आधार दिया। राजस्थान जैसे राज्य में इसका अर्थ था कि भिवाड़ी, नीमराणा, जयपुर, जोधपुर, कोटा और भीलवाड़ा के औद्योगिक क्षेत्रों को राष्ट्रीय नीति के खुलेपन से निवेश खींचने का अवसर मिला।

याद रखने योग्य बात: 1991 ने भूमि, बिजली, परिवहन और ऋण की समस्याएं खत्म नहीं कीं, लेकिन निजी उद्योग के विस्तार को वैध आर्थिक दिशा बना दिया।

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