मुख्य तथ्य

  • 1928 में हैरी नायक्विस्ट ने सैंपलिंग-दर का वह सिद्धांत बताया जो बाद में नायक्विस्ट प्रमेय में काम आया;
  • 1948 में क्लॉड ई. शैनन ने "A Mathematical Theory of Communication" प्रकाशित किया;
  • 1950 में रिचर्ड डब्ल्यू. हैमिंग ने हैमिंग कोड प्रस्तुत किए; निश्चित स्थितियों में यह एकल-बिट त्रुटि की जगह पहचानकर उसे सुधारने की व्यावहारिक विधि है।
  • 1962 में AT&T के बेल 103 मॉडेम ने साधारण टेलीफोन लाइन पर 300 बिट प्रति सेकंड फुल-डुप्लेक्स डेटा प्रसारण को मानक रूप दिया;
  • 1976 में CCITT के X.25 मानक ने पैकेट-स्विच्ड विस्तृत-क्षेत्र डेटा संचार को परिभाषित किया; इंटरनेट-पूर्व सार्वजनिक डेटा नेटवर्कों में इसका महत्त्व रहा।

मुख्य बिंदु

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    1928 में हैरी नायक्विस्ट ने सैंपलिंग-दर का वह सिद्धांत बताया जो बाद में नायक्विस्ट प्रमेय में काम आया; इससे भरोसेमंद डिजिटल संकेत को उच्चतम संकेत-आवृत्ति के दोगुने से जोड़ा जाता है।

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    1948 में क्लॉड ई. शैनन ने "A Mathematical Theory of Communication" प्रकाशित किया; इससे चैनल क्षमता और आधुनिक संचार प्रणालियों का सूचना-सिद्धांत आधार स्थापित हुआ।

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    1950 में रिचर्ड डब्ल्यू. हैमिंग ने हैमिंग कोड प्रस्तुत किए; निश्चित स्थितियों में यह एकल-बिट त्रुटि की जगह पहचानकर उसे सुधारने की व्यावहारिक विधि है।

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    1962 में AT&T के बेल 103 मॉडेम ने साधारण टेलीफोन लाइन पर 300 बिट प्रति सेकंड फुल-डुप्लेक्स डेटा प्रसारण को मानक रूप दिया; इससे मॉडेम संचार सार्वजनिक नेटवर्क पर उपयोगी तकनीक बना।

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    1976 में CCITT के X.25 मानक ने पैकेट-स्विच्ड विस्तृत-क्षेत्र डेटा संचार को परिभाषित किया; इंटरनेट-पूर्व सार्वजनिक डेटा नेटवर्कों में इसका महत्त्व रहा।

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    1983 में TCP/IP ARPANET का मानक प्रोटोकॉल समूह बना; यह पुराने नेटवर्क-कंट्रोल तरीकों से अंतर-संचालनीय पैकेट नेटवर्किंग की ओर बड़ा संस्थागत बदलाव था।

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    1984, 1988 में संशोधित, CCITT V.32 ने 9600 बिट प्रति सेकंड तक मॉडेम संचार को निर्दिष्ट किया; इससे आवाज़-ग्रेड टेलीफोन चैनलों पर मॉड्यूलेशन और कोडिंग से डेटा दर बढ़ने का उदाहरण मिला।

डेटा संचार का आधार और घटक क्या हैं?

डेटा संचार का आधार किसी स्रोत से किसी गंतव्य तक डेटा को निश्चित नियमों के अनुसार भेजना है, और इसके पाँच मुख्य घटक संदेश, प्रेषक, प्राप्तकर्ता, माध्यम और प्रोटोकॉल हैं। डेटा संचार का अर्थ है किसी स्रोत से किसी गंतव्य तक डेटा को निश्चित नियमों के अनुसार भेजना। इसमें पाँच मूल घटक माने जाते हैं: संदेश, प्रेषक, प्राप्तकर्ता, माध्यम और प्रोटोकॉल। संदेश टेक्स्ट, संख्या, चित्र, ऑडियो, वीडियो या नियंत्रण-सूचना हो सकता है। प्रेषक वह डिवाइस है जो डेटा भेजता है, जैसे कंप्यूटर, सेंसर या सर्वर। प्राप्तकर्ता वह डिवाइस है जो डेटा ग्रहण करता है। माध्यम तारयुक्त भी हो सकता है, जैसे ट्विस्टेड पेयर केबल, कोएक्सियल केबल और ऑप्टिकल फ़ाइबर; तथा बेतार भी हो सकता है, जैसे रेडियो तरंग, माइक्रोवेव और उपग्रह लिंक। प्रोटोकॉल नियमों का समूह है जो तय करता है कि डेटा कैसे बनेगा, कब भेजा जाएगा, किस पते पर पहुंचेगा और त्रुटि होने पर क्या होगा। पत्र सूचना कार्यालय द्वारा जारी भारतीय दूरसंचार क्षेत्र के वार्षिक प्रदर्शन संकेतक 2024-25 के अनुसार मार्च 2025 के अंत में भारत में इंटरनेट उपभोक्ता 96.91 करोड़ थे, इसलिए स्रोत, गंतव्य, माध्यम और प्रोटोकॉल जैसे घटक केवल सिद्धांत नहीं, रोज़मर्रा की विशाल संचार व्यवस्था का आधार हैं।

भर्ती-स्तर के प्रश्नों में डेटा संचार को अक्सर संचार मॉडल से जोड़ा जाता है। स्रोत डेटा बनाता है, ट्रांसमीटर उसे संकेत में बदलता है, चैनल उसे ले जाता है, रिसीवर संकेत को फिर डेटा में बदलता है और गंतव्य उसे उपयोग करता है। चैनल में शोर, क्षीणन और विकृति आ सकती है। राजस्थान के किसी विद्यालय की कंप्यूटर लैब में लोकल नेटवर्क पर फ़ाइल साझा करना इसी मॉडल का सरल उदाहरण है।

याद रखने योग्य बात: डेटा संचार केवल तार जोड़ने का नाम नहीं है; यह डिवाइस, संकेत, माध्यम और प्रोटोकॉल का संयुक्त तंत्र है।

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