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मुख्य तथ्य
- हिंदी पेपर द्वितीय की तैयारी में व्याकरण, काव्यशास्त्र, साहित्येतिहास, निर्धारित ग्रंथ, भाषा-आलोचना और शिक्षाशास्त्र का संतुलन जरूरी है।
- व्याकरण में वर्ण-वर्गीकरण, शब्द-वर्ग, लिंग, वचन, कारक, काल, संधि, समास और मुहावरेदार प्रयोग की पहचान तथा शुद्धि पूछी जाती है।
- शब्द-शक्ति में अभिधा सीधे अर्थ, लक्षणा संकेतित अर्थ और व्यंजना सूचित या गहरे अर्थ से जुड़ी है।
- रस स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से बनता है; उदाहरण को प्रधान भाव से जोड़कर पहचानना चाहिए।
- अलंकार पहचानते समय देखें कि प्रभाव ध्वनि, पुनरावृत्ति, तुलना, कल्पना, संदेह या विरोध पर आधारित है।
मुख्य बिंदु
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हिंदी पेपर द्वितीय की तैयारी में व्याकरण, काव्यशास्त्र, साहित्येतिहास, निर्धारित ग्रंथ, भाषा-आलोचना और शिक्षाशास्त्र का संतुलन जरूरी है।
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व्याकरण में वर्ण-वर्गीकरण, शब्द-वर्ग, लिंग, वचन, कारक, काल, संधि, समास और मुहावरेदार प्रयोग की पहचान तथा शुद्धि पूछी जाती है।
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शब्द-शक्ति में अभिधा सीधे अर्थ, लक्षणा संकेतित अर्थ और व्यंजना सूचित या गहरे अर्थ से जुड़ी है।
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रस स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भावों से बनता है; उदाहरण को प्रधान भाव से जोड़कर पहचानना चाहिए।
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अलंकार पहचानते समय देखें कि प्रभाव ध्वनि, पुनरावृत्ति, तुलना, कल्पना, संदेह या विरोध पर आधारित है।
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साहित्येतिहास में काल-नाम, प्रमुख प्रवृत्तियां, कवि, गद्य-विधाएं और प्रतिनिधि ग्रंथ वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का आधार बनते हैं।
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भक्तिकाल को संत, सूफी, रामभक्ति और कृष्णभक्ति धाराओं में उनके कवियों और प्रवृत्तियों सहित व्यवस्थित करें।
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रीतिकाल में रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त प्रवृत्तियां, विशेषकर बिहारी और घनानंद, अधिक पूछे जाते हैं।
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स्नातकोत्तर आलोचना में रस-निष्पत्ति, साधारणीकरण, ध्वनि, वक्रोक्ति, अरस्तू की त्रासदी और लोंजाइनस का उदात्त महत्त्वपूर्ण हैं।
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हिंदी भाषा-अध्ययन में उद्भव-विकास, बोली-समूह, राजस्थानी बोलियां, राजभाषा स्थिति और मानक देवनागरी शामिल हैं।
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निर्धारित ग्रंथों को लेखक, संपादक, अंश, काल, मुख्य विषय और शैलीगत पहचान के आधार पर पढ़ें।
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शिक्षाशास्त्र में संप्रेषण, शिक्षण प्रतिमान, शिक्षण-अधिगम सामग्री, सहकारी अधिगम, डिजिटल अधिगम और तकनीक-आधारित मूल्यांकन को कक्षा-प्रयोग से जोड़ना चाहिए।
विद्यालय व्याख्याता परीक्षा में हिंदी व्याकरण और प्रयोग कैसे पढ़ना चाहिए?
विद्यालय व्याख्याता परीक्षा में हिंदी व्याकरण और प्रयोग को पहचान, शुद्धि और सही वाक्य-प्रयोग की संयुक्त तैयारी के रूप में पढ़ना चाहिए। राजस्थान लोक सेवा आयोग के हिंदी प्रश्नपत्र द्वितीय पाठ्यक्रम के अनुसार इस प्रश्नपत्र में १५० बहुविकल्पीय प्रश्न होते हैं। प्रश्नपत्र द्वितीय में हिंदी व्याकरण को केवल परिभाषाओं की सूची की तरह नहीं, बल्कि पहचान, शुद्धि और प्रयोग की प्रणाली की तरह पढ़ना चाहिए। पहली आधारभूमि वर्ण व्यवस्था है। स्वर और व्यंजन, उनका उच्चारण-स्थान, उच्चारण-प्रकार और शब्दकोशीय क्रम वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में सीधे पूछे जाते हैं। कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दंत्य और ओष्ठ्य वर्गों की पहचान, स्वर-व्यंजन का भेद और वर्णानुक्रम में शब्द की स्थिति जैसे प्रश्न छोटे दिखते हैं, पर गलती जल्दी कराते हैं। उदाहरण के लिए क, च, ट, त, प अलग-अलग उच्चारण-वर्गों का संकेत देते हैं और अ, आ स्वर-व्यवस्था के मूल रूप हैं।
शब्द-वर्गीकरण दो स्तरों पर तैयार करना चाहिए। उत्पत्ति के आधार पर तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्द आते हैं। अग्नि तत्सम है और आग तद्भव रूप है; ऐसे प्रश्नों में स्रोत, रूप-परिवर्तन और सही युग्म पर ध्यान देना पड़ता है। व्याकरण की दृष्टि से संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया और क्रिया-विशेषण मुख्य वर्ग हैं। संज्ञा में व्यक्तिवाचक, जातिवाचक, भाववाचक और समूहवाचक भेद आते हैं। सर्वनाम में पुरुषवाचक, संकेतवाचक, निजवाचक, संबंधवाचक और प्रश्नवाचक रूप पूछे जा सकते हैं। विशेषण गुण, परिमाण, संख्या या संबंध बताते हैं। क्रिया सकर्मक, अकर्मक, पूर्ण, सहायक और संयुक्त रूपों में समझी जाती है। वाक्य-शुद्धि में संज्ञा, विशेषण और क्रिया का मेल इन्हीं वर्गों पर निर्भर करता है।
व्याकरणिक कोटियों में लिंग, वचन, कारक और काल बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। लिंग हमेशा प्राकृतिक स्त्री-पुरुष के आधार पर तय नहीं होता; पुस्तक, समस्या और पानी जैसे शब्द प्रयोग से याद रखने पड़ते हैं। वचन बदलने पर संज्ञा, सर्वनाम और क्रिया के रूप भी बदलते हैं। कारक-संबंध ने, को, से, का, में और पर जैसे परसर्गों से व्यक्त होते हैं। काल और पक्ष को अलग-अलग समझना चाहिए। गया, जा रहा है और जाएगा समय के साथ क्रिया की पूर्णता या निरंतरता भी बताते हैं। सामान्य गलती अकर्मक क्रिया के साथ ने का गलत प्रयोग या कर्तृवाच्य रचना में क्रिया-सहमति का चूकना है।
शब्द-निर्माण में संधि, समास, उपसर्ग और प्रत्यय आते हैं। संधि ध्वनियों का मेल है, जिसमें शब्द-सीमा पर ध्वनि बदलती है; विद्या और आलय से विद्यालय बनता है। स्वर संधि और व्यंजन संधि को केवल नाम से नहीं, वास्तविक ध्वनि-परिवर्तन से पहचानना चाहिए। समास में दो या अधिक शब्द संक्षिप्त रूप में मिलते हैं। राजपुत्र, नीलकंठ, दिन-रात और यथाशक्ति अलग-अलग संबंध दिखाते हैं। अ, अनु, प्रति और उप जैसे उपसर्ग तथा ता, पन, ई और कार जैसे प्रत्यय नए अर्थ और नए व्याकरणिक रूप बनाते हैं।
शब्द-ज्ञान में पर्याय, विलोम, अनेकार्थी शब्द, समोच्चरित भिन्नार्थक शब्द और अनेक शब्दों के लिए एक शब्द शामिल हैं। जल, नीर और पानी व्यापक अर्थ में पर्याय हो सकते हैं, पर सही उत्तर प्रसंग से तय होगा। अर्थ शब्द का मतलब अभिप्राय, धन या उद्देश्य भी हो सकता है; इसलिए अनेकार्थी शब्दों में पूरे वाक्य को पढ़ना जरूरी है। वाक्य रचना में उद्देश्य, विधेय, सरल, संयुक्त और मिश्र वाक्य तथा अर्थ बदले बिना रूपांतरण आते हैं। शब्द-शुद्धि और वाक्य-शुद्धि में वर्तनी, लिंग, वचन, कारक, काल, मुहावरा और मानक प्रयोग की जांच होती है। मुहावरे और लोकोक्तियां शाब्दिक अर्थ से नहीं, उनके व्यावहारिक अर्थ से याद करें। आंखों का तारा प्रिय व्यक्ति है और नाच न जाने आंगन टेढ़ा अपनी कमी का दोष परिस्थिति पर डालने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करता है।
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