मुख्य तथ्य

  • निगमन में अगर आधारवाक्य सही हों और तर्क का रूप वैध हो, तो निष्कर्ष गलत हो ही नहीं सकता।
  • आगमन में देखे गए उदाहरणों से एक सामान्य नियम बनता है; ये उदाहरण नियम या अगले मामले की संभावना बढ़ाते हैं, पक्का नहीं करते।
  • सर्वोत्तम व्याख्या का अनुमान उपलब्ध तथ्यों में सबसे संभाव्य व्याख्या चुनता है और उसे प्रमाण नहीं मानता।
  • सभी/कुछ/कोई-नहीं वाले न्याय-वाक्य, यदि-तो कथन और वेन आरेख इस विषय के निगमनात्मक हिस्से का केंद्र हैं।
  • कथन-मान्यता, तर्क, निष्कर्ष, कारण-परिणाम और कार्यवाही जैसे प्रश्नों में उत्तर हमेशा दिए गए कथन के दायरे में ही रहता है।

मुख्य बिंदु

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    निगमन में अगर आधारवाक्य सही हों और तर्क का रूप वैध हो, तो निष्कर्ष गलत हो ही नहीं सकता।

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    आगमन में देखे गए उदाहरणों से एक सामान्य नियम बनता है; ये उदाहरण नियम या अगले मामले की संभावना बढ़ाते हैं, पक्का नहीं करते।

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    सर्वोत्तम व्याख्या का अनुमान उपलब्ध तथ्यों में सबसे संभाव्य व्याख्या चुनता है और उसे प्रमाण नहीं मानता।

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    सभी/कुछ/कोई-नहीं वाले न्याय-वाक्य, यदि-तो कथन और वेन आरेख इस विषय के निगमनात्मक हिस्से का केंद्र हैं।

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    कथन-मान्यता, तर्क, निष्कर्ष, कारण-परिणाम और कार्यवाही जैसे प्रश्नों में उत्तर हमेशा दिए गए कथन के दायरे में ही रहता है।

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    राजस्थान के प्रशासनिक उदाहरण — सूचना, शिकायत, निरीक्षण, योजना और सार्वजनिक कार्रवाई — इसी तर्क-क्षमता को परखते हैं।

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    आंकड़ा पर्याप्तता पूछती है कि सूचना पर्याप्त है या नहीं; यह अंतिम संख्या निकालने जैसा नहीं है।

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    मजबूत उत्तर निश्चित निष्कर्ष, संभाव्य निष्कर्ष, मान्यता, व्याख्या और व्यावहारिक कार्रवाई को अलग करता है।

वैधता, संभावना और व्याख्या

इस विषय में किसी तर्क को परखने के तीन अलग पैमाने हैं। निगमनात्मक तर्क देखता है कि दिए गए आधारवाक्यों से निष्कर्ष अनिवार्य रूप से निकलता है या नहीं। यदि सभी खिलाड़ी अनुशासित हैं और सभी अनुशासित लोग समय-सारणी मानते हैं, तो सभी खिलाड़ी समय-सारणी मानते हैं; यहाँ निष्कर्ष तर्क के रूप पर टिका है, खेल की स्थानीय लोकप्रियता पर नहीं। आगमनात्मक तर्क बार-बार देखे गए मामलों से एक संभाव्य नियम बनाता है। अगर राजस्थान की किसी नगर हेल्पलाइन में धूल-आँधी के बाद हर बार एक-जैसी शिकायतें आती हैं, तो अगले तूफान पर भी वैसी शिकायतों की संभावना कही जा सकती है, पर निष्कर्ष अपवाद के लिए खुला रहता है। सर्वोत्तम व्याख्या का अनुमान उपलब्ध प्रेक्षणों में से सबसे उपयुक्त व्याख्या चुनता है। जयपुर कार्यालय में सर्वर खराबी के बाद जल-बिल की शिकायतें बढ़ें और बिल की तिथियाँ उसी अवधि में हों, तो सर्वर खराबी एक संभाव्य व्याख्या है, पक्का प्रमाण नहीं।

पहली समझ यह है कि हर तरह के तर्क का पैमाना अलग रखें। निगमन दिए हुए आधारों के भीतर वैधता और निश्चितता देखता है; आगमन तर्क की मजबूती, आवृत्ति और प्रतिरूप की नियमितता देखता है; सर्वोत्तम व्याख्या का अनुमान यह देखता है कि व्याख्या तथ्यों से कितनी अच्छी तरह मेल खाती है, कितनी सरल है और कितने तथ्यों को समेटती है। आरएएस के तर्क प्रश्न साधारण भाषा में यह अंतर छिपा सकते हैं। कोटा के किसी विद्यालय परिपत्र पर निष्कर्ष पूछा जा सकता है, बीकानेर की परिवहन सूचना पर मान्यता पूछी जा सकती है, और बाड़मेर की जल-आपूर्ति शिकायत पर उचित कार्रवाई पूछी जा सकती है। प्रसंग बदल सकता है; असली फर्क यह है कि प्रश्न निष्कर्ष, तर्क की मजबूती, मान्यता, व्याख्या या कार्रवाई में से क्या पूछ रहा है।

सभी/कुछ/कोई-नहीं वाले न्याय-वाक्य शुरुआत के लिए सबसे स्पष्ट हैं, क्योंकि ये वह रूप सिखाते हैं जिसमें सही आधारों से निष्कर्ष कभी गलत नहीं होता। ‘सभी’, ‘कुछ’ और ‘कोई नहीं’ वर्ग-संबंध तय करते हैं। ‘सभी अ, ब हैं’ का अर्थ है हर अ, ब में रहेगा; ‘कुछ अ, ब हैं’ का अर्थ है कम से कम एक साझा क्षेत्र बनेगा; ‘कोई अ, ब नहीं’ का अर्थ है कोई साझा क्षेत्र नहीं। यही संबंध आरेख, वाक्य और निष्कर्ष से जाँचा जाता है। जो निष्कर्ष वृत्तों की हर संभव व्यवस्था में सही रहता है, वही असल में आधारों से निकलता है। यदि एक व्यवस्था में निष्कर्ष सही और दूसरी में गलत हो, तो वह केवल संभव है, निश्चित नहीं।

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