कथन और कार्रवाई
मुख्य तथ्य
- कथन को पूरा तथ्यात्मक आधार मानें; उसे चुनौती न दें और अपनी ओर से कहानी न जोड़ें।
- सही कार्रवाई का संबंध बताई गई समस्या, कारण, जोखिम या परिणाम से सीधा होना चाहिए।
- व्यावहारिक कदम में उचित कर्ता, पर्याप्त अधिकार, उपलब्ध साधन और काम करने लायक समय होना चाहिए।
- अनुपातिक कदम चुनें; छोटी या अनिश्चित समस्या पर व्यापक दंड या स्थायी रोक आमतौर पर उचित नहीं होती।
- तथ्य अधूरे हों तो दोष तय करने या दंड देने से पहले जाँच करना सही हो सकता है।
मुख्य बिंदु
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कथन को पूरा तथ्यात्मक आधार मानें; उसे चुनौती न दें और अपनी ओर से कहानी न जोड़ें।
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सही कार्रवाई का संबंध बताई गई समस्या, कारण, जोखिम या परिणाम से सीधा होना चाहिए।
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व्यावहारिक कदम में उचित कर्ता, पर्याप्त अधिकार, उपलब्ध साधन और काम करने लायक समय होना चाहिए।
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अनुपातिक कदम चुनें; छोटी या अनिश्चित समस्या पर व्यापक दंड या स्थायी रोक आमतौर पर उचित नहीं होती।
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तथ्य अधूरे हों तो दोष तय करने या दंड देने से पहले जाँच करना सही हो सकता है।
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तात्कालिक राहत और दीर्घकालीन समाधान दोनों सही हो सकते हैं, यदि वे समस्या के अलग हिस्सों को संभालते हों।
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केवल एक, केवल दो, दोनों या कोई नहीं वाला विकल्प चुनने से पहले हर कार्रवाई को अलग-अलग परखें।
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कार्रवाई का सफलता की गारंटी देना ज़रूरी नहीं; उसके सफल होने की उचित संभावना पर्याप्त है।
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कथन में वास्तविक जोखिम हो तो केवल इसलिए रोकथाम के कदम को न ठुकराएँ कि नुकसान अभी हुआ नहीं है।
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ऐसी कार्रवाई से बचें जो बिना बताए दोष, असीमित धन, असंभव अधिकार, सभी के पालन या गढ़े हुए तथ्य पर टिकी हो।
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जागरूकता, निगरानी, नियम लागू करना, राहत और व्यवस्था में सुधार अलग उपाय हैं; समस्या के अनुसार उपाय चुनें।
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हल करने का सुरक्षित क्रम है: समस्या, उद्देश्य, संबंध, व्यावहारिकता, अनुपातिकता, बुरा असर और अंतिम विकल्प।
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प्रश्न किस क्षमता को परखता है
मूल विचार
कथन और कार्रवाई वाले प्रश्न में एक तथ्यात्मक स्थिति दी जाती है और उसके साथ एक या अधिक कदम सुझाए जाते हैं। काम यह साबित करना नहीं है कि कथन इतिहास की दृष्टि से सही है, उसे किसने लिखा है, या आपको निजी तौर पर क्या पसंद है। काम यह तय करना है कि कथन में बताई स्थिति को सही मानने पर कौन-सी कार्रवाई समझदार और व्यावहारिक होगी। इसलिए यह व्यावहारिक तर्क का प्रश्न है: स्थिति को समझकर उचित निर्णय तक पहुँचना होता है।
कथन में कमी, दुर्घटना, प्रशासनिक चूक, सार्वजनिक जोखिम, सामाजिक समस्या, संस्था से जुड़ी शिकायत या खराब रुझान बताया जा सकता है। कार्रवाई वह कदम है जो समस्या को रोकने, नुकसान घटाने, कारण खोजने, राहत देने, नियम लागू करने या व्यवस्था सुधारने के लिए उठाया जाए। केवल राय, भविष्यवाणी, भावनात्मक प्रतिक्रिया या समस्या को दूसरे शब्दों में दोहराना उपयोगी कार्रवाई नहीं है, जब तक उससे साफ़ न हो कि किया क्या जाना चाहिए।
अच्छे हल की 3 आदतें हैं। पहली, छपे हुए तथ्यों को मानें और अपनी कहानी न जोड़ें। यदि कथन किसी चौराहे पर बार-बार दुर्घटनाएँ बताता है, तो यह न मान लें कि हर चालक लापरवाह है, सड़क गैरकानूनी ढंग से बनी है या धन की कोई सीमा नहीं है। दूसरी, असली ज़रूरत पहचानें: तुरंत सुरक्षा, जाँच, रोकथाम, सुधार या लंबे समय की व्यवस्था। तीसरी, हर सुझाए कदम को अलग परखें। दो कार्रवाइयाँ एक साथ सही हो सकती हैं, यदि वे अलग स्तर पर काम करती हों; एक तुरंत राहत दे सकती है और दूसरी मूल कारण हटा सकती है।
यह टॉपिक पास के कथन-आधारित टॉपिकों से अलग है। पूर्वधारणा वह अनकही बात है जिसकी कथन या प्रस्ताव को ज़रूरत होती है। निष्कर्ष तथ्यों से निकाला गया परिणाम है। तर्क किसी मत के पक्ष या विपक्ष में कारण देता है। कार्रवाई पूछती है कि उचित रूप से किया क्या जाए। इसलिए यहाँ सीमित जानकारी में व्यावहारिक निर्णय परखा जाता है, केवल औपचारिक सिद्धि नहीं। किसी कदम से सफलता की गारंटी ज़रूरी नहीं; उसमें सुधार की उचित संभावना होनी चाहिए और उससे साफ़ तौर पर बड़ी नई समस्या पैदा नहीं होनी चाहिए।
एक मुख्य सवाल रखें: यदि अधिकार रखने वाला समझदार निर्णयकर्ता कथन को सही माने, तो क्या यह कदम संबंधित, लागू करने योग्य और अनुपातिक है? यह सवाल ध्यान को भावना, विचारधारा और कल्पना से हटाकर समस्या पर रखता है। इसी से समझ आता है कि अधूरे तथ्यों में जाँच सही क्यों हो सकती है, नुकसान से पहले रोकथाम क्यों सही हो सकती है, और समस्या वास्तविक होने पर भी अत्यधिक दंड गलत क्यों हो सकता है।
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