कथन एवं पूर्वधारणाएँ
मुख्य तथ्य
- पूर्वधारणा वह अनकहा विचार है जिसे वक्ता सहज रूप से मानकर चलता है; कथन से जुड़ा हर विचार पूर्वधारणा नहीं होता।
- कथन को पूरा संदेश मानकर पहले पहचानें कि वक्ता सलाह, प्रस्ताव, चेतावनी, दावा, अनुरोध या निर्णय में से क्या कर रहा है।
- प्रश्न हल करते समय कथन को स्वीकार करें; बाहरी जानकारी के आधार पर उसे गलत ठहराने में समय न लगाएँ।
- मुख्य कसौटी यह है कि कथन अपने अपेक्षित काम को पूरा करे, इसके लिए क्या वक्ता को संभावित पूर्वधारणा माननी ही पड़ेगी।
- निषेध जाँच उपयोगी है: विकल्प को नकारें और देखें कि कथन का तार्किक या व्यावहारिक आधार टूटता है या नहीं।
मुख्य बिंदु
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पूर्वधारणा वह अनकहा विचार है जिसे वक्ता सहज रूप से मानकर चलता है; कथन से जुड़ा हर विचार पूर्वधारणा नहीं होता।
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कथन को पूरा संदेश मानकर पहले पहचानें कि वक्ता सलाह, प्रस्ताव, चेतावनी, दावा, अनुरोध या निर्णय में से क्या कर रहा है।
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प्रश्न हल करते समय कथन को स्वीकार करें; बाहरी जानकारी के आधार पर उसे गलत ठहराने में समय न लगाएँ।
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मुख्य कसौटी यह है कि कथन अपने अपेक्षित काम को पूरा करे, इसके लिए क्या वक्ता को संभावित पूर्वधारणा माननी ही पड़ेगी।
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निषेध जाँच उपयोगी है: विकल्प को नकारें और देखें कि कथन का तार्किक या व्यावहारिक आधार टूटता है या नहीं।
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आवश्यक पूर्वधारणा का परिणाम की गारंटी देना ज़रूरी नहीं; आवश्यकता और पर्याप्तता को एक मानना आम गलती है।
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सलाह में अक्सर काम करने की संभावना और उपयोगिता मानी जाती है, पर हर व्यक्ति को सफलता मिलेगी या कोई बाधा नहीं होगी, यह ज़रूरी नहीं।
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चेतावनी आमतौर पर हानि की सार्थक संभावना और उससे बचने की उपयोगिता मानती है, हानि का निश्चित होना नहीं।
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विज्ञापन और अपील अक्सर लोगों की रुचि, पहुँच या अपेक्षित प्रतिक्रिया पर टिके होते हैं; उत्पाद की श्रेष्ठता का दावा फिर भी अनिवार्य नहीं होता।
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नैतिक स्वीकृति, बहुमत की राय, ठीक-ठीक मात्रा, मकसद या कारण तभी मानें जब कथन सचमुच उन पर निर्भर हो।
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पूर्वधारणा को निष्कर्ष, तर्क, निहितार्थ और कार्रवाई से अलग रखने के लिए देखें कि वह तर्क-रचना में कहाँ स्थित है।
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दोनों पूर्वधारणाओं को अलग-अलग परखने के बाद ही छपा हुआ विकल्प चुनें; एक निहित हो सकती है और दूसरी नहीं।
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पूर्वधारणा का सही अर्थ
कथन के नीचे छिपा आधार
कथन-पूर्वधारणा वाले प्रश्न में यह परखा जाता है कि वक्ता ने कौन-सी बात कहे बिना मान ली है। छपा हुआ कथन सलाह, घोषणा, अनुरोध, चेतावनी, अनुमान, नीति-प्रस्ताव, विज्ञापन, राय या तथ्यात्मक दावा हो सकता है। संभावित पूर्वधारणा को केवल इसलिए सही नहीं मानना चाहिए कि वह आम जीवन में समझदार लगती है। सही कसौटी यह है कि क्या उसी उद्देश्य से वही कथन करते समय वक्ता को उस बात को मानकर चलना पड़ा। इसलिए पूर्वधारणा कथन की बुनियाद में रहती है; वह कथन से बाद में निकला परिणाम नहीं होती।
उदाहरण लें: परीक्षा के दिनों में नगर पुस्तकालय को 2 घंटे अधिक खुला रखना चाहिए। इस प्रस्ताव में यह बात निहित है कि कुछ लक्षित पाठकों को बढ़े हुए समय में पुस्तकालय का उपयोग करने से लाभ होगा। यदि उस समय कोई आ ही नहीं सकता या आना ही नहीं चाहता, तो समय बढ़ाने का उद्देश्य समाप्त हो जाएगा। लेकिन यह मानना ज़रूरी नहीं कि हर विद्यार्थी पुस्तकालय आएगा, सभी के घर किताबें नहीं हैं, या केवल समय बढ़ाने से अंक बढ़ जाएँगे। ये बातें प्रस्ताव के साथ मेल खा सकती हैं, फिर भी प्रस्ताव इनके बिना भी किया जा सकता है।
सही पूर्वधारणा की 3 पहचानें हैं:
- वह अनकही होती है। कथन में सीधे लिखी बात सूचना है, छिपी मान्यता नहीं।
- कथन जिस काम के लिए कहा गया है, उसके लिए वह ज़रूरी होती है। सलाह किसी संभावित लाभ पर, अनुरोध कुछ पालन की संभावना पर और चेतावनी किसी सार्थक खतरे पर टिकी रहती है।
- उसे वक्ता मानकर चलता है। पाठक जिस बात की कल्पना कर सकता है, वह अपने-आप पूर्वधारणा नहीं बनती।
यह प्रश्न व्यक्तिगत सहमति का नहीं, तार्किक निर्भरता का है। यदि कथन कहता है कि किसी विभाग को आवेदन-पत्र सरल करना चाहिए, तो पहले इसी संदेश को विश्लेषण का आधार मानें। यह बहस न करें कि मौजूदा आवेदन-पत्र शायद पहले से सरल है। देखें कि सुझाव सार्थक होने के लिए क्या माना गया होगा। संभव आधार यह है कि वर्तमान प्रक्रिया में टाली जा सकने वाली कठिनाई है या सरल रूप से आवेदन पूरा करना आसान होगा। यह मानना ज़रूरी नहीं कि हर आवेदक उलझन में है।
इसे मेज की तरह समझें। कथन मेज की सतह है और पूर्वधारणाएँ उसके नीचे के सहारे हैं। निष्कर्ष तर्क के बाद ऊपर रखा जाता है, जबकि तर्क किसी मत के पक्ष या विपक्ष में दिया गया कारण है। यह दिशा साफ़ रहने पर श्रेणी वाली अधिकतर गलतियाँ रुक जाती हैं।
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