तार्किक विवेचन — निगमनात्मक, आगमनात्मक और सर्वोत्तम व्याख्या वाला तर्क
मुख्य तथ्य
- तर्क-समूह में आधार-वाक्य किसी निष्कर्ष के समर्थन में दिए जाते हैं; कथनों की साधारण सूची अपने-आप तर्क नहीं बनती।
- निगमनात्मक तर्क की पहली कसौटी वैधता है: यदि आधार-वाक्य सत्य मानें, तो निष्कर्ष असत्य नहीं हो सकता।
- प्रामाणिक निगमनात्मक तर्क वैध भी होता है और उसके आधार-वाक्य वास्तव में सत्य भी होते हैं; केवल वैधता तथ्य की सच्चाई तय नहीं करती।
- पूर्वपक्ष की पुष्टि और उत्तरपक्ष का निषेध वैध सशर्त रूप हैं, जबकि उत्तरपक्ष की पुष्टि और पूर्वपक्ष का निषेध अवैध हैं।
- सभी, कोई नहीं और कुछ जैसे शब्द वर्गगत निष्कर्ष की सीमा तय करते हैं; उनकी सीमा को चुपचाप बढ़ाना गलत है।
मुख्य बिंदु
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तर्क-समूह में आधार-वाक्य किसी निष्कर्ष के समर्थन में दिए जाते हैं; कथनों की साधारण सूची अपने-आप तर्क नहीं बनती।
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निगमनात्मक तर्क की पहली कसौटी वैधता है: यदि आधार-वाक्य सत्य मानें, तो निष्कर्ष असत्य नहीं हो सकता।
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प्रामाणिक निगमनात्मक तर्क वैध भी होता है और उसके आधार-वाक्य वास्तव में सत्य भी होते हैं; केवल वैधता तथ्य की सच्चाई तय नहीं करती।
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पूर्वपक्ष की पुष्टि और उत्तरपक्ष का निषेध वैध सशर्त रूप हैं, जबकि उत्तरपक्ष की पुष्टि और पूर्वपक्ष का निषेध अवैध हैं।
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सभी, कोई नहीं और कुछ जैसे शब्द वर्गगत निष्कर्ष की सीमा तय करते हैं; उनकी सीमा को चुपचाप बढ़ाना गलत है।
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आगमनात्मक तर्क देखे गए मामलों, सादृश्य, पूर्वानुमान या कारण-संबंधी आधार से संभावित निष्कर्ष देता है।
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आगमन की मजबूती प्रतिनिधि आधार, पर्याप्त विविधता, उपयोगी समानता और निर्णायक विरोधी मामलों के अभाव पर निर्भर करती है।
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एक वास्तविक प्रतिउदाहरण सार्वभौमिक दावे को गलत सिद्ध कर सकता है, पर उससे कोई दूसरा सार्वभौमिक दावा अपने-आप सिद्ध नहीं होता।
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सर्वोत्तम व्याख्या वाला तर्क किसी देखे गए तथ्य से शुरू होकर उपलब्ध सबसे अच्छी व्याख्या चुनता है; वह उसे निश्चित रूप से सिद्ध नहीं करता।
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अच्छी व्याख्या अधिक संबंधित तथ्यों को कम निराधार मान्यताओं से समझाती है और दूसरे विकल्पों से तुलना में टिकती है।
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निगमन में निष्कर्ष अनिवार्य रूप से निकलता है, आगमन किसी ढर्रे की संभावना आँकता है और सर्वोत्तम व्याख्या वाला तर्क व्याख्या सुझाता है; एक जाँच में तीनों साथ आ सकते हैं।
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वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में केवल छपे हुए कथनों से निकलने वाला निष्कर्ष देखें, बाहरी ज्ञान अलग रखें और हर विकल्प की बढ़ी हुई सीमा जाँचें।
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तर्क, अनुमान और तर्क-समूह की बनावट
मूल इकाई
तार्किक सोच में किसी प्रश्न के लिए स्वीकार की गई सूचना से आगे का दावा निकाला जाता है। तर्क-समूह में आरंभिक कथन आधार-वाक्य होते हैं और उनसे समर्थित दावा निष्कर्ष कहलाता है। क्योंकि, चूँकि और इस तथ्य के आधार पर जैसे शब्द अक्सर आधार-वाक्य बताते हैं; इसलिए, अतः और इससे निकलता है कि जैसे शब्द निष्कर्ष का संकेत देते हैं। ये केवल संकेत हैं, पक्के नियम नहीं। कई बार ऐसा कोई शब्द नहीं होता और संबंध को पूरे वाक्य का अर्थ देखकर पहचानना पड़ता है।
तर्क-समूह को विवरण, सूचना या असंबद्ध कथनों की सूची से अलग समझें। “सड़क गीली है। आकाश में बादल हैं” केवल दो सूचनाएँ हो सकती हैं। “सड़क गीली है क्योंकि वर्षा हुई” में एक बात दूसरी बात को समझाने के लिए रखी गई है। वस्तुनिष्ठ प्रश्न में बनावट को मन में इस तरह रखें: आधार-वाक्य 1 + आधार-वाक्य 2 → प्रस्तावित निष्कर्ष। फिर देखें कि आधार-वाक्य उस निष्कर्ष को सचमुच कितना सहारा देते हैं।
सत्यता और समर्थन अलग प्रश्न हैं
किसी कथन की सत्यता दुनिया के तथ्यों पर निर्भर करती है। किसी अनुमान की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि आधार-वाक्य निष्कर्ष को किस तरह सहारा देते हैं। सही निष्कर्ष खराब तर्क से भी मिल सकता है और सही बनावट वाले निगमन में कोई आधार-वाक्य गलत हो सकता है। उदाहरण देखें:
- सभी जिला मुख्यालय समुद्र-तटीय नगर हैं।
- अजमेर एक जिला मुख्यालय है।
- इसलिए अजमेर समुद्र-तटीय नगर है।
रूप वैध है: दोनों आधार-वाक्य सत्य होते तो निष्कर्ष असत्य नहीं हो सकता था। पहला आधार-वाक्य वास्तव में गलत है, इसलिए तर्क प्रामाणिक नहीं है। इस भेद से दो गलतियाँ बचती हैं—सिर्फ़ अपरिचित लगने पर निष्कर्ष ठुकराना और निष्कर्ष सही निकलने भर से तर्क को सही मान लेना।
तीन मुख्य प्रकार उनके दावे की ताकत से अलग होते हैं। निगमन अनिवार्य निष्कर्ष का दावा करता है। आगमन निष्कर्ष को कम या अधिक संभावित बनाता है। सर्वोत्तम व्याख्या वाला तर्क किसी देखे गए तथ्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी वजह चुनता है। ये समर्थन की कसौटियाँ हैं; केवल सभी या शायद जैसे शब्द देखकर प्रकार तय नहीं होता। एक ही विषय पर तीनों तरह का तर्क हो सकता है। असली प्रश्न यह है कि आधार-वाक्य क्या काम कर रहे हैं और निष्कर्ष के लिए कितनी ताकत का दावा किया गया है।
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