मुख्य तथ्य

  • जैव-विविधता का अध्ययन जीन, प्रजाति और पारितंत्र के स्तर पर होता है; समृद्धि, समानता और स्थानिकता अलग-अलग गुण बताते हैं।
  • आवास की हानि और विखंडन, अत्यधिक दोहन, बाहरी आक्रामक प्रजातियाँ, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैव-विविधता पर बड़े दबाव हैं।
  • स्वस्थाने संरक्षण जीवों को सक्रिय प्राकृतिक आवास में बचाता है, जबकि स्थान-बाह्य संरक्षण उन्हें प्राकृतिक आवास से बाहर सुरक्षित रखता है।
  • जैविक विविधता अधिनियम राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर संस्थाएँ बनाता है तथा संरक्षण को टिकाऊ उपयोग और लाभ-साझेदारी से जोड़ता है।
  • आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी मुख्यतः आनुवंशिक अभियांत्रिकी और नियंत्रित जैव-प्रक्रिया पर टिकी है, पर व्यापक अर्थ में पारंपरिक किण्वन भी इसका हिस्सा है।

मुख्य बिंदु

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    जैव-विविधता का अध्ययन जीन, प्रजाति और पारितंत्र के स्तर पर होता है; समृद्धि, समानता और स्थानिकता अलग-अलग गुण बताते हैं।

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    आवास की हानि और विखंडन, अत्यधिक दोहन, बाहरी आक्रामक प्रजातियाँ, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैव-विविधता पर बड़े दबाव हैं।

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    स्वस्थाने संरक्षण जीवों को सक्रिय प्राकृतिक आवास में बचाता है, जबकि स्थान-बाह्य संरक्षण उन्हें प्राकृतिक आवास से बाहर सुरक्षित रखता है।

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    जैविक विविधता अधिनियम राष्ट्रीय, राज्य और स्थानीय स्तर पर संस्थाएँ बनाता है तथा संरक्षण को टिकाऊ उपयोग और लाभ-साझेदारी से जोड़ता है।

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    आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी मुख्यतः आनुवंशिक अभियांत्रिकी और नियंत्रित जैव-प्रक्रिया पर टिकी है, पर व्यापक अर्थ में पारंपरिक किण्वन भी इसका हिस्सा है।

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    प्रतिबंध एंजाइम डीएनए काटते हैं, लाइगेज़ टुकड़े जोड़ता है, वाहक चुना अंश पहुँचाता है, मेज़बान उसकी प्रतियाँ बनाता है और चयन बदली कोशिकाओं की पहचान करता है।

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    आनुवंशिक अभियांत्रिकी जैव-प्रौद्योगिकी से संकीर्ण है; हर आनुवंशिक अभियांत्रिकी प्रक्रिया जैव-प्रौद्योगिकी है, पर हर जैव-प्रौद्योगिकी प्रक्रिया जीन नहीं बदलती।

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    राजस्थान की कृषि को वर्षा की अनिश्चितता, शुष्क और अर्ध-शुष्क दशाओं, मिट्टी की सीमाओं, सिंचाई और फसल-चयन के साथ समझना चाहिए।

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    बाजरा, मक्का, दलहन, तिलहन, गेहूँ, कपास, ग्वार और मसाले राजस्थान में अलग-अलग मौसम और क्षेत्रों के अनुकूल हैं।

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    पादप प्रजनन, ऊतक संवर्धन, जैव-उर्वरक, जैव-कीटनाशक और जैव-पोषण संवर्धन अलग समस्याएँ हल करते हैं; ये एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।

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    पशुपालन में प्रजनन, आहार, आवास, रोग-रोकथाम, कल्याण और उत्पाद प्रबंधन साथ आते हैं; केवल आनुवंशिकी से अच्छी उत्पादकता नहीं मिलती।

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    राजस्थान के गाय, भैंस, बकरी, भेड़ और ऊँट संसाधन अलग पर्यावरण और आजीविका के अनुकूल हैं, इसलिए नस्ल संरक्षण आर्थिक और जैविक दोनों विषय है।

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    फसल-पशुधन की जुड़ी व्यवस्था अवशेष और गोबर का पुनः उपयोग करती है, जोखिम बाँटती है और खेत की सहनशीलता को जैव-विविधता संरक्षण से जोड़ती है।

जैव-विविधता: स्तर, माप और महत्व

अर्थ और स्तर

जैव-विविधता का अर्थ जीवों में तथा उन पारिस्थितिक व्यवस्थाओं में मिलने वाली भिन्नता है जिनका वे हिस्सा हैं। यह केवल पशुओं की गिनती नहीं है। इसके 3 स्तर अलग-अलग समझने चाहिए। आनुवंशिक विविधता एक ही प्रजाति के भीतर मिलने वाला अंतर है, जैसे फसल की किस्मों या पशु नस्लों में भिन्नता। यही विविधता किसी समूह को रोग, सूखे और पर्यावरणीय बदलाव के अनुसार ढलने का आधार देती है। प्रजातीय विविधता किसी क्षेत्र में प्रजातियों की संख्या और उनके जीवों की सापेक्ष प्रचुरता से जुड़ी है। पारितंत्र विविधता अलग आवासों, जैव-समुदायों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं की विविधता है, जैसे मरुस्थल, शुष्क पर्णपाती वन, आर्द्रभूमि और घासभूमि।

प्रजाति-समृद्धि का अर्थ प्रजातियों की संख्या है, जबकि प्रजातीय समानता बताती है कि जीव अलग-अलग प्रजातियों में कितने संतुलित ढंग से बँटे हैं। किसी क्षेत्र में प्रजातियाँ बहुत हो सकती हैं, फिर भी कुछ ही प्रजातियाँ संख्या में हावी हो सकती हैं। स्थानिक प्रजाति प्राकृतिक रूप से किसी खास क्षेत्र तक सीमित होती है। संकटग्रस्त प्रजाति के लुप्त होने का जोखिम बढ़ा हुआ होता है। दोनों शब्द समान नहीं हैं; कोई प्रजाति स्थानिक होकर भी फिलहाल संकटग्रस्त न हो सकती है और कोई व्यापक क्षेत्र वाली प्रजाति संकटग्रस्त हो सकती है।

महत्व और दबाव

जैव-विविधता भोजन, रेशा, औषधि, ईंधन, आनुवंशिक संसाधन और सांस्कृतिक महत्व वाले प्राकृतिक क्षेत्र देती है। परागण, पोषक तत्त्वों का चक्र, मिट्टी बनना, जल का नियमन, अपघटन और प्राकृतिक कीट नियंत्रण इसके पारिस्थितिक लाभ हैं। खेती में आनुवंशिक विविधता इसलिए ज़रूरी है कि एक जैसी फसलें किसी रोग या सूखे के प्रति एक जैसी कमजोरी रख सकती हैं, जबकि विविध बीज-संसाधन प्रजनन के लिए विकल्प देते हैं।

मुख्य खतरे हैं—आवास की हानि, गुणवत्ता में गिरावट और विखंडन; जरूरत से अधिक दोहन; बाहरी आक्रामक प्रजातियाँ; प्रदूषण; जलवायु परिवर्तन; और परस्पर निर्भर प्रजातियों का साथ-साथ लुप्त होना। विखंडन केवल क्षेत्रफल नहीं घटाता, वह समूहों को अलग करता, जीन प्रवाह रोकता और किनारे के प्रभाव बढ़ाता है। बाहर से आई हर प्रजाति आक्रामक नहीं होती; आक्रामक वही है जो नए क्षेत्र में जमकर पारिस्थितिक या आर्थिक नुकसान करे। परीक्षा में समृद्धि को समानता, स्थानिक को संकटग्रस्त, आवास को पारिस्थितिक भूमिका और संरक्षण को केवल प्रसिद्ध पशुओं की रक्षा मानने की गलती न करें। राजस्थान के थार, अरावली, पूर्वी वन, घासभूमि और आर्द्रभूमि अलग अनुकूलन दिखाते हैं, इसलिए उनका प्रबंधन भी अलग होगा।

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