राजकोषीय एवं मौद्रिक नीति, मुद्रास्फीति, सब्सिडी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, ई-कॉमर्स
मुख्य तथ्य
- मौद्रिक नीति में आरबीआई, मौद्रिक नीति समिति, रेपो दर, तरलता गलियारा और आरक्षित अनुपात मुख्य हैं।
- राजकोषीय नीति में केंद्र और राज्य बजट कर, व्यय, उधारी और अंतरण से मांग को प्रभावित करते हैं।
- अप्रैल 2021 से मार्च 2026 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति का अधिसूचित लक्ष्य 4 प्रतिशत और सहनशीलता दायरा 2 से 6 प्रतिशत था।
- एफआरबीएम अनुशासन राजकोषीय घाटे, सरकारी ऋण और बजट में दी जाने वाली पारदर्शिता संबंधी जानकारी को आपस में जोड़कर देखता है।
- जीएसटी, कर उछाल, वित्त आयोग से मिलने वाला हिस्सा और योजनाओं का वित्तपोषण मिलकर केंद्र और राज्य के बीच पैसे के लेन-देन का रास्ता तय करते हैं।
मुख्य बिंदु
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मौद्रिक नीति में आरबीआई, मौद्रिक नीति समिति, रेपो दर, तरलता गलियारा और आरक्षित अनुपात मुख्य हैं।
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राजकोषीय नीति में केंद्र और राज्य बजट कर, व्यय, उधारी और अंतरण से मांग को प्रभावित करते हैं।
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अप्रैल 2021 से मार्च 2026 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति का अधिसूचित लक्ष्य 4 प्रतिशत और सहनशीलता दायरा 2 से 6 प्रतिशत था।
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एफआरबीएम अनुशासन राजकोषीय घाटे, सरकारी ऋण और बजट में दी जाने वाली पारदर्शिता संबंधी जानकारी को आपस में जोड़कर देखता है।
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जीएसटी, कर उछाल, वित्त आयोग से मिलने वाला हिस्सा और योजनाओं का वित्तपोषण मिलकर केंद्र और राज्य के बीच पैसे के लेन-देन का रास्ता तय करते हैं।
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राजस्थान की राजकोषीय तस्वीर उसके घाटा अनुपात, ऋण भार, ऊर्जा क्षेत्र में निवेश और कर-बंटवारे में मिलने वाले हिस्से से तय होती है।
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रेपो, रिवर्स रेपो दर, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ), सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ), नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर), वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) और खुले बाजार की कार्रवाइयां (ओएमओ) कीमत, मात्रा, प्रतिभूति और तरलता-प्रभाव के आधार पर अलग हैं।
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राजस्व घाटा, राजकोषीय घाटा और प्राथमिक घाटा उधारी ज़रूरत के अलग-अलग हिस्से मापते हैं।
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नीति का ढांचा और रेपो दर चक्र
मौद्रिक और राजकोषीय नीति व्यापक आर्थिक स्थिरता के दो अलग साधन हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक मौद्रिक नीति से धन की कीमत और मात्रा बदलता है, जबकि निर्वाचित सरकारें बजट के ज़रिए सार्वजनिक प्राप्तियां, खर्च और उधारी बदलती हैं। दर में कटौती अल्पकालीन नीति-संकेत घटाती है और कुछ समय बाद ऋण दरों को कम कर सकती है; अधिक राजकोषीय घाटा सरकारी उधारी बढ़ाता है और हालात के अनुसार मांग को सहारा दे सकता है या निजी क्षेत्र के लिए ऋण कम कर सकता है। संस्थागत अंतर साफ है: आरबीआई रेपो, रिवर्स रेपो दर, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ), सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ), नकद आरक्षित अनुपात (सीआरआर), वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) और खुले बाजार की कार्रवाइयों (ओएमओ) का इस्तेमाल करता है; केंद्र और राज्य सरकारें कर, खर्च, सब्सिडी, उधारी, अंतरण और गारंटी का इस्तेमाल करती हैं।
यह अंतर नीति की एक आम भूल से भी बचाता है। आसान मौद्रिक नीति कर्ज सस्ता कर सकती है, लेकिन वह यह तय नहीं करती कि पैसा किस सड़क, नहर, स्वास्थ्य केंद्र या बिजली फीडर को मिलेगा। राजकोषीय विस्तार ऐसी परिसंपत्तियां बना सकता है, लेकिन स्थिर कीमतों के लिए ज़रूरी मुद्रा और ऋण की दशाएं वह अकेले कायम नहीं रख सकता। दोनों नीतियां एक दिशा में चलें तो कुल मांग तेजी से बदलती है; दिशाएं अलग हों तो अंतिम असर बैंकों, बांड प्रतिफल, कर-संग्रह और परिवारों की अपेक्षाओं पर निर्भर करता है।
17 जुलाई 2026 को आरबीआई के आधिकारिक दर-पृष्ठ के अनुसार नीति रेपो दर 5.25 प्रतिशत, एसडीएफ 5.00 प्रतिशत तथा एमएसएफ और बैंक दर 5.50 प्रतिशत थीं। इससे पहले 2024-25 के मौद्रिक नीति समिति चक्र में लंबे 6.50 प्रतिशत विराम के बाद रेपो दर 7 फरवरी 2025 को 6.25 प्रतिशत और 9 अप्रैल 2025 को 6.00 प्रतिशत हुई थी। अप्रैल 2025 के फैसले में एसडीएफ 5.75 प्रतिशत तथा एमएसएफ और बैंक दर 6.25 प्रतिशत रखी गई थीं; ये अब केवल उस ऐतिहासिक चरण की दरें हैं। रेपो दर से जुड़े सवाल में देखें कि कौन किसे उधार देता है, दर क्या है, प्रतिभूति कौन-सी है और तरलता पर क्या असर पड़ता है। रेपो से बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियों के बदले रातोंरात तरलता मिलती है; रिवर्स रेपो दर से बैंकों की तरलता सोखी जाती है; एसडीएफ बिना प्रतिभूति के अधिशेष धन सोखती है।
राजस्थान में यही ढांचा उधारी लागत, बिजली क्षेत्र की तरलता और आधारभूत ढांचा परियोजनाओं में दिखता है। राजस्थान बजट 2025-26 ने राजकोषीय घाटा 84,643.63 करोड़ रुपये, यानी राज्य सकल घरेलू उत्पाद का 4.25 प्रतिशत, अनुमानित किया। आरबीआई की नरमी से ऋण चुकाने और परियोजनाओं के लिए धन जुटाने की लागत घट सकती है, लेकिन इससे राजकोषीय गणना खत्म नहीं होती। सौर ऊर्जा, सड़क और जल ढांचे का विस्तार कर रहे राज्य के लिए रेपो चक्र का असर बांड प्रतिफल, बैंक ऋण दर और सार्वजनिक ऋण की लागत से आता है।
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