भारत — भौतिक विभाग, कृषि, खनिज, उद्योग, पारिस्थितिकी
मुख्य तथ्य
- भारत के 6 बड़े भौतिक विभाग हैं: हिमालय, उत्तरी मैदान, प्रायद्वीपीय पठार, भारतीय मरुस्थल, तटीय मैदान और द्वीप समूह।
- हिमालय युवा वलित पर्वत हैं, जबकि प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन और तुलनात्मक रूप से स्थिर भू-भाग है।
- उत्तरी मैदान मुख्यतः सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी-तंत्रों तथा उनकी सहायक नदियों के निक्षेप से बने हैं।
- अपवाह का रूप धरातल और चट्टानों की बनावट से जुड़ा है; हिमालयी नदियाँ आमतौर पर बारहमासी हैं, जबकि कई प्रायद्वीपीय नदियाँ मौसमी वर्षा पर अधिक निर्भर हैं।
- खरीफ फसलें दक्षिण-पश्चिम मानसून, रबी फसलें ठंडी शीत ऋतु और ज़ायद फसलें छोटी ग्रीष्म अवधि से जुड़ी हैं।
मुख्य बिंदु
- 1
भारत के 6 बड़े भौतिक विभाग हैं: हिमालय, उत्तरी मैदान, प्रायद्वीपीय पठार, भारतीय मरुस्थल, तटीय मैदान और द्वीप समूह।
- 2
हिमालय युवा वलित पर्वत हैं, जबकि प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन और तुलनात्मक रूप से स्थिर भू-भाग है।
- 3
उत्तरी मैदान मुख्यतः सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी-तंत्रों तथा उनकी सहायक नदियों के निक्षेप से बने हैं।
- 4
अपवाह का रूप धरातल और चट्टानों की बनावट से जुड़ा है; हिमालयी नदियाँ आमतौर पर बारहमासी हैं, जबकि कई प्रायद्वीपीय नदियाँ मौसमी वर्षा पर अधिक निर्भर हैं।
- 5
खरीफ फसलें दक्षिण-पश्चिम मानसून, रबी फसलें ठंडी शीत ऋतु और ज़ायद फसलें छोटी ग्रीष्म अवधि से जुड़ी हैं।
- 6
फसल सघनता निकालने का सूत्र है: सकल बोया क्षेत्र ÷ शुद्ध बोया क्षेत्र × 100।
- 7
खनिजों को सामान्यतः धात्विक, अधात्विक और ऊर्जा खनिजों में बाँटा जाता है; केवल धातु की मौजूदगी से कोई पदार्थ अयस्क नहीं बनता, आर्थिक निष्कर्षण भी संभव होना चाहिए।
- 8
उद्योग की जगह कच्चे माल, ऊर्जा, पानी, श्रम, पूँजी, परिवहन, बाज़ार, तकनीक और नीति के मिले-जुले असर से तय होती है।
- 9
राजस्थान में शुष्क कृषि और सिंचाई प्रबंधन का संबंध खनिज, वस्त्र, पत्थर, सीमेंट और कृषि-प्रसंस्करण उद्योगों से जुड़ता है।
- 10
पारिस्थितिकी तंत्र में जैव और अजैव घटक उत्पादकता, अपघटन, ऊर्जा प्रवाह और पोषक-चक्र से जुड़े रहते हैं।
- 11
ऊर्जा एक दिशा में बहती है और हर अगले पोषी स्तर पर घटती है, जबकि पोषक तत्त्व जैव-भू-रासायनिक चक्रों से फिर उपयोग में आते हैं।
- 12
जैव-विविधता आनुवंशिक, प्रजातीय और पारिस्थितिकी-तंत्र स्तर पर होती है; संरक्षण प्राकृतिक आवास और आवास से बाहर, दोनों तरीकों से किया जाता है।
आगे पढ़ें
भारत का भौतिक ढाँचा
6 प्रमुख विभाग
भारत के धरातल को 6 बड़े भौतिक विभागों से समझना सबसे आसान है: हिमालय पर्वत, उत्तरी मैदान, प्रायद्वीपीय पठार, भारतीय मरुस्थल, तटीय मैदान और द्वीप समूह। यह बँटवारा केवल नामों की सूची नहीं है। इसके पीछे भूवैज्ञानिक इतिहास, चट्टानी बनावट, ऊँचाई, ढाल और प्रमुख स्थलरूप काम करते हैं। धरातल नदियों की दिशा, मिट्टी बनने की प्रक्रिया, परिवहन मार्ग, बसावट, खेती की संभावना, खनिजों की उपलब्धता और पारिस्थितिक दशाओं को प्रभावित करता है।
हिमालय और उत्तरी मैदान
हिमालय उत्तरी सीमा के साथ फैले भूवैज्ञानिक रूप से युवा वलित पर्वत हैं। तीखी ढाल, बहुत अधिक ऊँचाई, गहरी घाटियाँ, हिमनद और तेज़ बहती नदियाँ इनके युवा धरातल की पहचान हैं। उत्तर से दक्षिण की ओर प्रमुख समानांतर श्रेणियाँ महान या आंतरिक हिमालय, लघु हिमालय और शिवालिक हैं। श्रेणियों के बीच की घाटियाँ बसावट और आवागमन के लिए स्थानीय महत्व रखती हैं। भारत-म्यांमार सीमा की ओर मुड़ती पूर्वी पहाड़ियों को सामूहिक रूप से पूर्वांचल व्यवस्था से जोड़ा जाता है। हिम और हिमनद कई बड़ी नदियों को पानी देते हैं, जबकि पर्वत-दीवार मानसूनी हवाओं और तापमान को प्रभावित करती है।
उत्तरी मैदान मुख्यतः सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी-तंत्रों तथा उनकी सहायक नदियों के जलोढ़ निक्षेप से बने हैं। कम ढाल, गहरी जलोढ़ मिट्टी, चौड़े बाढ़ मैदान और उपजाऊ भूमि ने घनी बसावट तथा गहन खेती को सहारा दिया है। चार शब्द साफ़ अलग रखें। भाबर हिमालय की तलहटी का छिद्रदार पट्टा है, जहाँ मोटा मलबा जमा होता है और धाराएँ धरातल के नीचे जा सकती हैं। उसके दक्षिण का तराई भाग वह क्षेत्र है जहाँ पानी फिर ऊपर आता है और पहले दलदली दशाएँ आम थीं। बांगर थोड़ा ऊँचा पुराना जलोढ़ है, जबकि खादर बाढ़ से बार-बार नया होने वाला जलोढ़ है। पुराना और नया का अर्थ अनुपयोगी और उपयोगी नहीं है; दोनों पर खेती हो सकती है, पर उनकी ऊँचाई, बनावट और बाढ़ का जोखिम अलग रहता है।
पठार, मरुस्थल, तट और द्वीप
प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन और तुलनात्मक रूप से स्थिर भू-खंड है, जो बड़े भाग में आग्नेय और कायांतरित चट्टानों से बना है। नर्मदा के उत्तर में मध्य उच्चभूमि और दक्षिण में मुख्यतः दक्कन का पठार है। पश्चिमी घाट अधिक लगातार और आमतौर पर ऊँचा किनारा बनाते हैं; पूर्वी घाट नीचे तथा खंडित हैं क्योंकि बड़ी नदियाँ उन्हें काटती हुई समुद्र तक जाती हैं। कठोर चट्टानें, कटा-फटा धरातल और खनिजयुक्त संरचनाएँ यहाँ जलप्रपात, जलविद्युत स्थलों तथा खनिज-आधारित उद्योगों की स्थिति समझाती हैं।
भारतीय मरुस्थल अरावली के पश्चिम में है। कम वर्षा, विरल वनस्पति, रेतीले मैदान, बालू के टीले, आंतरिक अपवाह और बरसाती धाराएँ इसकी पहचान हैं। लूनी इस क्षेत्र का प्रमुख नदी-तंत्र है, पर बहुत-सा बहाव मौसमी रहता है। पश्चिमी तटीय मैदान आमतौर पर संकरा है, जबकि पूर्वी तटीय मैदान अधिक चौड़ा है और पूर्व की ओर बहने वाली बड़ी नदियाँ वहाँ डेल्टा बनाती हैं। लक्षद्वीप की उत्पत्ति प्रवाल से जुड़ी है; अंडमान और निकोबार अलग भूवैज्ञानिक बनावट वाली द्वीप-श्रृंखला हैं।
परीक्षा में अंतर: भौतिक प्रदेश धरातल और उत्पत्ति बताता है; अपवाह बेसिन वह भू-क्षेत्र है जिसका पानी किसी नदी और उसकी सहायक नदियों में बहता है; कृषि-जलवायु प्रदेश जलवायु, मिट्टी और खेती की दशाओं को साथ रखता है। इनकी सीमाएँ मिल सकती हैं, पर एक जैसी नहीं होतीं।
पूरा नोट खोलें
यह सार्वजनिक पृष्ठ पहला उपलब्ध खंड दिखाता है। स्टडी पैक पूरा विषय और सभी पुनरावलोकन सामग्री खोलता है।
7 और खंड पूरे नोट में हैं
स्टडी पैक खोलें