19वीं-20वीं सदी के सामाजिक एवं धार्मिक सुधार आन्दोलन
मुख्य तथ्य
- राममोहन राय ने 1828 में ब्रह्म सभा बनाई, जो आगे ब्रह्म समाज के नाम से जानी गई।
- सती प्रथा पर 1829 का निषेध राममोहन राय के अभियान सहित लम्बी सार्वजनिक आलोचना के बाद आया।
- ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का निकट सम्बन्ध विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा और 1856 के कानून से है।
- आत्माराम पाण्डुरंग ने 1867 में बम्बई में प्रार्थना समाज बनाया और रानाडे उसके प्रमुख नेता बने।
- ज्योतिराव फुले ने जाति-उत्पीड़न के विरोध और बराबरी के लिए 1873 में सत्यशोधक समाज बनाया।
मुख्य बिंदु
- 1
सामाजिक-धार्मिक सुधार ने सामाजिक प्रथाओं की आलोचना को धार्मिक अधिकार की नई व्याख्या से जोड़ा।
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राममोहन राय ने 1828 में ब्रह्म सभा बनाई, जो आगे ब्रह्म समाज के नाम से जानी गई।
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सती प्रथा पर 1829 का निषेध राममोहन राय के अभियान सहित लम्बी सार्वजनिक आलोचना के बाद आया।
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ईश्वरचन्द्र विद्यासागर का निकट सम्बन्ध विधवा पुनर्विवाह, महिला शिक्षा और 1856 के कानून से है।
- 5
आत्माराम पाण्डुरंग ने 1867 में बम्बई में प्रार्थना समाज बनाया और रानाडे उसके प्रमुख नेता बने।
- 6
ज्योतिराव फुले ने जाति-उत्पीड़न के विरोध और बराबरी के लिए 1873 में सत्यशोधक समाज बनाया।
- 7
दयानन्द सरस्वती ने 1875 में बम्बई में आर्य समाज बनाया और वेदों को सर्वोच्च प्रमाण मानने को सुधार का आधार बनाया।
- 8
विवेकानन्द ने 1893 में शिकागो धर्म संसद को सम्बोधित किया और 1897 में रामकृष्ण मिशन बनाया।
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ब्लावात्स्की और ऑल्कॉट ने 1875 में अमेरिका में थियोसोफिकल सोसाइटी बनाई; अड्यार उसका भारतीय मुख्यालय बना।
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सर सैयद अहमद खान ने 1875 में अलीगढ़ में मदरसतुल उलूम नामक स्कूल स्थापित किया; यह 1877 में आधुनिक शिक्षा के केन्द्र के रूप में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएण्टल कॉलेज बना।
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1903 में बनी श्री नारायण धर्म परिपालन योगम ने नारायण गुरु के जाति-विरोधी समाज सुधार को संगठित रूप दिया।
- 12
बाल विवाह अवरोध अधिनियम 1929 में पारित हुआ, 1 अप्रैल 1930 से लागू हुआ और शारदा अधिनियम कहलाया।
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सुधार का अर्थ, पृष्ठभूमि और तरीके
सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलन का अर्थ ऐसी संगठित कोशिश से है जो समाज की किसी प्रथा, धर्म की किसी प्रचलित व्याख्या या दोनों में बदलाव लाना चाहती थी। यह संयुक्त नाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 19वीं सदी के बहुत से सुधारक सामाजिक रीति को उस धार्मिक मान्यता से अलग नहीं मानते थे जिसके सहारे उसे सही ठहराया जाता था। इसलिए उन्होंने एक साथ कई रास्ते अपनाए—धर्मग्रन्थों की नई व्याख्या, नैतिक तर्क, सार्वजनिक बहस, शिक्षा, संस्था बनाना, पत्र-पत्रिकाएँ चलाना और कानून की माँग करना। यह कोई एक केन्द्र से चला अभियान नहीं था; अलग समुदायों और इलाकों में अलग लक्ष्य और तरीके सामने आए।
औपनिवेशिक शासन के दौर में अंग्रेज़ी शिक्षा, छपाई, मिशनरियों की आलोचना, भारतीय ग्रन्थों का नया अध्ययन तथा स्वतंत्रता, समानता और वैज्ञानिक सोच से जुड़ी बहसें बढ़ीं। फिर भी इन आन्दोलनों को केवल पश्चिम की नकल या अंग्रेज़ सरकार की देन समझना गलत है। भारतीय सुधारकों ने अपने धार्मिक और बौद्धिक आधार पर नई बातों को चुना, बदला या ठुकराया। किसी ने मूल धर्मग्रन्थों की ओर लौटने की बात कही, किसी ने एकेश्वरवाद और तर्क पर ज़ोर दिया, किसी ने जाति-आधारित सत्ता को सीधे चुनौती दी और किसी ने शिक्षा व सेवा को बदलाव का मुख्य साधन बनाया।
तरीके के आधार पर पाँच धाराएँ समझी जा सकती हैं। सुधारवादी धारा परम्परा के भीतर रहकर प्रथा बदलती थी। पुनरुत्थानवादी धारा मानती थी कि मूल शुद्ध परम्परा बाद में बिगड़ गई। बराबरी की धारा जाति और लिंग से बनी ऊँच-नीच पर चोट करती थी। शैक्षिक धारा स्कूल, कॉलेज, अनुवाद संस्था और पत्रिका बनाती थी। सेवा की धारा धार्मिक नैतिकता को राहत, इलाज और शिक्षा के काम से जोड़ती थी। ये खाने एक-दूसरे से अलग नहीं थे; आर्य समाज में पुनरुत्थान, सुधार और शिक्षा साथ दिखते हैं, जबकि सत्यशोधक समाज में शिक्षा के साथ जाति-वर्चस्व का विरोध प्रमुख था।
कारण, तरीका और परिणाम अलग रखें। शिक्षा और छपाई बदलाव की परिस्थितियाँ थीं, अकेला कारण नहीं। किसी सुधारक की माँग और बाद में बने कानून को एक ही घटना न मानें। याद करने का अच्छा ढाँचा है—मुख्य व्यक्ति, पक्का वर्ष और स्थान, मूल विचार तथा खास काम। इससे ब्रह्म समाज और आर्य समाज जैसी संस्थाओं में भ्रम नहीं होगा और यह भी साफ़ रहेगा कि सभी आन्दोलन न तो पूरी तरह पश्चिम समर्थक थे, न पूरी तरह पुरानी व्यवस्था की वापसी चाहते थे।
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