स्थापत्य — दुर्ग, स्मारक; चित्रकला एवं हस्तशिल्प
मुख्य तथ्य
- यूनेस्को की राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग श्रृंखला के 6 घटक चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर, गागरोन, आमेर और जैसलमेर हैं।
- चित्तौड़गढ़ और कुंभलगढ़ मेवाड़ के संदर्भ से जुड़े हैं; कुंभलगढ़ 15वीं सदी में राणा कुंभा के शासन में बना और राजनीतिक संकट के समय शरण-स्थल रहा।
- आमेर एक महल-दुर्ग है, जिसके 4 प्रमुख आँगन-आधारित खंड रक्षा के साथ समारोह, निवास, पूजा और उद्यान की भूमिकाएँ भी निभाते हैं।
- जयपुर का जंतर मंतर नपे हुए विशाल स्थापत्य-यंत्रों से खगोलीय मापन करता है; इसे सवाई जयसिंह द्वितीय के शासन में 1734 में पूरा किया गया।
मुख्य बिंदु
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राजस्थान के दुर्ग को केवल एक रक्षात्मक इमारत नहीं, बल्कि द्वारों, परकोटों, जल-प्रबंध, महलों, धार्मिक भवनों, भंडारों और कभी-कभी आबाद नगर से बने किलेबंद भू-दृश्य के रूप में समझना चाहिए।
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यूनेस्को की राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग श्रृंखला के 6 घटक चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर, गागरोन, आमेर और जैसलमेर हैं।
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भू-आकृति ने रक्षा-रचना तय की: गागरोन को नदियों का सहारा मिला, रणथंभौर ने वनाच्छादित पहाड़ी का लाभ लिया, जैसलमेर ने मरुस्थलीय भूभाग का और अन्य पहाड़ी दुर्गों ने ऊँचाई तथा कठिन पहुँच का उपयोग किया।
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चित्तौड़गढ़ और कुंभलगढ़ मेवाड़ के संदर्भ से जुड़े हैं; कुंभलगढ़ 15वीं सदी में राणा कुंभा के शासन में बना और राजनीतिक संकट के समय शरण-स्थल रहा।
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आमेर एक महल-दुर्ग है, जिसके 4 प्रमुख आँगन-आधारित खंड रक्षा के साथ समारोह, निवास, पूजा और उद्यान की भूमिकाएँ भी निभाते हैं।
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जयपुर का जंतर मंतर नपे हुए विशाल स्थापत्य-यंत्रों से खगोलीय मापन करता है; इसे सवाई जयसिंह द्वितीय के शासन में 1734 में पूरा किया गया।
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राजस्थानी लघुचित्र एक ही समान शैली नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दरबारी परंपराओं का परिवार है; पहचान में संरक्षण-केंद्र, विषय, रंग-संयोजन, भू-दृश्य और आकृति-निर्माण को साथ देखना चाहिए।
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फड़ गायन-कथावाचन से जुड़ा चलायमान चित्रित कपड़ा है, जबकि नाथद्वारा पिछवाई श्रीनाथजी की पूजा पर केंद्रित भक्तिपरक पृष्ठ-वस्त्र है।
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सांगानेरी छपाई में हल्की पृष्ठभूमि पर नाज़ुक फूल-पत्तियाँ प्रमुख होती हैं, जबकि बगरू छपाई मिट्टी जैसे रंगों, लकड़ी के ठप्पों और सीधी तथा रोधक छपाई से गहराई से जुड़ी है।
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जयपुर की नीली पॉटरी सामान्य मिट्टी के बजाय क्वार्ट्ज-युक्त मिश्रण से बनती है; थेवा में रंगीन काँच पर सोने की बारीक जालीदार पत्ती जोड़ी जाती है और इसका प्रमुख संबंध प्रतापगढ़ से है।
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स्मारक संबंधी प्रश्न में उपयोग और रूप को अलग रखें: महल निवास तथा समारोह के लिए, मंदिर पूजा के लिए, बावड़ी जल तक पहुँच के लिए और स्मृति-छतरी दिवंगत व्यक्ति के स्मरण के लिए होती है।
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वस्तुनिष्ठ प्रश्न में हर स्थल या शिल्प को उसकी पहचान बताने वाली विशेषता से जोड़ें, फिर उन विकल्पों को हटाएँ जिनमें सही स्थान के साथ गलत सामग्री, उपयोग या दृश्य-लक्षण मिला दिया गया हो।
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राजस्थान के स्थापत्य को समझने का ढंग
स्थान और उपयोग से बनता स्थापत्य
राजस्थान का स्थापत्य कोई एक सजावटी शैली नहीं है। यह रक्षा, जलवायु, पानी, पूजा, निवास, शासन, व्यापार और स्मरण जैसी ज़रूरतों के अलग-अलग समाधान प्रस्तुत करता है। वस्तुनिष्ठ प्रश्न हल करते समय किसी इमारत को 4 जुड़ी कसौटियों पर पढ़ें: वह कहाँ स्थित है, उसका मुख्य उपयोग क्या था, वह किन साधनों से बनी और उसके कौन-से दृश्य तत्व प्रतिष्ठा या आस्था दिखाते हैं। पहाड़ी दुर्ग ऊँचाई और कठिन पहुँच का लाभ लेता है। मरुस्थलीय दुर्ग में सघन बसावट, भंडारण, छाया और कम पानी का नियंत्रण महत्वपूर्ण होता है। नदी से घिरा दुर्ग बहते जल को ही रक्षा का भाग बना लेता है। मोटी दीवारें, कम प्रवेश-द्वार, मोड़दार रास्ते और बाहर निकले बुर्ज सुरक्षा से जुड़े हैं। आँगन, छायादार गलियारे, जालीदार खुली जगहें और जल-नालियाँ गर्मी से राहत देती हैं तथा सामाजिक उपयोग में भी काम आती हैं।
उपयोग के आधार पर पहचान
- दुर्ग किलेबंद परिसर है। इसके भीतर महल, मंदिर, जलाशय, बाज़ार, घर और सैनिक स्थान हो सकते हैं।
- महल मुख्यतः निवास, शासन और समारोह के लिए होता है। वह दुर्ग के भीतर हो सकता है, पर दोनों शब्द एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।
- हवेली किसी संपन्न शहरी या व्यापारी परिवार का बड़ा घर है, जो प्रायः एक या अधिक आँगनों के चारों ओर बना होता है।
- मंदिर पूजा के लिए बना पवित्र स्थापत्य है; उसकी योजना और मूर्तिकला धार्मिक उपयोग से जुड़ी होती है।
- बावड़ी या सीढ़ीदार कुंड पानी तक क्रमबद्ध पहुँच देता है और सामाजिक तथा धार्मिक स्थान भी बन सकता है।
- स्मृति-छतरी किसी दिवंगत व्यक्ति का स्मारक है; वह अपने-आप मकबरा नहीं कहलाती।
दृश्य शब्दावली भी उतनी ही उपयोगी है। दीवार के ऊपरी किनारे की रक्षात्मक ओट को अलग पहचानें, जबकि परकोटा पूरे बड़े रक्षात्मक घेरे को बताता है। उससे बाहर निकला बुर्ज निगरानी और दोनों ओर रक्षा की पहुँच बढ़ाता है। पोल किलेबंद द्वार है। झरोखा दीवार से बाहर निकली बंद बालकनी या खिड़की है, जबकि जाली छिद्रदार पर्दा है जो दृष्टि, हवा और प्रकाश को नियंत्रित करता है। छतरी स्तंभों पर टिका गुंबददार मंडप है। मेहराब और गुम्बद पर आधारित निर्माण तथा स्तंभ-कड़ियों पर आधारित निर्माण राजस्थान में कई बार साथ दिखाई देते हैं।
इसीलिए राजपूत और मुगल जैसे नामों को बंद डिब्बों की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। विरासत-विवरण सल्तनती और मुगल रूपों के साथ आदान-प्रदान की बात करता है। स्थानीय पत्थर, पुरानी भारतीय योजना, दरबारी रुचि, कारीगरों की पकड़, सैनिक आवश्यकता और क्षेत्रों के बीच संपर्क एक ही परिसर को आकार दे सकते थे। जोड़ी मिलाने वाले प्रश्न में किसी अकेले अलंकरण से अधिक भरोसेमंद संकेत उपयोग और संदर्भ होते हैं। याद रखने का सीधा तरीका है—मोड़दार प्रवेश आक्रमणकारी की गति घटाता है, बुर्ज दीवार के किनारों की रक्षा बढ़ाता है, आँगन आवागमन और छाया व्यवस्थित करता है, जाली देखने-दिखने और हवा आने को नियंत्रित करती है और जलाशय घेराबंदी के दौरान जीवन बनाए रखता है।
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