राजस्थानी साहित्य एवं बोलियाँ
मुख्य तथ्य
- राजस्थानी को कई क्षेत्रीय बोलियों वाले भाषा-समूह के रूप में समझना सही है; इसे केवल मारवाड़ी का दूसरा नाम मानना गलत है।
- मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, वागड़ी, बागड़ी, शेखावाटी और अहीरवाटी प्रमुख क्षेत्रीय नाम हैं;
- मारवाड़ी मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान, मेवाड़ी मेवाड़, वागड़ी दक्षिणी वागड़ और ढूंढाड़ी जयपुर-ढूंढाड़ क्षेत्र से जुड़ी है।
- डिंगल और पिंगल ऐतिहासिक साहित्यिक शैलियाँ हैं; इन्हें आधुनिक बोलियों का पूरा वर्गीकरण नहीं समझना चाहिए।
- डिंगल मुख्यतः पश्चिमी राजस्थानी साहित्यिक परंपरा से जुड़ी है, जबकि पिंगल पूर्वी और ब्रज-प्रभावित साहित्यिक व्यवहार से संबंधित है।
मुख्य बिंदु
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राजस्थानी को कई क्षेत्रीय बोलियों वाले भाषा-समूह के रूप में समझना सही है; इसे केवल मारवाड़ी का दूसरा नाम मानना गलत है।
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मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती, वागड़ी, बागड़ी, शेखावाटी और अहीरवाटी प्रमुख क्षेत्रीय नाम हैं; इनके बीच की सीमाएँ पूरी तरह कठोर नहीं हैं।
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मारवाड़ी मुख्यतः पश्चिमी राजस्थान, मेवाड़ी मेवाड़, वागड़ी दक्षिणी वागड़ और ढूंढाड़ी जयपुर-ढूंढाड़ क्षेत्र से जुड़ी है।
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डिंगल और पिंगल ऐतिहासिक साहित्यिक शैलियाँ हैं; इन्हें आधुनिक बोलियों का पूरा वर्गीकरण नहीं समझना चाहिए।
- 5
डिंगल मुख्यतः पश्चिमी राजस्थानी साहित्यिक परंपरा से जुड़ी है, जबकि पिंगल पूर्वी और ब्रज-प्रभावित साहित्यिक व्यवहार से संबंधित है।
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राजस्थानी साहित्य में दरबारी और वीर काव्य, भक्ति पद, जैन लेखन, वंश तथा इतिहास-कथाएँ, लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, नाटक और आधुनिक गद्य शामिल हैं।
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मौखिक और लिखित परंपराएँ एक-दूसरे से जुड़ी हैं: प्रस्तुति कथा को जीवित रखती है, जबकि पांडुलिपि और छपाई उसके किसी रूप को स्थिर करती हैं।
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मीराबाई मध्यकालीन राजस्थानी साहित्य की भक्ति धारा का प्रमुख उदाहरण हैं, जबकि दादू परंपरा का बहुत-सा साहित्य ढूंढाड़ी क्षेत्र से जुड़ा है।
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साहित्य अकादेमी की सूची में राजस्थानी पुरस्कार 1974 से हैं; आरंभिक प्रविष्टि विजयदान देथा की लोककथा-कृति बातां री फुलवारी, खंड 10 है।
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आधुनिक राजस्थानी लेखन में कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, आलोचना, संस्मरण और अनुवाद सभी हैं; इसे केवल लोकसाहित्य तक सीमित मानना गलत है।
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जनगणना 2011 में राजस्थानी को हिंदी के अंतर्गत मातृभाषा के रूप में रखकर 2,58,06,344 वक्ता बताए गए; यह गणना-पद्धति साहित्यिक पहचान से अलग बात है।
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राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी प्रकाशन, शोध, अनुवाद, सर्वेक्षण, लोकसाहित्य-संग्रह और साहित्यकारों के सम्मान को बढ़ावा देती है।
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भाषा, बोली और राजस्थानी बोली-समूह
राजस्थानी राजस्थान और उससे लगे क्षेत्रों में बोली जाने वाली निकट संबंध वाली वाणी-परंपराओं का व्यापक नाम है। परीक्षा में तीन स्तर अलग रखने चाहिए। पहला व्यापक भाषा-परिचय राजस्थानी है। दूसरा क्षेत्रीय बोली का नाम है, जैसे मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी या वागड़ी। तीसरा विकसित साहित्यिक शैली का नाम है, जैसे डिंगल या पिंगल। इतिहास में इनका मेल हुआ है, पर ये एक ही चीज़ नहीं हैं। हर राजस्थानी बोली को मारवाड़ी कहना पूर्वी, दक्षिणी और उत्तर-पूर्वी परंपराओं को मिटा देता है। डिंगल को आज की साधारण बोलचाल की बोली कहना साहित्यिक रचना-शैली और रोज़मर्रा की बोलचाल को मिला देना है।
हर बोली में ध्वनि, शब्द, सर्वनाम, प्रत्यय और वाक्य-रचना की अपनी पसंद हो सकती है, फिर भी पड़ोसी बोलियाँ आपस में जुड़ी रहती हैं। गाँव और जिलों के बीच भाषा आमतौर पर धीरे-धीरे बदलती है। इसलिए बोली-मानचित्र मजबूत केंद्र और संक्रमण-क्षेत्र दिखाता है, दीवारें नहीं। जिले की सीमा रिवीजन में सहायक है, लेकिन वह भाषा की कठोर सीमा नहीं बनाती। पलायन, व्यापार, विवाह, तीर्थ, राजदरबार, संत परंपरा और लोक-प्रस्तुति ने शब्दों तथा रूपों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचाया है। एक ही व्यक्ति सार्वजनिक व्यवहार में व्यापक क्षेत्रीय रूप और घर में अधिक स्थानीय रूप बोल सकता है।
राजस्थान फाउंडेशन का सरकारी पृष्ठ मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी और वागड़ी को राजस्थानी बोलियों के उदाहरण के रूप में देता है। एक सरकारी सांस्कृतिक सामग्री पश्चिमी समूह में मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी और शेखावाटी तथा पूर्वी समूह में ढूंढाड़ी, हाड़ौती, मेवाती और अहीरवाटी रखती है। यह परीक्षा के लिए उपयोगी ढाँचा है, अंतिम और अकेला भाषावैज्ञानिक वर्गीकरण नहीं। दक्षिण की वागड़ी और अनेक स्थानीय उपरूप बताते हैं कि वास्तविक बोलचाल छोटी सूची से कहीं अधिक विविध है।
जनगणना का वर्गीकरण अलग सवाल का उत्तर देता है। गृह मंत्रालय के उत्तर के अनुसार जनगणना 2011 में राजस्थानी को हिंदी के अंतर्गत मातृभाषा मानकर 2,58,06,344 वक्ता दर्ज किए गए। इस सरकारी गणना से क्षेत्रीय बोलियाँ, साहित्यिक इतिहास और सांस्कृतिक पहचान समाप्त नहीं होते। प्रश्न हल करते समय पहले पहचानें कि पूछा क्या गया है—सरकारी सारणी, क्षेत्रीय बोली, साहित्यिक शैली या व्यापक भाषा-परंपरा।
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