लिंग, वचन, पुरुष, काल, वृत्ति, वाच्य
मुख्य तथ्य
- आरपीएससी एसआई हिंदी सिलेबस में परसर्ग, लिंग, वचन, पुरुष, काल, वृत्ति, पक्ष और वाच्य एक ही व्याकरणिक कोटि-समूह के रूप में पढ़े जाते हैं।
- लिंग प्रश्न में पहले नियंत्रक संज्ञा पहचाननी चाहिए, फिर विशेषण और क्रिया का अन्वय जांचना चाहिए।
- वचन प्रश्न केवल एकवचन-बहुवचन रूप तक सीमित नहीं रहते; आदरार्थक बहुवचन और एक वचन में प्रचलित शब्द भी पूछे जा सकते हैं।
- विकारी विशेषण संज्ञा के लिंग-वचन के अनुसार बदलते हैं, जबकि कई गुणवाचक विशेषण समान रूप में रहते हैं।
- “का”, “के” और “की” स्वामी से नहीं, स्वामित्व वाली संज्ञा से अन्वय रखते हैं।
मुख्य बिंदु
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आरपीएससी एसआई हिंदी सिलेबस में परसर्ग, लिंग, वचन, पुरुष, काल, वृत्ति, पक्ष और वाच्य एक ही व्याकरणिक कोटि-समूह के रूप में पढ़े जाते हैं।
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लिंग प्रश्न में पहले नियंत्रक संज्ञा पहचाननी चाहिए, फिर विशेषण और क्रिया का अन्वय जांचना चाहिए।
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वचन प्रश्न केवल एकवचन-बहुवचन रूप तक सीमित नहीं रहते; आदरार्थक बहुवचन और एक वचन में प्रचलित शब्द भी पूछे जा सकते हैं।
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विकारी विशेषण संज्ञा के लिंग-वचन के अनुसार बदलते हैं, जबकि कई गुणवाचक विशेषण समान रूप में रहते हैं।
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“का”, “के” और “की” स्वामी से नहीं, स्वामित्व वाली संज्ञा से अन्वय रखते हैं।
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पुरुष की पहचान सर्वनामों और उनसे मेल खाने वाली सहायक क्रियाओं से होती है।
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परसर्ग कर्ता, कर्म, करण, स्रोत, स्थान, तुलना और अधिकार जैसे संबंधों को चिह्नित करते हैं।
- 8
“ने” पूर्ण सकर्मक रचनाओं में कर्ता को चिह्नित करता है, पर हर कर्ता के साथ “ने” नहीं लगाया जाता।
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काल क्रिया को वर्तमान, भूत या भविष्य समय में रखता है, जबकि पक्ष क्रिया की आदत, निरंतरता या पूर्णता दिखाता है।
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वृत्ति वक्ता का भाव बताती है, जैसे कथन, आदेश, अनुरोध, इच्छा, संभावना या शर्त।
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वाच्य प्रश्न में देखना होता है कि वाक्य कर्ता-केंद्रित है, कर्म-केंद्रित है या क्रिया-भाव-केंद्रित है।
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कर्मवाच्य परिवर्तन में मूल काल, पक्ष, अर्थ और लिंग-वचन अन्वय सुरक्षित रहना चाहिए।
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भाववाच्य में प्रायः असमर्थता, संभावना या अनिर्दिष्ट क्रिया-भाव आता है, केवल कर्म को आगे नहीं किया जाता।
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वस्तुनिष्ठ व्याकरण में सही उत्तर के लिए संज्ञा, सर्वनाम, परसर्ग और क्रिया-संकेतों को तय क्रम में पढ़ना चाहिए।
लिंग, वचन, पुरुष, काल, वृत्ति, पक्ष और वाच्य को साथ पढ़ने का सही तरीका क्या है?
लिंग, वचन, पुरुष, काल, वृत्ति, पक्ष और वाच्य को अलग-अलग परिभाषाओं की सूची की तरह नहीं, बल्कि वाक्य में संज्ञा, सर्वनाम, परसर्ग और क्रिया के संबंध पहचानने वाली जुड़ी हुई व्यवस्था की तरह पढ़ना चाहिए। आरपीएससी के प्रथम हिंदी प्रश्नपत्र के आधिकारिक पाठ्यक्रम में व्याकरणिक कोटियों के अंतर्गत परसर्ग, लिंग, वचन, पुरुष, काल, वृत्ति, पक्ष और वाच्य सहित ८ नाम दिए गए हैं। आरपीएससी एसआई हिंदी के लिए यह विषय आठ अलग-अलग परिभाषाओं की सूची नहीं, बल्कि व्याकरणिक कोटियों की एक जुड़ी हुई व्यवस्था है। प्रथम हिंदी प्रश्नपत्र के आधिकारिक पाठ्यक्रम में परसर्ग, लिंग, वचन, पुरुष, काल, वृत्ति, पक्ष और वाच्य को इसी समूह में रखा गया है। तैयारी में यह क्रम उपयोगी है, क्योंकि प्रश्न प्रायः छोटे वाक्यों में पहचान मांगते हैं: स्त्रीलिंग रूप कौन-सा है, वचन कौन-सा है, परसर्ग उचित है या नहीं, काल या पक्ष क्या है, और वाक्य किस वाच्य का है। परीक्षा में स्नातक-स्तर के अभ्यर्थी से भाषाविज्ञान का लंबा निबंध नहीं मांगा जाता; उसे वाक्य में छिपे व्याकरणिक संकेत को जल्दी पकड़कर पास-पास दिखने वाले विकल्पों को अलग करना होता है।
पहली सीमा संज्ञा-सम्बन्धी और क्रिया-सम्बन्धी कोटियों के बीच है। लिंग और वचन मुख्यतः संज्ञा, सर्वनाम तथा उनसे अन्वय रखने वाले शब्दों से जुड़े हैं। हिंदी में कई विशेषण और क्रियाएँ भी लिंग-वचन के अनुसार बदलती हैं, इसलिए संज्ञा की कोटि केवल संज्ञा तक सीमित नहीं रहती। “लड़की आई” में स्त्रीलिंग एकवचन संज्ञा के अनुसार “आई” रूप आया है। “लड़के आए” में पुल्लिंग बहुवचन के अनुसार “आए” है। इसके विपरीत काल, वृत्ति, पक्ष और वाच्य क्रिया-व्यवस्था से जुड़े हैं। ये बताते हैं कि क्रिया किस समय में है, बोलने वाला उसे किस भाव से कह रहा है, क्रिया पूरी है या चल रही है, और वाक्य में कर्ता, कर्म या क्रिया-भाव में से किसे मुख्य बनाया गया है।
दूसरी सीमा रूप और कार्य के बीच है। केवल सतही शब्द देखकर उत्तर चुनना खतरनाक हो सकता है। “राम ने पत्र लिखा” में “ने” है, पर परीक्षा का बिंदु सिर्फ उसका नाम बताना नहीं है; यहाँ पूर्ण भूतकालीन सकर्मक क्रिया के साथ कर्ता-पक्ष का परसर्ग पहचाना जाता है। “मोहन को बुलाओ” में “को” है, पर संबंध कर्म-चिह्नन का है, केवल दिशा या गंतव्य का नहीं। इसी तरह “वह जाता है” साधारण विद्यालयी व्याकरण में वर्तमान सामान्य या आदतन प्रयोग है, जबकि “वह जा रहा है” वर्तमान में जारी क्रिया का पक्ष दिखाता है। यदि एक विकल्प केवल “वर्तमान काल” कहे और दूसरा विकल्प “वर्तमान में जारी पक्ष” की ओर संकेत करे, तो उत्तर प्रश्न के निर्देश-शब्द पर निर्भर करेगा।
तीसरी सीमा पारंपरिक हिंदी शब्दों और पाठ्यक्रम में दिखने वाली व्याकरणिक धारणा के बीच है। वृत्ति क्रिया के प्रति वक्ता का भाव है, जैसे कथन, आदेश, इच्छा, संभावना या शर्त। पक्ष क्रिया की भीतरी अवस्था बताता है, जैसे आदत, निरंतरता या पूर्णता। वाच्य यह बताता है कि क्रिया और वाक्य के सहभागी में किसे प्रमुखता दी गई है। “बालक ने फल खाया” कर्ता-केंद्रित है, “फल बालक द्वारा खाया गया” कर्म-केंद्रित है, और “मुझसे चला नहीं जाता” में क्रिया-भाव या असमर्थता मुख्य है।
वस्तुनिष्ठ व्याकरण के लिए सबसे सुरक्षित पद्धति चार चरणों की जांच है। पहले सीमित क्रिया और सहायक क्रिया खोजिए: “है”, “था”, “होगा”, “रहा”, “चुका”, “जाता”, “गया” जैसे संकेत काल, पक्ष या वाच्य खोल देते हैं। दूसरे, नियंत्रक संज्ञा या सर्वनाम पहचानकर अन्वय जांचिए। तीसरे, “ने”, “को”, “से”, “पर”, “में”, “का”, “के”, “की” जैसे परसर्गों पर ध्यान दीजिए, क्योंकि ये कारक-संबंध और क्रिया-अन्वय बदल सकते हैं। चौथे, यह देखिए कि प्रश्न वास्तव में किस कोटि की परीक्षा ले रहा है। लिंग के प्रश्न में काल का भ्रम दिया जा सकता है और वाच्य के प्रश्न में कर्मवाच्य जैसा दिखने वाला वाक्य गलत अन्वय के कारण अस्वीकार्य हो सकता है। इसलिए इस पूरे विषय को संज्ञा-कोटि, सर्वनाम-पुरुष, परसर्ग-संबंध, क्रिया-काल-पक्ष-वृत्ति और वाच्य-परिवर्तन की निदान-सारणी के रूप में दोहराना चाहिए।
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