वाक्य-शुद्धि
मुख्य तथ्य
- वाक्य-शुद्धि पूरे वाक्य के स्तर पर सुधार की जांच है; यह केवल वर्तनी या शब्द-शुद्धि नहीं है।
- अन्वय-दोष तब बनता है जब लिंग, वचन या पुरुष का मेल कर्ता, कर्म, विशेषण और क्रिया के बीच न रहे।
- पूर्णभूत सकर्मक वाक्यों में ने और कर्म पर को लगना क्रिया के अन्वय को प्रभावित कर सकता है।
- का, की और के का रूप संबंधित वस्तु या संज्ञा से मिलना चाहिए, केवल स्वामी से नहीं।
- गलत परसर्ग परिचित शब्दों वाले वाक्य का भी कारक-संबंध बदल सकता है।
मुख्य बिंदु
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वाक्य-शुद्धि पूरे वाक्य के स्तर पर सुधार की जांच है; यह केवल वर्तनी या शब्द-शुद्धि नहीं है।
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अन्वय-दोष तब बनता है जब लिंग, वचन या पुरुष का मेल कर्ता, कर्म, विशेषण और क्रिया के बीच न रहे।
- 3
पूर्णभूत सकर्मक वाक्यों में ने और कर्म पर को लगना क्रिया के अन्वय को प्रभावित कर सकता है।
- 4
का, की और के का रूप संबंधित वस्तु या संज्ञा से मिलना चाहिए, केवल स्वामी से नहीं।
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गलत परसर्ग परिचित शब्दों वाले वाक्य का भी कारक-संबंध बदल सकता है।
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दोहरे से, अनावश्यक को या द्वारा से जैसे प्रयोग वाक्य को मानक हिंदी में अशुद्ध बना सकते हैं।
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केवल, ही, भी और संबंधित जैसे शब्द गलत जगह आएँ तो वाक्य का अर्थ बदल जाता है।
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सर्वनाम तभी शुद्ध है जब उसका संदर्भ वाक्य में एक ही व्यक्ति या वस्तु की ओर साफ संकेत करे।
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अधिक, कम, श्रेष्ठ और बेहतर जैसे तुलनात्मक शब्द कई बार तुलना का स्पष्ट आधार मांगते हैं।
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काल, पक्ष, वाच्य और वृत्ति में बदलाव तभी स्वीकार्य है जब वाक्य का अर्थ उसे सही ठहराता हो।
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कर्तृवाच्य और कर्मवाच्य को बिना रचना बदले मिलाने से ने और किया गया जैसे रूप टकरा जाते हैं।
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वस्तुनिष्ठ प्रश्नों में स्थिर जांच-क्रम रखें: अन्वय, कारक-परसर्ग, क्रम-स्पष्टता और काल-वाच्य-वृत्ति।
वाक्य-शुद्धि में असल में क्या जाँचना होता है?
वाक्य-शुद्धि में पूरे वाक्य का व्याकरण, शब्दों का आपसी संबंध, क्रम, अर्थ और संगति जाँची जाती है, ताकि तय हो सके कि वाक्य मानक हिंदी में सही बैठता है या नहीं। वाक्य-शुद्धि का अर्थ पूरे वाक्य के स्तर पर अशुद्धि पहचानना और उसे ठीक करना है। यह केवल वर्तनी या शब्द-शुद्धि नहीं है। किसी शब्द की गलत लिखावट मुख्यतः शब्द-शुद्धि में आएगी, लेकिन वाक्य-शुद्धि की अशुद्धि तब बनती है जब पूरा वाक्य व्याकरण, संबंध, क्रम, अर्थ या संगति के स्तर पर ठीक न बैठे। आरपीएससी उपनिरीक्षक प्रथम प्रश्नपत्र में यह भेद जरूरी है, क्योंकि हिंदी के आधिकारिक पाठ्यक्रम में शब्द-शुद्धि, व्याकरणिक कोटियां, वाक्य-रचना और वाक्य-शुद्धि अलग-अलग शीर्षक हैं। राजस्थान लोक सेवा आयोग के आधिकारिक उपनिरीक्षक पाठ्यक्रम के अनुसार प्रथम हिंदी प्रश्नपत्र अधिकतम २०० अंकों का है। इसलिए वाक्य-शुद्धि को सुधार-प्रधान विषय की तरह पढ़ना चाहिए। परीक्षक वाक्य या विकल्पों का समूह देता है और अभ्यर्थी से अपेक्षा करता है कि वह बताए कौन-सा वाक्य व्याकरण और अर्थ की दृष्टि से मानक है।
काम की कसौटी सरल है: वाक्य में हर शब्द दूसरे शब्दों के साथ अपना सही काम कर रहा है या नहीं। हिंदी में इसमें लिंग, वचन और पुरुष का अन्वय; ने, को, से, में, पर और का, की, के जैसे परसर्गों का सही प्रयोग; काल, पक्ष, वाच्य और वृत्ति की संगति; विशेषण या सीमित करने वाले शब्दों का सही स्थान; और अनावश्यक पुनरावृत्ति या अधूरी तुलना से बचाव शामिल है। वाक्य के सभी शब्द परिचित हो सकते हैं, फिर भी उनके संबंध गलत होने पर वाक्य अशुद्ध हो जाएगा। जैसे अधिकारी ने रिपोर्ट को देखा कई प्रसंगों में सामान्य वाक्य है, पर अधिकारी ने रिपोर्ट ने देखा में कारक-संबंध टूट जाता है। इसी तरह यह निर्णय पिछले निर्णय से अधिक उचित है पूरा वाक्य है, जबकि यह निर्णय अधिक उचित है तब अधूरा लगेगा जब तुलना का आधार अपेक्षित हो और दिया न गया हो।
इस विषय को गलत-सही वाक्यों की रटी हुई जोड़ियों तक सीमित न करें। परीक्षा में विकल्पों की सतह बदल जाती है, पर नियम वही रहता है। अच्छी पद्धति यह है कि पहले नियंत्रक शब्द पहचानें: कौन-सा कर्ता क्रिया को नियंत्रित कर रहा है, कौन-सी संज्ञा विशेषण का रूप तय कर रही है, कौन-सी क्रिया किसी खास कारक-चिह्न की मांग कर रही है, या कौन-सी तुलना दूसरे पद की अपेक्षा कर रही है। छोटे सरकारी और दैनिक वाक्यों में अशुद्धि प्रायः छोटी लेकिन निर्णायक होती है: गलत लिंग-चिह्न, अनावश्यक को, छूटा हुआ ने, अस्पष्ट सर्वनाम-संदर्भ या बिना कारण काल बदलती हुई क्रिया।
आरपीएससी उपनिरीक्षक में यह प्रश्न वस्तुनिष्ठ ढंग से आता है। प्रथम प्रश्नपत्र का ढांचा बहुविकल्पीय है और हाल के आधिकारिक प्रश्नपत्रों में अशुद्ध वाक्य, शुद्ध वाक्य या अशुद्ध वाक्य नहीं है जैसे संकेतों के आसपास वाक्य-संशोधन के समूह मिलते हैं। इन तीनों को एक ही काम के तीन रूप मानें। शुद्ध वाक्य चुनना हो तो स्पष्ट नियम-भंग वाले विकल्प हटाएँ। अशुद्ध वाक्य पहचानना हो तो किसी स्वाभाविक मुहावरे को केवल छोटा दिखने के कारण न बदलें। अशुद्ध वाक्य नहीं है वाले प्रश्नों में तब तक त्रुटि न मानें जब तक कोई निश्चित नियम न टूटे। सबसे सुरक्षित क्रम चार जांचों का है: अन्वय, कारक-परसर्ग, क्रम-स्पष्टता, और काल-वाच्य-वृत्ति की संगति। कोई वाक्य इन चारों जांचों से पार हो जाए और उसका अर्थ पूरा हो, तो उसके शुद्ध होने की संभावना अधिक है।
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