मुख्य तथ्य

  • शब्द-शुद्धि में अकेले शब्द का मानक रूप देखा जाता है; यह वाक्य-स्तर की वाक्य-शुद्धि से अलग कौशल है।
  • एक मात्रा, एक नासिक्य चिह्न, एक संयुक्ताक्षर या एक अक्षर-चयन पूरा उत्तर बदल सकता है।
  • परीक्षा, निरीक्षण, विपरीत और आशीर्वाद जैसे शब्दों में इ और ई की गलती बहुत सामान्य है।
  • संकल्प और संविधान में अनुस्वार आता है, जबकि मानक वर्तनी में आँख और चाँद पर चंद्रबिंदु लगता है।
  • निःशब्द, निःस्वार्थ, प्रातःकाल और अंतःकरण जैसे औपचारिक रूपों में विसर्ग दिखता है, पर उसे हर शब्द में यांत्रिक रूप से नहीं लगाना चाहिए।

मुख्य बिंदु

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    शब्द-शुद्धि में अकेले शब्द का मानक रूप देखा जाता है; यह वाक्य-स्तर की वाक्य-शुद्धि से अलग कौशल है।

  2. 2

    एक मात्रा, एक नासिक्य चिह्न, एक संयुक्ताक्षर या एक अक्षर-चयन पूरा उत्तर बदल सकता है।

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    परीक्षा, निरीक्षण, विपरीत और आशीर्वाद जैसे शब्दों में इ और ई की गलती बहुत सामान्य है।

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    संकल्प और संविधान में अनुस्वार आता है, जबकि मानक वर्तनी में आँख और चाँद पर चंद्रबिंदु लगता है।

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    निःशब्द, निःस्वार्थ, प्रातःकाल और अंतःकरण जैसे औपचारिक रूपों में विसर्ग दिखता है, पर उसे हर शब्द में यांत्रिक रूप से नहीं लगाना चाहिए।

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    क्ष, ज्ञ, त्र, द्य, द्व, स्वच्छ और स्वास्थ्य जैसे संयुक्ताक्षर उच्चारण में छिप जाते हैं, इसलिए इन्हें छपे रूप में देखकर याद करना चाहिए।

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    तत्सम और तद्भव की जानकारी उपयोगी है, पर शुद्ध रूप वही है जो शिक्षित हिंदी में स्वीकृत मानक रूप हो।

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    अनुशासन, प्रतिज्ञा, निरीक्षण, निःस्वार्थ और संकल्प जैसे शब्दों में मूल रूप और उपसर्ग को जोड़ते समय अक्सर गलती होती है।

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    संवैधानिक, दायित्व, उत्तरदायित्व, पठनीय, न्यायालय और विद्यालय जैसे प्रत्यययुक्त शब्दों को शब्द-परिवार में याद करना चाहिए।

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    सर्वशुद्ध या सर्वअशुद्ध विकल्पों में समूह का हर शब्द अलग से जाँचना पड़ता है; एक गलत शब्द पूरा सर्वशुद्ध विकल्प गिरा देता है।

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    राजस्थान लोक सेवा आयोग प्रशासनिक, साहित्यिक और दैनिक तीनों प्रकार की शब्दावली से संक्षिप्त पहचान-आधारित प्रश्न पूछ सकता है।

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    रिवीजन का सबसे अच्छा तरीका शुद्ध-अशुद्ध शब्द-जोड़े बनाना है: एक ओर मानक रूप और दूसरी ओर उससे मिलता-जुलता अशुद्ध रूप।

शब्द-शुद्धि क्या है और उप निरीक्षक परीक्षा में इसका दायरा क्या है?

शब्द-शुद्धि में अकेले शब्द के मानक रूप, वर्तनी, मात्रा, नासिक्य चिह्न और संयुक्ताक्षर की पहचान करके अशुद्ध रूप को सुधारा जाता है।

राजस्थान लोक सेवा आयोग के उप निरीक्षक पाठ्यक्रम के अनुसार हिंदी प्रश्नपत्र में 100 बहुविकल्पीय प्रश्न होते हैं, अधिकतम 200 अंक होते हैं, समय 2 घंटे है और प्रत्येक गलत उत्तर पर 1/3 अंक काटा जाता है। इसलिए शब्द-शुद्धि को छोटा विषय मानकर छोड़ना ठीक नहीं है।

शब्द-शुद्धि का अर्थ है मानक हिंदी शब्द-रूपों की पहचान और अशुद्ध रूपों का सुधार। यह वाक्य-शुद्धि से अलग और संकुचित क्षेत्र है। वाक्य-शुद्धि में कारक, लिंग, वचन, काल, पदक्रम, अन्वय और मुहावरे की जाँच होती है; शब्द-शुद्धि में देखा जाता है कि अकेला शब्द अपने मानक रूप में है या नहीं। जैसे परिषद् या परिषद, निष्कर्ष या निश्कर्ष, प्रशासक या प्रशाशक, आशीर्वाद या आशिर्वाद, अभ्यर्थी या अभ्यार्थी में कौन-सा रूप स्वीकार्य है। राजस्थान लोक सेवा आयोग की उप निरीक्षक हिंदी परीक्षा में यह भेद इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि पाठ्यक्रम में शब्द-शुद्धि को वाक्य-शुद्धि से अलग रखा गया है और प्रश्न वस्तुनिष्ठ रूप में आते हैं। अभ्यर्थी से प्रायः नियम लिखवाया नहीं जाता; उसे कम समय में शुद्ध या अशुद्ध शब्द चुनना होता है।

सीधे शब्दों में, जिस शब्द की वर्तनी, मात्रा, नासिक्य चिह्न, संयुक्त व्यंजन, हलन्त और मानक प्रयोग शिक्षित हिंदी के अनुरूप हों, वह शुद्ध है। कोई मात्रा, वर्ण, नासिक्य चिह्न या संयुक्ताक्षर बदल जाए, छूट जाए, बेवजह जुड़ जाए या बोलचाल के असर से बिगड़ जाए, तो रूप अशुद्ध हो सकता है। क्षमा और छमा का फर्क शैली का नहीं, मानक रूप का है। द्रष्टव्य और दृष्टव्य में द्रष्टव्य शुद्ध रूप है, जबकि दृष्टव्य शब्द-शुद्धि के प्रश्नों में अशुद्ध माना जाएगा। अंतर्गत और अन्तर्गत जैसे मान्य शैलीगत रूपों को बिना किसी स्पष्ट मानक के शुद्ध-अशुद्ध जोड़ी नहीं मानना चाहिए; पहले साफ़ तौर पर बिगड़े हुए रूप हटाएँ।

परीक्षा में तीन प्रारूप अधिक मिलते हैं। पहला, शुद्ध शब्द चुनिए। दूसरा, अशुद्ध शब्द चुनिए। तीसरा, ऐसे विकल्प-समूह जिनमें दो, तीन या चार शब्द दिए होते हैं और पूछा जाता है कि किस विकल्प में सभी शब्द शुद्ध हैं या सभी अशुद्ध हैं। तीसरा प्रारूप सबसे सावधानी मांगता है, क्योंकि किसी समूह में एक परिचित शुद्ध शब्द होने से पूरा विकल्प सही नहीं हो जाता। हर शब्द अलग से देखना पड़ता है। पहले वर्तनी के साफ़ फर्क देखें: इ–ई, उ–ऊ, ऋ, अनुस्वार–चंद्रबिंदु, श–ष–स, ज–ज्ञ, क्ष–छ, द्य–द, त्र–त और दोहरे व्यंजन। फिर देखें कि शब्द तत्सम है या स्वीकृत तद्भव रूप, क्योंकि बहुत-सी गलतियाँ बोलचाल के उच्चारण को औपचारिक वर्तनी मान लेने से बनती हैं।

यह विषय शब्द-प्रकार की समझ से जुड़ता है, पर तत्सम, तद्भव, देशज और विदेशी शब्दों की पूरी अलग पाठशाला नहीं बन जाता। शब्द-शुद्धि में मूल काम यह है कि शब्द का स्वीकृत रूप पहचाना जाए। तत्सम रूपों में संयुक्ताक्षर और संस्कृतनिष्ठ वर्तनी बची रह सकती है: क्षत्रिय, प्रश्न, दर्पण, विद्वान, संस्कृत, निःशब्द। तद्भव या सामान्य हिंदी रूप भी पूर्णतः मानक हो सकता है: कच्चा, पक्का, देवर, बहू, आँख। इसलिए शुद्ध-अशुद्ध शब्द-युग्म बनाकर पढ़ें: मानक रूप, उससे मिलता-जुलता गलत रूप और दोनों का अंतर।

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