मुख्य तथ्य

  • अनुच्छेद 153 से 162 राज्यपाल के पद, नियुक्ति, कार्यकाल, योग्यता, शपथ, आकस्मिक व्यवस्था, क्षमादान शक्ति और कार्यपालिका शक्ति के विस्तार का आधार देते है...
  • अनुच्छेद 163 राज्यपाल की सहायता और सलाह के लिए मंत्रिपरिषद की व्यवस्था करता है, सिवाय उन मामलों के जिनमें संविधान विवेक की अपेक्षा करता है।
  • अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल मुख्यमंत्री को नियुक्त करता है और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
  • राजस्थान में एक सदन वाला विधानमंडल है, जिसे राजस्थान विधान सभा कहा जाता है, और इसकी आधिकारिक सदस्य संख्या 200 है।
  • राज्यपाल विधान सभा को बुलाता है, सत्रावसान करता है और उसे भंग कर सकता है, लेकिन दो निर्धारित सत्र-बैठकों के बीच 6 महीने से अधिक का अंतर नहीं हो सकता।

मुख्य बिंदु

  1. 1

    राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है, जबकि मुख्यमंत्री की अगुवाई वाली मंत्रिपरिषद सामान्यतः कार्यपालिका का वास्तविक संचालन करती है।

  2. 2

    अनुच्छेद 153 से 162 राज्यपाल के पद, नियुक्ति, कार्यकाल, योग्यता, शपथ, आकस्मिक व्यवस्था, क्षमादान शक्ति और कार्यपालिका शक्ति के विस्तार का आधार देते हैं।

  3. 3

    अनुच्छेद 163 राज्यपाल की सहायता और सलाह के लिए मंत्रिपरिषद की व्यवस्था करता है, सिवाय उन मामलों के जिनमें संविधान विवेक की अपेक्षा करता है।

  4. 4

    अनुच्छेद 164 के तहत राज्यपाल मुख्यमंत्री को नियुक्त करता है और मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।

  5. 5

    मंत्रिपरिषद विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है, इसलिए सदन का विश्वास सरकार के बने रहने के लिए केंद्रीय है।

  6. 6

    राजस्थान में एक सदन वाला विधानमंडल है, जिसे राजस्थान विधान सभा कहा जाता है, और इसकी आधिकारिक सदस्य संख्या 200 है।

  7. 7

    राज्यपाल विधान सभा को बुलाता है, सत्रावसान करता है और उसे भंग कर सकता है, लेकिन दो निर्धारित सत्र-बैठकों के बीच 6 महीने से अधिक का अंतर नहीं हो सकता।

  8. 8

    साधारण विधेयक, धन विधेयक और वार्षिक वित्तीय विवरण अलग संवैधानिक रास्तों से गुजरते हैं; धन विधेयक राज्यपाल की सिफ़ारिश के बिना पेश नहीं हो सकता।

  9. 9

    अनुच्छेद 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय होता है; राजस्थान उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ जोधपुर और एक पीठ जयपुर में है।

  10. 10

    अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मूल अधिकारों के साथ अन्य उद्देश्यों के लिए भी रिट जारी करने की शक्ति देता है, इसलिए इसका बताया गया दायरा अनुच्छेद 32 से व्यापक है।

  11. 11

    अनुच्छेद 315 से 323 राज्य लोक सेवा आयोग की नियुक्ति, कार्यकाल, हटाने की सुरक्षा, काम और प्रतिवेदन सहित संवैधानिक ढाँचा देते हैं।

  12. 12

    राजस्थान लोक सेवा आयोग परीक्षाएँ कराता है और भर्ती तथा सेवा से जुड़े संवैधानिक मामलों पर सलाह देता है, पर नियुक्ति सक्षम सरकारी प्राधिकारी ही करता है।

राजस्थान की राज्य संस्थाओं की संवैधानिक व्यवस्था

राजस्थान की राजनीतिक-प्रशासनिक व्यवस्था को 5 अलग-अलग संस्थाओं की सूची की तरह नहीं, बल्कि जुड़ी हुई संसदीय प्रणाली की तरह समझना चाहिए। संविधान शक्तियाँ बाँटता है, नियंत्रण बनाता है और लोकतांत्रिक जवाबदेही को कानूनी निगरानी से जोड़ता है।

  • राज्य कार्यपालिका: अनुच्छेद 153 से आगे राज्यपाल को राज्य का संवैधानिक प्रमुख बनाया गया है। कार्यपालिका के कदम औपचारिक रूप से राज्यपाल के नाम से उठते हैं, लेकिन सामान्य संसदीय नियम मुख्यमंत्री की अगुवाई वाली मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह है।
  • राजनीतिक कार्यपालिका: मुख्यमंत्री सरकार का नेतृत्व करता है, विभागों में तालमेल बनाता है, मंत्रिमंडल के फैसले राज्यपाल तक पहुँचाता है और विधान सभा में सरकारी कार्यक्रम आगे बढ़ाता है। मंत्रिपरिषद को विधान सभा का विश्वास बनाए रखना पड़ता है।
  • राज्य विधानमंडल: अनुच्छेद 168 किसी राज्य में 1 या 2 सदनों वाले विधानमंडल की अनुमति देता है। राजस्थान ने एक सदन वाली व्यवस्था चुनी है, इसलिए संवैधानिक अर्थ में राज्यपाल और राजस्थान विधान सभा मिलकर राज्य विधानमंडल बनाते हैं।
  • प्रतिनिधि सदन: राजस्थान विधान सभा का आधिकारिक पोर्टल मौजूदा सदस्य संख्या 200 बताता है। सदस्य विधेयकों पर बहस करते हैं, कर और खर्च को मंज़ूरी देते हैं, मंत्रियों से सवाल पूछते हैं और प्रस्तावों तथा समितियों से प्रशासन की जाँच करते हैं।
  • न्यायिक संस्था: अनुच्छेद 214 प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय की व्यवस्था करता है। उच्च न्यायालय राजनीतिक कार्यपालिका से स्वतंत्र रहता है और प्रशासनिक तथा विधायी कार्रवाई को संविधान और कानून की कसौटी पर परखता है।
  • भर्ती संस्था: अनुच्छेद 315 से 323 लोक सेवा आयोगों का आधार बनाते हैं। राजस्थान लोक सेवा आयोग योग्यता आधारित भर्ती में मदद करता है और तय सेवा मामलों पर सलाह देता है; वह साधारण कार्यपालिका विभाग की तरह संचालित नहीं होता।
  • जवाबदेही की कड़ी: मतदाता विधान सभा चुनते हैं; मंत्रिपरिषद सदन के विश्वास पर टिकी रहती है; प्रशासन मंत्री की जिम्मेदारी में काम करता है; न्यायालय वैधता जाँचते हैं; और आयोग अपने संवैधानिक क्षेत्र में निष्पक्षता की रक्षा करता है।
  • औपचारिक और वास्तविक शक्ति: प्रश्न अक्सर उस प्राधिकारी में अंतर पूछते हैं जिसके नाम से काम होता है और उस राजनीतिक प्राधिकारी में जो फैसला करता है। औपचारिक नाम मंत्रिपरिषद की जिम्मेदारी खत्म नहीं करता।
  • स्वतंत्रता और जवाबदेही: उच्च न्यायालय और आयोग को संस्थागत सुरक्षा मिली है, फिर भी वे संवैधानिक प्रक्रिया, कारण, अभिलेख, प्रतिवेदन और न्यायिक मानकों के ज़रिए जवाबदेह रहते हैं, रोज़ के राजनीतिक निर्देशों से नहीं।
  • संघीय संदर्भ: ये राज्य की संस्थाएँ हैं, पर इनकी मूल रचना भारत के संविधान से आती है। राज्य के कानून और नियम उसी संवैधानिक सीमा में कामकाजी विवरण भरते हैं।
  • परीक्षा विधि: पहले संस्था पहचानें, फिर संबंधित अनुच्छेद समूह, नियुक्ति प्राधिकारी, कार्यकाल या उत्तरदायित्व का नियम देखें और अंत में तय करें कि काम कार्यपालिका, विधायी, न्यायिक या सलाहकारी है।
  • आम भ्रम: राज्यपाल, विधान सभा और उच्च न्यायालय किसी सीधी ऊँची-नीची प्रशासनिक श्रृंखला में नहीं हैं। उनकी शक्तियाँ काम के अनुसार अलग हैं, इसलिए उत्तर संबंधित संवैधानिक प्रावधान से ही निकलेगा।
  • संस्थागत संतुलन: केवल सुविधा से संवैधानिक अधिकार नहीं मिलता। शक्ति संविधान या वैध कानून से आनी चाहिए, जबकि सलाह, मंज़ूरी, विधायी अनुमति, दर्ज कारण और न्यायिक समीक्षा हर संस्था को उसके तय क्षेत्र में रखते हैं।

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