आधुनिक भारत — 18वीं सदी के मध्य से प्रमुख घटनाएँ, स्वतंत्रता संग्राम
मुख्य तथ्य
- 1757 के प्लासी और 1764 के बक्सर युद्ध के बाद 1765 में मिली दीवानी ने कंपनी के व्यापार, राजस्व और क्षेत्रीय सत्ता को एक साथ जोड़ दिया।
- युद्ध, रेजिडेंट, सहायक संधि और विलय से हुआ कंपनी विस्तार 1857 से पहले पुराने राजनीतिक संतुलन को तोड़ता गया।
- 1857 का विद्रोह विलय नीति, कृषि दबाव, सैनिक असंतोष और धार्मिक आशंका से उभरा तथा भारत शासन अधिनियम 1858 ने कंपनी शासन समाप्त कर दिया।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन 28 दिसंबर 1885 को बंबई में हुआ, जिसमें 72 प्रतिनिधि थे और डब्ल्यू.सी. बनर्जी अध्यक्ष बने।
- बंगाल विभाजन की घोषणा 19 जुलाई 1905 को हुई और 16 अक्टूबर 1905 से लागू होकर स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा को जन-आंदोलन का रूप मिला।
मुख्य बिंदु
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1757 के प्लासी और 1764 के बक्सर युद्ध के बाद 1765 में मिली दीवानी ने कंपनी के व्यापार, राजस्व और क्षेत्रीय सत्ता को एक साथ जोड़ दिया।
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युद्ध, रेजिडेंट, सहायक संधि और विलय से हुआ कंपनी विस्तार 1857 से पहले पुराने राजनीतिक संतुलन को तोड़ता गया।
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1857 का विद्रोह विलय नीति, कृषि दबाव, सैनिक असंतोष और धार्मिक आशंका से उभरा तथा भारत शासन अधिनियम 1858 ने कंपनी शासन समाप्त कर दिया।
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पहला अधिवेशन 28 दिसंबर 1885 को बंबई में हुआ, जिसमें 72 प्रतिनिधि थे और डब्ल्यू.सी. बनर्जी अध्यक्ष बने।
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बंगाल विभाजन की घोषणा 19 जुलाई 1905 को हुई और 16 अक्टूबर 1905 से लागू होकर स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा को जन-आंदोलन का रूप मिला।
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क्रांतिकारी राष्ट्रवाद अनुशीलन और युगांतर से गदर, एचआरए और एचएसआरए तक गया, जहाँ काकोरी और भगत सिंह ने सशस्त्र कार्रवाई को राजनीतिक संदेश बनाया।
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गांधी ने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद को अनुशासित सत्याग्रह से जोड़ा, फिर रौलेट दमन और जलियांवाला बाग ने कांग्रेस को असहयोग की ओर मोड़ा।
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दिसंबर 1929 की लाहौर कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को लक्ष्य घोषित किया और 1930 की दांडी यात्रा ने उसे सविनय अवज्ञा में बदल दिया।
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सुभाष चंद्र बोस हरिपुरा और त्रिपुरी की कांग्रेस राजनीति से आगे बढ़कर फॉरवर्ड ब्लॉक, आज़ाद हिंद सरकार और इम्फाल-कोहिमा की ओर चले आज़ाद हिंद फौज के अभियान तक पहुँचे।
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भारत छोड़ो आंदोलन, आज़ाद हिंद फौज के मुकदमे, शाही भारतीय नौसेना विद्रोह, विभाजन और रियासतों के एकीकरण ने औपनिवेशिक शासन से संवैधानिक राज्य-व्यवस्था में अंतिम बदलाव की दिशा तय की।
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1757 के बाद कंपनी विस्तार से 1857 के विद्रोह और क्राउन शासन तक
आधुनिक भारत का मध्य 18वीं सदी वाला चरण एक व्यापारिक कंपनी के क्षेत्रीय सत्ता बनने से शुरू होता है। 1757 के प्लासी युद्ध ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल की राजनीति में निर्णायक प्रभाव दिया, 1764 के बक्सर युद्ध ने उसकी सैनिक स्थिति मज़बूत की और 1765 में मुगल बादशाह से मिली दीवानी ने उसे बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में राजस्व वसूली का अधिकार दिया। इसके बाद कंपनी ने युद्ध के साथ रेजिडेंट, सहायक संधि, उत्तराधिकार के विवाद और विलय की नीतियाँ अपनाईं। इस विस्तार ने पुराना राजनीतिक संतुलन बदला, राजस्व को औपनिवेशिक ज़रूरतों की ओर मोड़ा और ऐसी शिकायतें पैदा कीं जो आगे चलकर 1857 में एक साथ उभरीं।
1857 से पहले कंपनी का विस्तार
- प्लासी, 1757: सिराजुद्दौला पर जीत के बाद कंपनी बंगाल की राजनीति में निर्णायक शक्ति बनी।
- बक्सर, 1764: मीर कासिम, शुजाउद्दौला और शाह आलम द्वितीय की संयुक्त सेना पर जीत ने कंपनी की सैनिक बढ़त पक्की की।
- दीवानी, 1765: राजस्व वसूली ने व्यापारिक शक्ति को क्षेत्रीय शासन से जोड़ा और आगे के युद्धों का खर्च जुटाया।
- रेजिडेंट: कंपनी के प्रतिनिधि भारतीय राज्यों के उत्तराधिकार, कूटनीति और सैनिक व्यवस्था में दखल देने लगे।
- सहायक संधि: शासकों ने कंपनी की सेना और राजनीतिक पाबंदियाँ स्वीकार कीं तथा बदले में रकम या क्षेत्र देना पड़ा।
- विलय: सीधे युद्ध, कुशासन के आरोप और राज्य-हड़प नीति से कई इलाके कंपनी के अधीन आए।
1857 के विद्रोह के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ, भारत शासन अधिनियम 1858 से प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन गया और वायसराय-भारत सचिव वाली नई व्यवस्था बनी। ब्रिटेन के आधिकारिक विधान में भारत शासन अधिनियम 1858 ने भारत परिषद को 15 सदस्यों की संस्था बनाया।
1857 का विद्रोह: कारण, प्रसार और क्राउन शासन की शुरुआत
1857 का विद्रोह कोई अचानक फूटा हुआ सैनिक उपद्रव नहीं था, बल्कि राजनीतिक विलय, ग्रामीण संकट और सैन्य असंतोष से बना हुआ व्यापक विस्फोट था।
पृष्ठभूमि कारण
- राजनीतिक आधार: इसका राजनीतिक आधार राज्य-हड़प नीति से तीखा हुआ, जिसे लॉर्ड डलहौजी ने सतारा 1848, झांसी 1853 और नागपुर 1854 जैसे राज्यों के विलय में लागू किया, जबकि अवध को 1856 में कुशासन के आरोप पर मिला लिया गया।
- असुरक्षा: इन कदमों ने राजाओं, तालुकेदारों और दरबारी अभिजात वर्ग को असुरक्षित बना दिया।
- अवध का महत्व: अवध इसलिए भी निर्णायक था क्योंकि बंगाल सेना के अनेक सिपाही वहीं के गांवों से आते थे; 1856 के बाद स्थानीय अभिजात वर्ग की हानि और सैनिक असंतोष एक-दूसरे से जुड़ गए।
- किसान और सिपाही असंतोष: किसानों पर भारी भू-राजस्व का दबाव था, और सिपाहियों में कम वेतन, दूरस्थ नियुक्ति तथा भत्ते के ह्रास को लेकर रोष बढ़ रहा था।
- धार्मिक आशंका: धार्मिक आशंका तब गहरी हुई जब एनफील्ड राइफल के कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी होने की चर्चा फैली, जिससे कंपनी शासन दोनों प्रमुख धार्मिक समुदायों की भावनाओं के विरुद्ध दिखाई देने लगा।
- अफवाहें: बाजारों और छावनियों में फैलती अफवाहों ने यह भय और गहरा किया कि कंपनी समाज और धर्म दोनों को बदलना चाहती है।
आरंभ और प्रसार
| तिथि / स्थान | घटना | महत्व |
|---|---|---|
| 29 मार्च 1857, बैरकपुर | मंगल पांडे ने अपने अधिकारियों पर आक्रमण किया। | मेरठ से पहले ही चिंगारी दिखी। |
| 10 मई 1857, मेरठ | बंदी बनाए गए सिपाहियों को छुड़ाया गया। | व्यापक विस्फोट हुआ। |
| 11 मई 1857, दिल्ली | विद्रोही दिल्ली पहुँचे और बहादुर शाह ज़फर को हिंदुस्तान का सम्राट घोषित किया गया। | विद्रोह को वैध शाही प्रतीक मिल गया। |
- दिल्ली का शाही केंद्र: दिल्ली विद्रोहियों के शाही केंद्र में बदलते ही घोषणाएँ, राजस्व-संग्रह और पुरानी मुगल वैधता की अपीलें सैनिक विद्रोह को राजनीतिक युद्ध का रूप देने लगीं।
| केंद्र | प्रमुख चेहरे |
|---|---|
| दिल्ली | बख्त खान |
| कानपुर | नाना साहेब और तात्या टोपे |
| लखनऊ | बेगम हज़रत महल |
| झांसी | रानी लक्ष्मीबाई |
| बिहार | कुंवर सिंह |
- बिखरा हुआ विद्रोही पक्ष: विद्रोही पक्ष एकजुट नहीं था: कुछ शासक साथ आए, कुछ असमंजस में रहे, जबकि कई रियासतों ने अपना अस्तित्व बचाने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया।
अंग्रेजी दमन
अंग्रेजी दमन क्रमिक और अत्यंत कठोर था।
| तिथि | घटना |
|---|---|
| 20 सितंबर 1857 | दिल्ली पुनः अंग्रेजों के कब्जे में आई। |
| मार्च 1858 | लखनऊ वापस लिया गया। |
| 26 अप्रैल 1858 | कुंवर सिंह की मृत्यु हुई। |
| 18 जून 1858 | रानी लक्ष्मीबाई ग्वालियर में वीरगति को प्राप्त हुईं। |
| 18 अप्रैल 1859 | तात्या टोपे लंबे गुरिल्ला संघर्ष के बाद फांसी पर चढ़ा दिए गए। |
भारत शासन अधिनियम 1858
इस पूरे आंदोलन का संवैधानिक परिणाम भारत शासन अधिनियम 1858 था, जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत करके भारत का प्रशासन सीधे क्राउन को सौंप दिया।
| परिवर्तन | विवरण |
|---|---|
| समाप्त संस्थाएँ | कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स और बोर्ड ऑफ कंट्रोल समाप्त कर दिए गए। |
| नया प्राधिकारी | भारत सचिव ब्रिटेन में मुख्य प्राधिकारी बना। |
| भारत परिषद | उसकी सहायता के लिए 15-सदस्यीय भारत परिषद बनाई गई। |
| गवर्नर-जनरल | गवर्नर-जनरल को वायसराय की उपाधि मिली। |
| पहले भारत सचिव | लॉर्ड स्टैनली पहले भारत सचिव बने। |
| पहले वायसराय | लॉर्ड कैनिंग नई व्यवस्था के अंतर्गत पहले वायसराय रहे। |
- रानी विक्टोरिया की उद्घोषणा: रानी विक्टोरिया की उद्घोषणा 1 नवंबर 1858 को जारी हुई और लॉर्ड कैनिंग ने इसे इलाहाबाद में पढ़ा।
- वचन: इसमें धर्म में हस्तक्षेप न करने, लोक सेवाओं में समान अवसर देने और आगे के विलयों को सामान्य नीति न बनाने का वचन दिया गया।
- रियासतें: क्राउन ने निष्ठावान रियासतों को बनाए रखने का संकेत भी दिया, क्योंकि विद्रोह ने अनियंत्रित विस्तार की राजनीतिक लागत स्पष्ट कर दी थी।
- विद्रोह के बाद बदलाव: सेना में भर्ती, कमान की व्यवस्था और संचार पर नियंत्रण कड़ा किया गया।
- साम्राज्य का पुनर्गठन: अंग्रेजों के लिए 1858 केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं, बल्कि साम्राज्य के पुनर्गठन का क्षण था, जिसमें व्यापारी कंपनी की जगह अधिक केंद्रीकृत शाही नौकरशाही ने ले ली।
राजस्थान संदर्भ
- राजपूताना: राजस्थान इस विद्रोह को एक अलग क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य देता है। राजपूताना की अधिकांश रियासतों ने अंग्रेजों का साथ दिया।
- आउवा: मारवाड़ के आउवा में ठाकुर कुशाल सिंह के नेतृत्व में तीखा प्रतिरोध उभरा।
- कोटा: कोटा के विद्रोह में 15 अक्टूबर 1857 को मेजर बर्टन मारा गया।
- तात्या टोपे का अंतिम चरण: अंतिम चरण में तात्या टोपे की गतिविधियाँ सिरोंज-बांसवाड़ा-प्रतापगढ़-उदयपुर क्षेत्र तक पहुँचीं, और 7 अप्रैल 1859 को पारोन में उसकी गिरफ्तारी ने दिखाया कि विद्रोह का अंतिम प्रभाव राजस्थान की सीमा-रेखा तक फैला हुआ था।
- कारणों का मेल: राजनीतिक, सैनिक, ग्रामीण और धार्मिक शिकायतें अलग-अलग थीं, पर 1857 में कई इलाकों में एक साथ उभरीं।
- सीमित एकता: सभी रियासतों और सामाजिक समूहों ने विद्रोह का साथ नहीं दिया, इसलिए इसके क्षेत्रीय रूप अलग रहे।
- मुख्य परिणाम: 1858 के बाद कंपनी के बजाय ब्रिटिश क्राउन ने सीधे शासन संभाला।
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