संवैधानिक विकास, उद्देशिका, मूल अधिकार, राज्य की नीति के निदेशक तत्व, मूल कर्तव्य
मुख्य तथ्य
- संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई; संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ और 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ।
- संविधान सभा ने 29 अगस्त 1947 को प्रारूप समिति बनाई और डॉ. बी. आर. अंबेडकर को उसका अध्यक्ष चुना।
- भाग 3 में मुख्यतः अनुच्छेद 12–35 के भीतर मूल अधिकार और उनके प्रवर्तन के लिए न्यायिक उपाय दिए गए हैं।
- अनुच्छेद 32 मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार देता है; अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों की रिट-शक्ति अधिक व्यापक है।
- 44वें संविधान संशोधन के बाद संपत्ति का अधिकार मूल अधिकार नहीं रहा; अब उसे अनुच्छेद 300A के तहत संवैधानिक संरक्षण मिलता है।
मुख्य बिंदु
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संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई; संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ और 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ।
- 2
संविधान सभा ने 29 अगस्त 1947 को प्रारूप समिति बनाई और डॉ. बी. आर. अंबेडकर को उसका अध्यक्ष चुना।
- 3
अंबेडकर ने सभा के फैसलों को कानूनी रूप और तर्कपूर्ण साफ़गोई दी, लेकिन संविधान-निर्माण समितियों, सलाहकारों और खुली बहस से चली सामूहिक प्रक्रिया थी।
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उद्देशिका न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता, व्यक्ति की गरिमा तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता के ज़रिए संविधान की दिशा बताती है।
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भारत में शक्तियों का संघीय बँटवारा, अपेक्षाकृत मज़बूत संघ, संसदीय कार्यपालिका और एकीकृत संवैधानिक व्यवस्था—ये सभी विशेषताएँ साथ दिखाई देती हैं।
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भाग 3 में मुख्यतः अनुच्छेद 12–35 के भीतर मूल अधिकार और उनके प्रवर्तन के लिए न्यायिक उपाय दिए गए हैं।
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अनुच्छेद 32 मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार देता है; अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों की रिट-शक्ति अधिक व्यापक है।
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44वें संविधान संशोधन के बाद संपत्ति का अधिकार मूल अधिकार नहीं रहा; अब उसे अनुच्छेद 300A के तहत संवैधानिक संरक्षण मिलता है।
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भाग 4 में अनुच्छेद 36–51 के तहत राज्य की नीति के निदेशक तत्व हैं; अनुच्छेद 37 उन्हें अदालत से लागू न होने योग्य, फिर भी शासन में मूलभूत बताता है।
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भाग 4क के अनुच्छेद 51A में मूल कर्तव्य हैं: 10 कर्तव्य 42वें संशोधन से और 11वाँ कर्तव्य 86वें संशोधन से जुड़ा।
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मूल अधिकार सार्वजनिक शक्ति पर सीमा लगाते हैं, राज्य की नीति के निदेशक तत्व लोक-कल्याणकारी शासन को दिशा देते हैं और मूल कर्तव्य नागरिक ज़िम्मेदारियाँ बताते हैं।
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संविधान न पूरी तरह कठोर है, न पूरी तरह लचीला; अनुच्छेद 368 विशेष संशोधन प्रक्रिया देता है, जबकि कुछ बदलाव साधारण विधायी प्रक्रिया से होते हैं।
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संवैधानिक समयरेखा और परीक्षा की रूपरेखा
- तारीखें अलग-अलग रटने के बजाय क्रम समझें। संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को नई दिल्ली में हुई। आगे चलकर सभा ने संप्रभु संविधान-निर्माता निकाय के रूप में काम किया और स्वतंत्रता के बाद विधायी काम भी सँभाला। संविधान का निर्माण समितियों, अनुच्छेदवार बहस और मतदान से आगे बढ़ा।
- प्रारूप का चरण: 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने पहले लिए गए फैसलों के आधार पर तैयार संवैधानिक पाठ की जाँच और सुधार के लिए प्रारूप समिति बनाई। डॉ. बी. आर. अंबेडकर इसके अध्यक्ष थे। समिति ने राजनीतिक सहमतियों और दूसरी समितियों की सिफ़ारिशों को सभा के सामने रखने योग्य सुसंगत कानूनी प्रारूप दिया।
- पूरा होने का चरण: संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को संविधान अंगीकृत किया। सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को उस पर हस्ताक्षर किए। अधिकांश प्रावधान 26 जनवरी 1950 से लागू हुए। यह तारीख राष्ट्रीय आंदोलन की पूर्ण स्वतंत्रता वाली पुरानी प्रतिज्ञा के सम्मान में चुनी गई थी।
- समय और विचार-विमर्श: आधिकारिक संसदीय विवरण के अनुसार काम 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन तक तथा 11 सत्रों में चला। इससे यह गलत धारणा टूटती है कि संविधान जल्दबाज़ी में या केवल नकल करके बनाया गया। हर स्तर पर समिति की जाँच और खुली बहस हुई।
- तीन तारीखों का अंतर: 26 नवंबर अंगीकरण की तारीख और संविधान दिवस है; 24 जनवरी हस्ताक्षर की तारीख है; 26 जनवरी लागू होने की तारीख और संवैधानिक गणराज्य की शुरुआत है।
- विषय को एक जुड़ी व्यवस्था की तरह पढ़ें। निर्माण-प्रक्रिया बताती है कि संस्थाओं और मूल्यों का यह रूप क्यों बना। प्रमुख विशेषताएँ व्यवस्था का ढाँचा समझाती हैं। मूल अधिकार सार्वजनिक शक्ति को सीमित करते हैं। राज्य की नीति के निदेशक तत्व सामाजिक और आर्थिक न्याय की दिशा देते हैं। मूल कर्तव्य बताते हैं कि संवैधानिक लोकतंत्र नागरिकों के ज़िम्मेदार आचरण पर भी टिकता है।
- परीक्षा की तरकीब: हर प्रावधान के लिए उसका भाग, कानूनी असर और उद्देश्य पहचानें। कोई कथन सही आदर्श को गलत भाग में रख दे या अदालत से लागू न होने वाले तत्व को प्रवर्तनीय बता दे, तो पूरा कथन गलत होगा।
- मुख्य फर्क: संविधान सर्वोच्च कानूनी ढाँचा है। साधारण कानून उसके अधीन चलते हैं, सार्वजनिक संस्थाओं को उसी से अधिकार मिलता है और न्यायालय राज्य की कार्रवाई को उसकी कसौटी पर जाँच सकते हैं। इसलिए संवैधानिक शासन का मतलब सीमित और जवाबदेह शक्ति है, केवल चुने हुए शासक होना नहीं।
- याद रखने की कड़ी: सभा की बैठक → समिति का प्रारूप → सभा का अंगीकरण → सदस्यों के हस्ताक्षर → संविधान लागू होना। यह क्रम आरपीएससी उप-निरीक्षक में समयरेखा से जुड़ी आम गलतियों से बचाता है।
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