मुख्य तथ्य

  • 1947 में सत्ता-हस्तांतरण के साथ ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हुई और अधिमिलन और विलय तत्काल राजनीतिक प्रश्न बन गए।
  • मत्स्य संघ ने मार्च 1948 में अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली को पहले क्षेत्रीय संघ में जोड़ा।
  • राजस्थान संघ ने मार्च 1948 में दक्षिण-पूर्वी और हाड़ौती क्षेत्र की 9 रियासतों को जोड़ा; अप्रैल में मेवाड़ भी इसमें शामिल हुआ।
  • जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर के शामिल होने से 30 मार्च 1949 को वृहत राजस्थान बना।
  • मई 1949 में मत्स्य संघ के विलय से पूर्वी राजस्थान भी साझा प्रशासनिक ढाँचे में आ गया।

मुख्य बिंदु

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    ब्रिटिश सर्वोच्चता ने राजपूताना को अलग-अलग रियासती शासन-क्षेत्रों में बाँट रखा था, इसलिए एकीकरण के लिए बातचीत और संवैधानिक बदलाव दोनों ज़रूरी थे।

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    प्रजा मंडल संगठनों ने रियासतों में उत्तरदायी शासन की माँग को राष्ट्रीय एकता की व्यापक माँग से जोड़ा।

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    किसान आंदोलनों ने निरंकुश रियासती सत्ता के सामाजिक आधार को कमज़ोर किया और प्रतिनिधि प्रशासन की माँग को मज़बूत बनाया।

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    1947 में सत्ता-हस्तांतरण के साथ ब्रिटिश सर्वोच्चता समाप्त हुई और अधिमिलन और विलय तत्काल राजनीतिक प्रश्न बन गए।

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    मत्स्य संघ ने मार्च 1948 में अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली को पहले क्षेत्रीय संघ में जोड़ा।

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    राजस्थान संघ ने मार्च 1948 में दक्षिण-पूर्वी और हाड़ौती क्षेत्र की 9 रियासतों को जोड़ा; अप्रैल में मेवाड़ भी इसमें शामिल हुआ।

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    जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर के शामिल होने से 30 मार्च 1949 को वृहत राजस्थान बना।

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    मई 1949 में मत्स्य संघ के विलय से पूर्वी राजस्थान भी साझा प्रशासनिक ढाँचे में आ गया।

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    26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने पर राजस्थान भाग बी राज्य बना और मंत्रिमण्डलीय शासन को ठोस आधार मिला।

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    1 नवंबर 1956 के राज्य पुनर्गठन से अजमेर का विलय और सीमा-संशोधन हुआ तथा मुख्य क्षेत्रीय समायोजन पूरा हुआ।

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    एकीकरण केवल भू-भाग का मेल नहीं था; सेवाओं, न्यायालयों, राजस्व, पुलिस और सार्वजनिक वित्त को भी एक रूप देना पड़ा।

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    दोहराव के समय हर चरण को उसकी तारीख, शामिल रियासतों, राजधानी, संवैधानिक स्थिति और प्रशासनिक परिणाम के साथ याद रखें।

ब्रिटिश सर्वोच्चता से अधिमिलन के प्रश्न तक

  • 1817-1818 का तीसरा आंग्ल-मराठा युद्ध राजपूताना में केवल सैन्य टकराव नहीं रहा, बल्कि बाहरी राजनीतिक व्यवस्था के पुनर्गठन का बिंदु बना। गवर्नर-जनरल फ्रांसिस रॉडन-हैस्टिंग्स यानी लॉर्ड हेस्टिंग्स के नेतृत्व में ब्रिटिश कार्रवाइयों ने सिंधिया और होल्कर दोनों पर दबाव बढ़ाया और पिंडारियों को भी कमज़ोर किया। जब राजपूत रियासतें सैन्य और राजस्व दोनों संकटों से घिरी थीं, तब युद्धोपरांत राजनीति केवल दंडात्मक समझौतों पर नहीं रह सकती थी। इसी समय चार्ल्स मेटकाफ ने मित्रता, गठबंधन और एकता की संधि जैसा ढाँचा दिया, जिसमें बाहरी संप्रभुता का त्याग करके आंतरिक शासन को सुरक्षित रखने की शर्त बनी।
  • राजपूताना में संधि क्रम की शुरुआत 26 दिसंबर 1817 को कोटा से संधि से हुई। यह संधि दीवान झालिम सिंह झाला के द्वारा आगे बढ़ाई गई और क्रम की दृष्टि से प्रथम मानी जाती है। इसके बाद 6 जनवरी 1818 को जोधपुर (मारवाड़) के महाराजा मान सिंह के शासन में संधि हुई, जबकि मेवाड़ (उदयपुर) की संधि महाराणा भीम सिंह के साथ 13 जनवरी 1818 को हुई। कई बार मेवाड़ को पहले मान लिया जाता है, पर वास्तविक क्रम जोधपुर पहले और मेवाड़ बाद में रखता है। फिर बूंदी 10 फरवरी 1818, बीकानेर 9 मार्च 1818, और 2 अप्रैल 1818 को जयपुर के सवाई जगत सिंह द्वितीय के तहत संधि हुई। भरतपुर की संधि 1803 में अलग संदर्भ में हुई थी और उसे इस क्रम में मिलाना त्रुटि होगी। इस क्रम में कर/खिराज, सैनिक सहायता और मध्यस्थता की जिम्मेदारियाँ अलग-अलग राज्यों पर अलग समय पर लागू हुई थीं।
  • संधि शर्तें लगभग समान थीं। प्रत्येक राज्य ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बाहरी सर्वोच्चता के रूप में स्वीकार किया, कर / खिराज के रूप में पेशकाश दिया, अन्य शक्तियों से स्वतंत्र संधियाँ करने पर सीमा रही, और विवादों में ब्रिटिश मध्यस्थता की स्वीकृति दी। संकट की स्थिति में सैनिक सहायता देने का दायित्व भी जोड़ा गया। बदले में अंग्रेज़ों ने राजवंशीय निरंतरता और सुरक्षा का आश्वासन दिया, पर रणनीतिक निर्णय स्वतंत्र नहीं रहे। इसीलिए इसे केवल सहायता नहीं, बल्कि बाहरी निर्भरता की औपचारिक व्यवस्था कहना बेहतर है।
  • परीक्षा में इस पृष्ठभूमि का उपयोग केवल संदर्भ के लिए करें: मुख्य उत्तर में यह साफ़ लिखें कि ब्रिटिश सर्वोच्चता के अंत ने पुरानी संधियों की बाध्यता हटाई, लेकिन नई राज्य-व्यवस्था बनाने के लिए विलय और प्रशासनिक समझौते अलग से करने पड़े।

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