मुख्य तथ्य

  • कमी के कारण चुनाव करना ज़रूरी हो जाता है और हर चुनाव की एक अवसर लागत होती है।
  • माँग और पूर्ति बाज़ार की प्रवृत्ति समझाती हैं, लेकिन बदलाव की तुलना करते समय बाकी स्थितियाँ समान माननी पड़ती हैं।
  • सरकारी बजट में प्राप्तियों और व्यय को राजस्व तथा पूँजी खातों में बाँटा जाता है।
  • राजस्व घाटा, राजकोषीय घाटा और प्राथमिक घाटा अलग-अलग सवालों का जवाब देते हैं; इन्हें एक जैसा नहीं मानना चाहिए।
  • लोक वित्त बताता है कि सरकार सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए संसाधन कैसे जुटाती, खर्च करती और उधारी सँभालती है।

मुख्य बिंदु

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    कमी के कारण चुनाव करना ज़रूरी हो जाता है और हर चुनाव की एक अवसर लागत होती है।

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    माँग और पूर्ति बाज़ार की प्रवृत्ति समझाती हैं, लेकिन बदलाव की तुलना करते समय बाकी स्थितियाँ समान माननी पड़ती हैं।

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    सरकारी बजट में प्राप्तियों और व्यय को राजस्व तथा पूँजी खातों में बाँटा जाता है।

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    राजस्व घाटा, राजकोषीय घाटा और प्राथमिक घाटा अलग-अलग सवालों का जवाब देते हैं; इन्हें एक जैसा नहीं मानना चाहिए।

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    लोक वित्त बताता है कि सरकार सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए संसाधन कैसे जुटाती, खर्च करती और उधारी सँभालती है।

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    वाणिज्यिक बैंक जमा स्वीकार करते, ऋण देते, भुगतान कराते और जोखिम सँभालते हुए अलग-अलग अवधि के धन का मेल करते हैं।

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    भारतीय रिज़र्व बैंक नीतिगत दरों, आरक्षित अनुपातों और बाज़ार कार्रवाइयों से नकदी तथा ऋण की स्थितियों को प्रभावित करता है।

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    मुद्रा विनिमय का माध्यम, लेखे की इकाई, मूल्य का संचय और स्थगित भुगतान का मानक है।

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    सकल मूल्य वर्धन उत्पादकों द्वारा जोड़े गए मूल्य को मापता है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद में उत्पादों पर शुद्ध कर जोड़े जाते हैं।

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    घरेलू और राष्ट्रीय समुच्चयों का अंतर विदेश से प्राप्त शुद्ध प्राथमिक आय के कारण बनता है।

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    नाममात्र मूल्य चालू कीमतों पर होते हैं, जबकि वास्तविक मूल्य स्थिर कीमतों से कीमत-बदलाव का असर हटाते हैं।

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    प्रति व्यक्ति आय एक औसत है; यह अपने आप असमानता, गरीबी, बिना भुगतान वाले काम या पर्यावरणीय नुकसान को नहीं बताती।

आर्थिक चुनाव, प्रोत्साहन और बाज़ार की बुनियाद

अर्थशास्त्र की शुरुआत कमी से होती है। मनुष्य की इच्छाएँ बढ़ सकती हैं, लेकिन भूमि, श्रम, पूँजी, समय और सार्वजनिक धन सीमित रहते हैं। कमी का अर्थ यह नहीं कि कोई वस्तु बिल्कुल मौजूद नहीं है; अर्थ यह है कि शून्य कीमत पर हर इच्छित उपयोग के लिए उसकी मात्रा पर्याप्त नहीं है। इसका सीधा नतीजा चुनाव है। आरपीएससी उप-निरीक्षक अभ्यर्थी के लिए हर परिभाषा को उस फैसले से जोड़ना उपयोगी है जिसे वह समझाती है।

  • अवसर लागत: किसी चुनाव के कारण छोड़े गए सबसे अच्छे विकल्प का मूल्य। यदि सार्वजनिक धन एक परियोजना पर लगाया गया, तो छूटा हुआ सबसे उपयोगी काम उसकी अवसर लागत है; यह केवल लेखे में दर्ज कीमत नहीं होती।
  • सकारात्मक और मानकीय कथन: सकारात्मक कथन को प्रमाण से परखा जा सकता है, जबकि मानकीय कथन बताता है कि क्या होना चाहिए और उसमें व्यक्तिगत मान्यता जुड़ी रहती है। नीति की बहस में दोनों मिल सकते हैं, इसलिए पहले कथन की प्रकृति पहचानें।
  • सूक्ष्म और समष्टि अर्थशास्त्र: सूक्ष्म अर्थशास्त्र परिवार, फर्म और किसी एक बाज़ार जैसी इकाइयों का अध्ययन करता है। समष्टि अर्थशास्त्र पूरी अर्थव्यवस्था के उत्पादन, रोज़गार, महँगाई, मुद्रा और लोक वित्त को देखता है।
  • उत्पादन के साधन: भूमि में प्राकृतिक संसाधन, श्रम में मानवीय मेहनत, पूँजी में उत्पादन के लिए बनाई गई वस्तुएँ और उद्यमिता में संसाधनों का तालमेल तथा कारोबारी जोखिम शामिल हैं। इनके सामान्य प्रतिफल क्रमशः लगान, मज़दूरी, ब्याज और लाभ हैं।
  • उत्पादन संभावना सीमा: उपलब्ध संसाधनों और तकनीक से दो वस्तुओं के अधिकतम संभव मेल दिखाती है। सीमा के भीतर का बिंदु अधूरा उपयोग, सीमा पर बिंदु कुशलता और सीमा के बाहर बिंदु फिलहाल असंभव उत्पादन बताता है। इसकी नीचे जाती ढाल अवसर लागत दिखाती है।
  • माँग: बाकी बातें समान रहें तो कीमत बढ़ने पर माँगी गई मात्रा सामान्यतः घटती है। कीमत बदलने से माँग वक्र पर गति होती है; आय, पसंद, जनसंख्या, उम्मीद या संबंधित वस्तुओं की कीमत बदलने से पूरा वक्र खिसक सकता है।
  • पूर्ति: बाकी बातें समान रहें तो कीमत बढ़ने पर दी गई मात्रा सामान्यतः बढ़ती है। लागत, तकनीक, कर, सब्सिडी, उम्मीद और विक्रेताओं की संख्या पूर्ति को खिसका सकती है।
  • बाज़ार संतुलन: माँग और पूर्ति का मिलन उस कीमत को दिखाता है जहाँ नियोजित माँग और नियोजित पूर्ति बराबर होती हैं। कमी कीमत को ऊपर और अधिशेष नीचे धकेल सकता है, बशर्ते समायोजन की गुंजाइश हो।
  • लोच: माँग की कीमत लोच, माँगी गई मात्रा में प्रतिशत बदलाव की तुलना कीमत में प्रतिशत बदलाव से करती है। वस्तु की ज़रूरत, विकल्पों की उपलब्धता, आय में उसका हिस्सा और समायोजन का समय प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं।
  • बाज़ार की विफलता: बाहरी प्रभाव, सार्वजनिक वस्तुएँ, जानकारी की कमी और बाज़ार शक्ति निजी फैसलों को सामाजिक रूप से अकुशल बना सकते हैं। सरकारी कदम मदद कर सकता है, पर खराब बनावट, अधूरी जानकारी और प्रशासनिक लागत से सरकारी विफलता भी हो सकती है।

परीक्षा में गति और खिसकाव, लेखा लागत और अवसर लागत तथा देखे-परखे कथन और मूल्य-आधारित राय को अलग रखें। ये भेद कई सवाल बिना अलग-अलग पंक्तियाँ रटे हल करा देते हैं।

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