मुख्य तथ्य

  • 7 अप्रैल 1948 को WHO का संविधान लागू हुआ; स्वास्थ्य को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कुशलता मानने से विद्यालयी शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य खेलों से आगे बढ...
  • 1865 में विलियम एडम्स ने स्कोलियोसिस जांच के लिए आगे झुकने का परीक्षण बताया;
  • 8 नवंबर 1895 को विल्हेम कॉनराड रोंटगेन ने एक्स-रे की खोज की; इससे रीढ़ की वक्रता और हड्डियों के संरेखण का रेडियोग्राफिक आकलन संभव हुआ।
  • 1948 में जॉन रॉबर्ट कॉब ने रेडियोग्राफ पर रीढ़ की वक्रता मापने के लिए कॉब कोण बताया; स्कोलियोसिस की गंभीरता का यह आज भी मानक संख्यात्मक माप है।
  • 1949 में हेनरी ओ. केंडल और फ्लोरेंस पी. केंडल की मसल्स: टेस्टिंग ऐंड फंक्शन ने मांसपेशी-परीक्षण और पोस्टुरल विश्लेषण को क्लिनिकल तथा शारीरिक शिक्षा के...

मुख्य बिंदु

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    7 अप्रैल 1948 को WHO का संविधान लागू हुआ; स्वास्थ्य को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कुशलता मानने से विद्यालयी शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य खेलों से आगे बढ़कर समग्र स्वास्थ्य तक जाता है।

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    1865 में विलियम एडम्स ने स्कोलियोसिस जांच के लिए आगे झुकने का परीक्षण बताया; इससे धड़ का घुमाव और पसली का उभार शिक्षक व प्रशिक्षक के लिए महत्वपूर्ण व्यावहारिक संकेत बने।

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    8 नवंबर 1895 को विल्हेम कॉनराड रोंटगेन ने एक्स-रे की खोज की; इससे रीढ़ की वक्रता और हड्डियों के संरेखण का रेडियोग्राफिक आकलन संभव हुआ।

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    1948 में जॉन रॉबर्ट कॉब ने रेडियोग्राफ पर रीढ़ की वक्रता मापने के लिए कॉब कोण बताया; स्कोलियोसिस की गंभीरता का यह आज भी मानक संख्यात्मक माप है।

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    1949 में हेनरी ओ. केंडल और फ्लोरेंस पी. केंडल की मसल्स: टेस्टिंग ऐंड फंक्शन ने मांसपेशी-परीक्षण और पोस्टुरल विश्लेषण को क्लिनिकल तथा शारीरिक शिक्षा के उपयोग के लिए व्यवस्थित किया।

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    1954 में ACSM की स्थापना हुई; इसने सुरक्षित व्यायाम-निर्देशन के लिए शारीरिक शिक्षा, चिकित्सा और व्यायाम-विज्ञान को जोड़ा।

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    1985 में कैथरीना श्रोथ की विरासत के रूप में श्रोथ पद्धति तीन-आयामी स्कोलियोसिस-विशिष्ट व्यायाम, श्वसन-सुधार और मुद्रा-जागरूकता से जुड़ी रही।

मुद्रा क्या है और खेल-शिक्षण में इसका महत्व क्यों है?

मुद्रा शरीर के अंगों की वह संतुलित स्थिति है जिसमें गुरुत्व-रेखा, जोड़ और मांसपेशियां कम तनाव के साथ स्थिरता और गति दोनों को संभालते हैं। मुद्रा से आशय शरीर के अंगों की ऐसी स्थिति से है जिसमें गुरुत्व-रेखा, जोड़ और मांसपेशियां संतुलित ढंग से काम करें। खड़े होने, बैठने, चलने, दौड़ने, कूदने और खेल-कौशल सीखने में मुद्रा लगातार बदलती रहती है, इसलिए इसे केवल स्थिर खड़े होने की आदत मानना अधूरा है। अच्छी मुद्रा में सिर सीधा, कंधे संतुलित, छाती स्वाभाविक, पेट हल्का अंदर, रीढ़ की प्राकृतिक वक्रताएं बनी हुई, घुटने और पैर समान भार ले रहे होते हैं। शरीर को इस स्थिति में अनावश्यक तनाव नहीं लगता और सांस, रक्त-संचार तथा गति-सामंजस्य बेहतर रहता है।

एनसीईआरटी की स्कूल बैग नीति 2020 के अनुसार विद्यालयी बैग का सुझाया गया भार बच्चे के शरीर-भार के लगभग 10% तक रखना चाहिए, क्योंकि अधिक भार मुद्रा और चाल पर सीधा असर डाल सकता है। पीटीआई परीक्षा में मुद्रा का प्रश्न अक्सर परिभाषा, लक्षण, दोष, कारण और सुधारात्मक अभ्यास के रूप में आता है। अच्छी मुद्रा जन्म से अपने-आप स्थायी नहीं रहती; वृद्धि, पोषण, आदत, खेल-प्रशिक्षण, स्कूल-बैग, गलत फर्नीचर, दृष्टि-दोष, चोट और मानसिक स्थिति सब इसे प्रभावित करते हैं। शिक्षक के लिए मुद्रा का मूल्य केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, दक्षता और चोट-निवारण है। राजस्थान के किसी विद्यालय में लंबे समय तक जमीन पर झुककर लिखना या भारी बैग एक कंधे पर ढोना बच्चों की मुद्रा पर सीधा असर डाल सकता है।

सार रूप में, अच्छी मुद्रा वह है जिसमें शरीर कम ऊर्जा खर्च करके स्थिरता और गतिशीलता दोनों बनाए रखे। परीक्षा में उत्तर लिखते समय इसे केवल “सीधा खड़ा होना” न मानें; सही मुद्रा वह व्यावहारिक शरीर-संतुलन है जो पढ़ाई, खेल, मार्च-पास्ट और दैनिक गतिविधियों में शरीर को सुरक्षित और कार्यक्षम रखता है।

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