सामाजिक मुद्दे — बाल विवाह, लैंगिक भेदभाव और महिला सशक्तिकरण
मुख्य तथ्य
- बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 में लड़की के लिए 18 वर्ष और लड़के के लिए 21 वर्ष से कम आयु का विवाह बाल विवाह माना गया है।
- बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 ने पुराने बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929 की जगह अधिक स्पष्ट रोकथाम, संरक्षण और दंड व्यवस्था दी।
- PCPNDT अधिनियम, 1994 का मुख्य उद्देश्य गर्भाधान से पहले या गर्भावस्था के दौरान लिंग-चयन और भ्रूण के लिंग-निर्धारण के दुरुपयोग को रोकना है।
- जनगणना 2011 में भारत का कुल लिंगानुपात 943 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष और 0 से 6 वर्ष आयु-वर्ग का बाल लिंगानुपात 919 लड़कियां प्रति 1000 लड़के था।
- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक हिंसा को घरेलू हिंसा के दायरे में रखता है।
मुख्य बिंदु
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बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 में लड़की के लिए 18 वर्ष और लड़के के लिए 21 वर्ष से कम आयु का विवाह बाल विवाह माना गया है।
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बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 ने पुराने बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929 की जगह अधिक स्पष्ट रोकथाम, संरक्षण और दंड व्यवस्था दी।
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PCPNDT अधिनियम, 1994 का मुख्य उद्देश्य गर्भाधान से पहले या गर्भावस्था के दौरान लिंग-चयन और भ्रूण के लिंग-निर्धारण के दुरुपयोग को रोकना है।
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जनगणना 2011 में भारत का कुल लिंगानुपात 943 महिलाएं प्रति 1000 पुरुष और 0 से 6 वर्ष आयु-वर्ग का बाल लिंगानुपात 919 लड़कियां प्रति 1000 लड़के था।
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घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक हिंसा को घरेलू हिंसा के दायरे में रखता है।
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दहेज निषेध अधिनियम, 1961 विवाह से पहले, विवाह के समय या विवाह के बाद दहेज देने, लेने या मांगने को अपराध मानता है।
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73वें और 74वें संविधान संशोधनों ने पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए कम-से-कम एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का आधार दिया।
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इन सामाजिक मुद्दों को परीक्षा में कैसे पढ़ना चाहिए?
इन सामाजिक मुद्दों को परीक्षा में कानून, संस्था, योजना-क्रियान्वयन और प्रभावित महिला या बालिका के अधिकार को साथ जोड़कर पढ़ना चाहिए। महिला पर्यवेक्षक जैसी भर्ती परीक्षाओं में सामाजिक मुद्दे केवल नारे या सामान्य ज्ञान नहीं हैं; इनसे कानून, योजना-क्रियान्वयन, परिवार-समाज की भूमिका और सेवा-प्रदाता की जिम्मेदारी जुड़ती है। बाल विवाह, लैंगिक भेदभाव, दहेज, घरेलू हिंसा और महिला सशक्तिकरण एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। कम उम्र में विवाह से लड़की की शिक्षा रुकती है, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर जोखिम बढ़ता है, आर्थिक निर्भरता बनी रहती है और घरेलू हिंसा या दहेज-उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज उठाने की क्षमता घटती है। इसलिए इन विषयों को “समस्या और कानून” दोनों कोणों से पढ़ना चाहिए।
जनगणना 2011 के राजस्थान प्राथमिक जनगणना सार के अनुसार राजस्थान की महिला साक्षरता दर 52.1 प्रतिशत थी, इसलिए सामाजिक मुद्दों के उत्तर में शिक्षा और अधिकार-जानकारी को अलग करके नहीं देखा जा सकता। राजस्थान जैसे राज्यों में आंगनवाड़ी, महिला एवं बाल विकास विभाग, विद्यालय, पंचायत, पुलिस, बाल कल्याण समिति और स्वास्थ्य तंत्र की भूमिका व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण है। समेकित बाल विकास सेवा से जुड़े कार्यकर्ता और पर्यवेक्षक परिवारों से नियमित संपर्क में रहते हैं, इसलिए वे जोखिम पहचान, परामर्श, रेफरल और सामुदायिक जागरूकता की पहली कड़ी बन सकते हैं। परीक्षा में अक्सर परिभाषा, आयु-सीमा, अधिनियम का वर्ष, अधिकार-आधारित दृष्टिकोण और संस्थागत जिम्मेदारी पूछी जा सकती है।
याद रखने योग्य बात: सामाजिक मुद्दे का सही उत्तर वही होगा जिसमें कानून, संस्था और प्रभावित महिला या बालिका के अधिकार को साथ पढ़ा गया हो।
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