मुख्य तथ्य

  • दादू दयाल (1544–1603 ई.) दादू पंथ के संस्थापक थे; नरैना, जयपुर के पास इसका प्रमुख केंद्र माना जाता है और उनकी दादू वाणी में लगभग 5,000 पद माने जाते है...
  • मीराबाई (लगभग 1498–1547 ई.) मेड़ता की कृष्ण-भक्त संत थीं; उनके भजन ब्रज भाषा, राजस्थानी और गुजराती परंपरा में मिलते हैं।
  • चरणदासी संप्रदाय के चरण दास (1703–1782 ई.) से सहजो बाई और दया बाई जैसी महिला संतों की परंपरा जुड़ी है।

मुख्य बिंदु

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    पंचपीर के रूप में पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, तेजाजी और हड़बूजी राजस्थान के प्रमुख लोक देवता माने जाते हैं; इनसे फड़ और भोपा-भोपी परंपरा जुड़ी है।

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    रामदेव पीर का संबंध पश्चिमी राजस्थान की रूणिचा, रामदेवरा परंपरा से माना जाता है; वे हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों में “रामसा पीर” रूप में पूजित हैं।

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    दादू दयाल (1544–1603 ई.) दादू पंथ के संस्थापक थे; नरैना, जयपुर के पास इसका प्रमुख केंद्र माना जाता है और उनकी दादू वाणी में लगभग 5,000 पद माने जाते हैं।

  4. 4

    मीराबाई (लगभग 1498–1547 ई.) मेड़ता की कृष्ण-भक्त संत थीं; उनके भजन ब्रज भाषा, राजस्थानी और गुजराती परंपरा में मिलते हैं।

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    ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर को अपना प्रमुख केंद्र बनाया; अजमेर दरगाह राजस्थान की साझा धार्मिक संस्कृति का प्रमुख केंद्र है।

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    चरणदासी संप्रदाय के चरण दास (1703–1782 ई.) से सहजो बाई और दया बाई जैसी महिला संतों की परंपरा जुड़ी है।

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    दिलवाड़ा मंदिर, माउंट आबू और रणकपुर मंदिर, पाली राजस्थान में जैन धर्म, व्यापारी संरक्षण और संगमरमर स्थापत्य के प्रमुख उदाहरण हैं।

राजस्थान में लोक देवता और पंचपीर किसे कहा जाता है?

राजस्थान में लोक देवता वे ऐतिहासिक या लोक-स्मृति में प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हैं जिन्हें समुदाय रक्षक, योद्धा, पशुधन-संरक्षक या चमत्कारी संत मानकर पूजता है, और पंचपीर के रूप में पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, तेजाजी और हड़बूजी को याद किया जाता है। जनगणना 2011 के राजस्थान प्राथमिक जनगणना सार के अनुसार राज्य की 75.1% आबादी ग्रामीण थी, इसलिए लोक देवताओं की कथा, मेला और पशुधन-संरक्षण वाली स्मृति को ग्रामीण समाज के संदर्भ में पढ़ना सबसे स्वाभाविक है। इनकी पूजा प्रायः संस्कृत ग्रंथों के बजाय लोककथा, गीत, मेला और फड़ जैसे दृश्य-मौखिक माध्यमों से चलती है। पंचपीर के रूप में पाबूजी, गोगाजी, रामदेवजी, तेजाजी और हड़बूजी को याद किया जाता है। “पीर” शब्द इस परंपरा के समन्वयात्मक रूप को भी दिखाता है, क्योंकि कई लोक देवताओं को हिंदू और मुसलमान दोनों मानते हैं।

फड़ इस परंपरा का परीक्षा-योग्य शब्द है। यह कपड़े पर बना चित्रपट होता है, जिसमें लोक देवता का जीवन और चमत्कार दिखाए जाते हैं। भोपा-भोपी लोक पुजारी इस फड़ के सामने देवता का आख्यान गाते हैं। पाबूजी की फड़ विशेष प्रसिद्ध है और भोपा रात्रि-जागरण में इसे गाते-बजाते हैं। आरएसएसबी स्तर पर इस विषय में विस्तृत कथा से अधिक नाम, स्थान, समुदाय, भूमिका और मेला याद रखना उपयोगी है।

याद रखने की बात: पंचपीर को लोक आस्था, पशुधन-संरक्षण, फड़ और हिंदू-मुस्लिम समन्वय से जोड़कर पढ़ें।

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