प्राकृतिक संसाधन, कृषि, खनिज, सिंचाई परियोजनाएँ और वन्यजीव
मुख्य तथ्य
- राजस्थान में कृषि को 10 कृषि-जलवायु क्षेत्रों से समझा जाता है; वर्षा, मिट्टी, धरातल और सिंचाई फसल-पद्धति तय करते हैं।
- शुष्क पश्चिमी मैदान कृषि विभाग के कृषि-जलवायु क्षेत्र विवरण में 47.4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र से जुड़ा है।
- वर्ष 2024-25 में राजस्थान के कुल प्रतिवेदित क्षेत्र का 53.02 प्रतिशत भाग शुद्ध बोया गया क्षेत्र था, इसलिए भूमि-उपयोग वस्तुनिष्ठ परीक्षा का प्रमुख तथ्य...
- कृषि गणना 2015-16 के अनुसार राजस्थान में 76.55 लाख परिचालन भूधारिताएँ थीं और औसत आकार 2.73 हेक्टेयर था।
- 2023-24 में राजस्थान बाजरा उत्पादन में प्रथम था और राष्ट्रीय उत्पादन में 41.34 प्रतिशत योगदान देता था।
मुख्य बिंदु
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राजस्थान में कृषि को 10 कृषि-जलवायु क्षेत्रों से समझा जाता है; वर्षा, मिट्टी, धरातल और सिंचाई फसल-पद्धति तय करते हैं।
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शुष्क पश्चिमी मैदान कृषि विभाग के कृषि-जलवायु क्षेत्र विवरण में 47.4 लाख हेक्टेयर क्षेत्र से जुड़ा है।
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वर्ष 2024-25 में राजस्थान के कुल प्रतिवेदित क्षेत्र का 53.02 प्रतिशत भाग शुद्ध बोया गया क्षेत्र था, इसलिए भूमि-उपयोग वस्तुनिष्ठ परीक्षा का प्रमुख तथ्य है।
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कृषि गणना 2015-16 के अनुसार राजस्थान में 76.55 लाख परिचालन भूधारिताएँ थीं और औसत आकार 2.73 हेक्टेयर था।
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2023-24 में राजस्थान बाजरा उत्पादन में प्रथम था और राष्ट्रीय उत्पादन में 41.34 प्रतिशत योगदान देता था।
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2023-24 में राजस्थान राई और सरसों में प्रथम था और राष्ट्रीय योगदान 43.43 प्रतिशत था।
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प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना 1 जुलाई 2015 को शुरू हुई; राजस्थान में जलागम, बूँद-बूँद और फुहार सिंचाई खेती के जोखिम को घटाते हैं।
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प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना खरीफ 2016 से लागू है; खरीफ खाद्यान्न और तिलहन पर किसान प्रीमियम 2 प्रतिशत, रबी फसलों पर 1.5 प्रतिशत और वार्षिक वाणिज्यिक या बागवानी फसलों पर 5 प्रतिशत है।
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राजस्थान की खेती का कृषि-जलवायु आधार क्या है?
राजस्थान की खेती का कृषि-जलवायु आधार वर्षा, मिट्टी, तापमान, सिंचाई और धरातल के फर्क से बनता है, इसलिए राज्य को केवल मरुस्थलीय खेती मानना परीक्षा में गलत निष्कर्ष दे सकता है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की राजस्थान राज्य प्रोफ़ाइल के अनुसार राज्य में 10 कृषि-जलवायु क्षेत्र हैं, इसलिए फसल-पहचान को जिले की नमी, मिट्टी और सिंचाई से जोड़कर पढ़ना जरूरी है।
शुष्क पश्चिमी मैदान में कम वर्षा, रेतीली मिट्टी और ऊँचा तापमान बाजरा, मोठ, तिल और ग्वार जैसी कठोर फसलों को महत्व देते हैं। सिंचित उत्तर-पश्चिमी मैदान में नहर जल कपास, गेहूँ, सरसों और ग्वार के लिए आधार बनता है। लूणी बेसिन में कुएँ, तालाब और सीमित नमी खरीफ तथा रबी दोनों के चयन को प्रभावित करते हैं। इसका अर्थ है कि पश्चिमी राजस्थान में फसल का चुनाव केवल बाजार से नहीं, बल्कि पानी की भरोसेमंदी और मिट्टी की बनावट से भी तय होता है।
पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की तस्वीर अलग है। भरतपुर, धौलपुर, करौली और सवाई माधोपुर जैसे पूर्वी मैदानों में जलोढ़ धरातल और बाढ़-प्रवण स्थिति फसल-पद्धति को पश्चिम से अलग बनाती है। कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ वाला आर्द्र दक्षिण-पूर्वी मैदान अधिक वर्षा, काली मिट्टी और चंबल कमांड के कारण सोयाबीन, गेहूँ, सरसों, चावल, धनिया और सब्जियों को सहारा देता है।
याद रखने लायक बात: जिले को उसकी वर्षा, मिट्टी और सिंचाई से जोड़कर पढ़ना फसल-सम्बंधी बहुविकल्पीय प्रश्नों में सबसे उपयोगी तरीका है।
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