मुख्य तथ्य

  • 1970 में भारत ने विटामिन A की कमी से होने वाले पोषण-अंधत्व की रोकथाम के लिए राष्ट्रीय प्रोफिलैक्सिस कार्यक्रम शुरू किया;
  • 1962 में राष्ट्रीय घेंघा नियंत्रण कार्यक्रम शुरू हुआ और 1992 में इसका दायरा बढ़ाकर राष्ट्रीय आयोडीन अल्पता विकार नियंत्रण कार्यक्रम किया गया;
  • 2006 के खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम ने FSSAI की स्थापना की; यही संस्था फोर्टिफाइड नमक और मुख्य खाद्य पदार्थों सहित खाद्य-फोर्टिफिकेशन मानक तय करती ह...
  • 2013 के राष्ट्रीय आयरन प्लस पहल ने जीवन-चक्र दृष्टिकोण से बच्चों, किशोरों, गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और प्रजनन आयु की महिलाओं में IFA पूरकता को म...
  • 2018 में एनीमिया मुक्त भारत रणनीति 6-6-6 ढांचे के साथ शुरू हुई; इसमें 6 लाभार्थी समूह, 6 हस्तक्षेप और 6 संस्थागत तंत्र जोड़े गए।

मुख्य बिंदु

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    1970 में भारत ने विटामिन A की कमी से होने वाले पोषण-अंधत्व की रोकथाम के लिए राष्ट्रीय प्रोफिलैक्सिस कार्यक्रम शुरू किया; आज बच्चों को 9 माह से 5 वर्ष तक कुल 9 खुराक दी जाती हैं।

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    1962 में राष्ट्रीय घेंघा नियंत्रण कार्यक्रम शुरू हुआ और 1992 में इसका दायरा बढ़ाकर राष्ट्रीय आयोडीन अल्पता विकार नियंत्रण कार्यक्रम किया गया; आयोडीन-युक्त नमक इसका मुख्य उपाय है।

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    2006 के खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम ने FSSAI की स्थापना की; यही संस्था फोर्टिफाइड नमक और मुख्य खाद्य पदार्थों सहित खाद्य-फोर्टिफिकेशन मानक तय करती है।

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    2013 के राष्ट्रीय आयरन प्लस पहल ने जीवन-चक्र दृष्टिकोण से बच्चों, किशोरों, गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और प्रजनन आयु की महिलाओं में IFA पूरकता को मजबूत किया।

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    2018 में एनीमिया मुक्त भारत रणनीति 6-6-6 ढांचे के साथ शुरू हुई; इसमें 6 लाभार्थी समूह, 6 हस्तक्षेप और 6 संस्थागत तंत्र जोड़े गए।

  6. 6

    2018 में पोषण अभियान मातृ और बाल पोषण में अभिसरण, निगरानी और सामुदायिक भागीदारी मजबूत करने के लिए शुरू हुआ।

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    राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस 10 फरवरी और 10 अगस्त को मनाया जाता है; 1-19 वर्ष के बच्चों और किशोरों में कृमि-संक्रमण घटाकर एनीमिया नियंत्रण में मदद मिलती है।

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    बाल दस्त में ORS के साथ 14 दिन जिंक देने की सलाह दी जाती है; 2-6 माह में 10 मिलीग्राम और 6 माह से 5 वर्ष में 20 मिलीग्राम प्रतिदिन सामान्य कार्यक्रमीय खुराक है।

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को छिपी भूख क्यों कहा जाता है?

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को छिपी भूख इसलिए कहा जाता है, क्योंकि भोजन से पेट भर सकता है और ऊर्जा भी मिल सकती है, फिर भी शरीर में ज़रूरी विटामिन और खनिज कम रह जाते हैं। सूक्ष्म पोषक तत्व वे विटामिन और खनिज हैं जिनकी मात्रा कम चाहिए, पर शरीर पर असर बहुत बड़ा होता है। आयरन, आयोडीन, जिंक, कैल्शियम, विटामिन ए, विटामिन डी, फोलिक एसिड और विटामिन बी12 जैसे तत्व वृद्धि, रक्त-निर्माण, दृष्टि, हड्डी, प्रतिरक्षा, मस्तिष्क-विकास और गर्भावस्था के परिणामों से जुड़े हैं। भोजन में ऊर्जा पर्याप्त हो सकती है, फिर भी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बनी रहे तो इसे छिपी भूख कहा जाता है। एनएफएचएस-5 राजस्थान फैक्टशीट के अनुसार 2020-21 में राजस्थान में 6-23 माह के केवल 8.3% बच्चों को पर्याप्त आहार मिल रहा था। ऐसे बच्चे सामान्य या हल्के कम वजन वाले दिख सकते हैं, पर उनमें बार-बार संक्रमण, सीखने में कठिनाई, थकान या वृद्धि रुकना दिख सकता है।

कमी के कारण केवल गरीब भोजन नहीं होते। एक ही अनाज पर निर्भरता, कम दाल-सब्जी-फल, बार-बार दस्त, कृमि-संक्रमण, बहुत जल्दी या बहुत देर से पूरक आहार, गर्भावस्था में अपर्याप्त भोजन, भोजन की गलत आदतें और स्वास्थ्य सेवाओं तक कम पहुंच भी कारण हैं। महिला पर्यवेक्षक परीक्षा में यह दृष्टि ज़रूरी है कि नियंत्रण केवल गोली बांटने से नहीं, बल्कि आहार विविधता, पूरकता, फोर्टिफिकेशन, संक्रमण नियंत्रण, वृद्धि निगरानी और परामर्श के मेल से होता है।

याद रखें: सूक्ष्म पोषक तत्व कम मात्रा में चाहिए, लेकिन उनकी कमी पूरे जीवन-चक्र को प्रभावित कर सकती है।

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