जन-राजनीति से पहले राजपूताना

राजस्थान का आधुनिक राजनीतिक इतिहास किसी एक ब्रिटिश प्रांत से नहीं, बल्कि राजपूताना की रियासती व्यवस्था से शुरू होता है। मेवाड़, मारवाड़, जयपुर, बीकानेर, जैसलमेर, कोटा, बूंदी, भरतपुर, अलवर, धौलपुर, करौली, टोंक, सिरोही, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, झालावाड़, किशनगढ़ और शाहपुरा में अलग-अलग शासक, दरबार और स्थानीय शिकायतें थीं। अजमेर-मेरवाड़ा अलग था, क्योंकि वह सीधे ब्रिटिश प्रशासन के अधीन था। LDC GK के लिए यह भेद जरूरी है: जयपुर या मेवाड़ का आंदोलन आम तौर पर रियासती शासक और उसके अधिकारियों को निशाना बनाता था, जबकि अजमेर की गतिविधि ब्रिटिश भारत की राजनीति से अधिक सीधे जुड़ सकती थी। 1818 की संधि-श्रृंखला ने मराठा दबाव, पिंडारी आक्रमणों और तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद अधिकतर राजपूताना राज्यों को ब्रिटिश सर्वोपरिता के अधीन कर दिया। शासकों के पास आंतरिक अधिकार बचे रहे, लेकिन बाहरी संबंध, सुरक्षा और राजनीतिक निगरानी राजपूताना एजेंसी तथा राजनीतिक एजेंटों के जरिए ब्रिटिश नियंत्रण में चली गई। इसी व्यवस्था से समझ आता है कि राजस्थान में बाद का राष्ट्रवाद एक साथ दो निशानों पर चला: रियासतों के ऊपर औपनिवेशिक शक्ति और रियासतों के भीतर निरंकुश शासन। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के लिए तीन श्रेणियां अलग रखें: सीधे शासित अजमेर-मेरवाड़ा, परोक्ष नियंत्रण वाली रियासतें, और इन सीमाओं को पार करने वाले जन-संगठन। यही पृष्ठभूमि यह भी समझाती है कि स्वतंत्रता के बाद एकीकरण कठिन क्यों था। समस्या केवल ब्रिटिश अधिकार हटाने की नहीं थी; अनेक दरबारों, जागीरों, प्रशासनिक आदतों और जन-आंदोलनों को एक राज्य में जोड़ना था। इसलिए 1857, प्रजामंडल और एकीकरण के प्रश्न एक ही श्रृंखला के भाग हैं, तीन अलग अध्याय नहीं।

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