मुख्य तथ्य

  • राजस्थान के मेलों को सिर्फ़ आम त्योहारों की तरह याद न करें; हर मेला किसी ख़ास स्थान, तिथि और समुदाय से जुड़ा होता है।
  • पुष्कर, अजमेर शरीफ, बेणेश्वर, रामदेवरा, गोगामेड़ी, देशनोक और श्री महावीर जी राजस्थान के प्रमुख तीर्थ-स्थल हैं।
  • तीज और गणगौर याद रखते समय जयपुर, बूंदी, मेवाड़ और चैत्र, श्रावण, भाद्रपद के अंतर पर ध्यान देना ज़रूरी है।
  • आदिवासी और पशुपालक मेले भील, रैबारी, कालबेलिया, गरासिया, मीणा और सहरिया सामाजिक भूगोल से जुड़ते हैं।
  • कालबेलिया में समुदाय और 2010 में UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होना, दोनों पहलू ज़रूरी हैं।

मुख्य बिंदु

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    राजस्थान के मेलों को सिर्फ़ आम त्योहारों की तरह याद न करें; हर मेला किसी ख़ास स्थान, तिथि और समुदाय से जुड़ा होता है।

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    पुष्कर, अजमेर शरीफ, बेणेश्वर, रामदेवरा, गोगामेड़ी, देशनोक और श्री महावीर जी राजस्थान के प्रमुख तीर्थ-स्थल हैं।

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    तीज और गणगौर याद रखते समय जयपुर, बूंदी, मेवाड़ और चैत्र, श्रावण, भाद्रपद के अंतर पर ध्यान देना ज़रूरी है।

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    आदिवासी और पशुपालक मेले भील, रैबारी, कालबेलिया, गरासिया, मीणा और सहरिया सामाजिक भूगोल से जुड़ते हैं।

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    कालबेलिया में समुदाय और 2010 में UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल होना, दोनों पहलू ज़रूरी हैं।

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    देवराला की रूप कंवर 1987 घटना और सती निवारण अधिनियम 1987 सामाजिक प्रथा को सुधार-कानून से जोड़ते हैं।

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    मारवाड़ महोत्सव, मरु महोत्सव और जोधपुर के लोक आयोजन आज के सांस्कृतिक पर्यटन और उसके प्रशासन की मिसाल हैं।

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    लोकनृत्य को क्षेत्र और समुदाय से बाँधना चाहिए: घूमर मेवाड़-मारवाड़, झूमर हाड़ौती, कालबेलिया सपेरा परंपरा।

राजस्थान में हिंदू मेलों का कैलेंडर-क्रम कैसे याद रखें?

राजस्थान में हिंदू मेलों का कैलेंडर-क्रम कार्तिक में पुष्कर और चंद्रभागा, चैत्र में गणगौर, श्रावण में हरियाली तीज और भाद्रपद में कजली तीज को अलग-अलग रखकर याद किया जाता है।

राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार पुष्कर सरोवर 52 स्नान घाटों से घिरा है, इसलिए पुष्कर को केवल पशु-बाजार नहीं, तीर्थ और बाजार के संयुक्त रूप में पढ़ना चाहिए।

राजस्थान के सामाजिक जीवन की पहली परत चंद्र कैलेंडर और स्थान से बनती है।

प्रमुख हिंदू मेला-कैलेंडर

मेला/त्योहारकैलेंडर-संकेतस्थानप्रमुख पहचान
पुष्कर मेलाकार्तिक पूर्णिमा; मेला-सप्ताह कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तकअजमेर; पुष्कर सरोवर; ब्रह्मा मंदिर क्षेत्रअजमेर जिला, पुष्कर सरोवर, ब्रह्मा मंदिर क्षेत्र और ऊँट-पशु बाजार को एक साथ जोड़ता है; पश्चिमी भारत के सबसे प्रसिद्ध पशु-तीर्थ मेलों में गिना जाता है।
गणगौरचैत्र शुक्ल तृतीया; होली के बाद शुरू होकर गौरी और ईसर की पूजा से पूरीमेवाड़ और जयपुर; उदयपुर की झील-शोभायात्रा और जयपुर की नगर-शोभायात्राचैत्र से जुड़ती है, कार्तिक से नहीं।
गुलाबी गणगौरचैत्रनाथद्वाराक्षेत्रीय गुलाबी गणगौर रूप; गुलाबी सजावट, वस्त्र तथा चित्रण-शैली इसे हरि गणगौर और चुनरी गणगौर से अलग करती है।
हरियाली तीजश्रावण शुक्ल तृतीयाजयपुरएक ही उत्सव-परिवार में महीने को लेकर होने वाले भ्रम का हिस्सा।
कजली तीजभाद्रपद कृष्ण तृतीयाबूंदीएक ही उत्सव-परिवार में महीने को लेकर होने वाले भ्रम का हिस्सा।
चंद्रभागा मेलाकार्तिक पूर्णिमा के आसपासझालरापाटन; झालावाड़ से लगभग 6 किमी दूर; चंद्रभागा नदी का तटनदी-स्नान ऊँट, घोड़े, गाय, बैल और भैंस वाले पशु मेले से जुड़ता है।

सामाजिक रूप

  • इन उत्सवों में स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी दिखाई देती है: झूले, गीत, शोभायात्राएँ, सजी प्रतिमाएँ, मेहंदी और विवाहित स्त्रियों की पूजा।
  • यह सिर्फ भक्ति तक सीमित नहीं है।
  • मेले लेन-देन, पशु-व्यापार, शिल्प-बिक्री, वेश-प्रदर्शन और जाति-समुदाय के आपसी रिश्तों को भी एक जगह लाते हैं।
  • पुष्कर में मरुस्थलीय पशुपालक, व्यापारी और तीर्थयात्री आते हैं।
  • गणगौर और तीज स्त्री-भागीदारी, विवाह से जुड़े रीति-रिवाज और शहरी जुलूसों को सामने लाते हैं।
  • बूंदी की कजली तीज चित्रित द्वारों, राजकीय स्मृति-यात्राओं और स्थानीय बाजारों से हाड़ौती पहचान को जोड़ती है।

साफ कैलेंडर-क्रम

महीनाजुड़ा मेला/त्योहार
कार्तिकपुष्कर और चंद्रभागा
चैत्रगणगौर
श्रावणहरियाली तीज
भाद्रपदकजली तीज
  • जिला-नामों के साथ यह क्रम पुष्कर को मरु महोत्सव से, गणगौर को करणी माता नवरात्रि से और कजली तीज को जयपुर की श्रावणी तीज से अलग करता है।
  • यही क्रम बाजार की लय भी बताता है।
  • शीत और वर्षा के बाद लगने वाले मेले पशुओं की आवाजाही को सहारा देते हैं।
  • तीज जैसी वर्षा-ऋतु की परंपराएँ हरियाली, झूले और गीतों को आगे लाती हैं।
  • जयपुर और उदयपुर में राजकीय शोभायात्राओं ने ऐतिहासिक ढाँचा दिया, पर गाँवों में घरेलू पूजा, मिट्टी की प्रतिमाएँ और स्त्री-गीत परंपराएँ महलों से बाहर भी जीवित रहीं।
  • राजकीय मार्ग और मोहल्ले-स्तर की पूजा का यह मेल राजस्थान की अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान है।

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