मुख्य तथ्य

  • सोशल मीडिया की लत को सीईटी में ऐसी आदत के रूप में समझना चाहिए जिसमें नुकसान होने के बाद भी व्यक्ति बार-बार सोशल मीडिया चलाता रहे और अपने उपयोग पर नियं...
  • सूचनाएँ, पसंद, टिप्पणियाँ और लगातार नया सामग्री-प्रवाह दिमाग में इनाम की उम्मीद बनाते हैं;
  • शारीरिक जोखिमों में डिजिटल नेत्र-तनाव, सिरदर्द, गलत बैठने से गर्दन और पीठ दर्द, देर रात स्क्रीन से बिगड़ी नींद और कम शारीरिक गतिविधि शामिल हैं;
  • मानसिक जोखिमों में चिंता, उदासी या अवसाद जैसी मनोदशा, कम आत्म-सम्मान, लगातार तुलना, कुछ छूट जाने का डर, कम एकाग्रता और निर्भरता शामिल हैं;
  • सामाजिक जोखिम तब दिखते हैं जब आमने-सामने बातचीत घटे, अकेलापन बढ़े, ऑनलाइन उत्पीड़न या गलत सूचना का असर पड़े और विद्यार्थी का गृहकार्य, उपस्थिति या परी...

मुख्य बिंदु

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    सोशल मीडिया की लत को सीईटी में ऐसी आदत के रूप में समझना चाहिए जिसमें नुकसान होने के बाद भी व्यक्ति बार-बार सोशल मीडिया चलाता रहे और अपने उपयोग पर नियंत्रण न रख पाए; छात्र जीवन में यह तब गंभीर हो जाती है जब फोन देखना, स्क्रोल करना और पोस्ट करना पढ़ाई, नींद, मनोदशा और रिश्तों पर हावी होने लगे।

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    सूचनाएँ, पसंद, टिप्पणियाँ और लगातार नया सामग्री-प्रवाह दिमाग में इनाम की उम्मीद बनाते हैं; छात्र जब पढ़ाई या नींद छोड़कर बार-बार ऐप खोलता है, तब यह चक्र स्वास्थ्य और प्रदर्शन दोनों को प्रभावित करता है।

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    शारीरिक जोखिमों में डिजिटल नेत्र-तनाव, सिरदर्द, गलत बैठने से गर्दन और पीठ दर्द, देर रात स्क्रीन से बिगड़ी नींद और कम शारीरिक गतिविधि शामिल हैं; ये जोखिम लंबे समय तक रोजमर्रा के उपयोग में बढ़ते हैं।

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    मानसिक जोखिमों में चिंता, उदासी या अवसाद जैसी मनोदशा, कम आत्म-सम्मान, लगातार तुलना, कुछ छूट जाने का डर, कम एकाग्रता और निर्भरता शामिल हैं; किशोरों में ये पढ़ाई और रिश्तों पर असर डाल सकते हैं।

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    सामाजिक जोखिम तब दिखते हैं जब आमने-सामने बातचीत घटे, अकेलापन बढ़े, ऑनलाइन उत्पीड़न या गलत सूचना का असर पड़े और विद्यार्थी का गृहकार्य, उपस्थिति या परीक्षा-तैयारी कमजोर होने लगे।

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    चेतावनी संकेतों में ऑनलाइन बिताए समय पर नियंत्रण खोना, रोकने पर चिड़चिड़ापन, उपयोग छिपाना, पढ़ाई या नींद की अनदेखी करना, जागते ही फोन देखना और साफ नुकसान के बाद भी उपयोग जारी रखना शामिल हैं।

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    बचाव के उपायों में स्क्रीन समय की सीमा, ऐप टाइमर, भोजन के समय स्क्रीन से दूरी, बिना फोन के पढ़ाई के तय समय, रात में शयन-कक्ष से उपकरण बाहर रखना, डिजिटल डिटॉक्स के तय समय, खेल, शौक, लोगों से आमने-सामने मिलना और ज़रूरत भर सोशल मीडिया चलाना शामिल हैं।

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    20-20-20 नियम में हर लगभग 20 मिनट पर लगभग 6 मीटर दूर किसी चीज़ को लगभग 20 सेकंड देखा जाता है; स्क्रीन-आधारित पढ़ाई और फोन उपयोग में यह आँखों का तनाव कम करने की सरल आदत है।

समस्या को सही ढंग से समझना

सोशल मीडिया का सामान्य उपयोग और ऐसा उपयोग जिस पर नियंत्रण न रहे, अलग बातें हैं। पढ़ाई की सूचना, मित्रों से संपर्क, समाचार या कौशल सीखने के लिए सीमित उपयोग उपयोगी हो सकता है। समस्या तब बनती है जब व्यक्ति नुकसान समझते हुए भी उपयोग रोक नहीं पाता, पढ़ाई या नींद छूटती है, मन बार-बार फोन देखने को मजबूर करता है और उपयोग के बाद भी संतोष नहीं मिलता। इसलिए सीईटी के वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर इसे ऐसी आदत के रूप में समझना चाहिए जिस पर व्यक्ति का नियंत्रण न रहे और नुकसान के बाद भी वह सोशल मीडिया चलाता रहे; परीक्षा का जोर किसी बीमारी का कोड याद करने पर नहीं है।

इस आदत को मजबूत करने में नोटिफिकेशन और बार-बार मिलने वाले छोटे इनाम बड़ी भूमिका निभाते हैं। नया संदेश, लाइक, कमेंट, छोटा वीडियो या अचानक मिली प्रतिक्रिया दिमाग में यह उम्मीद बनाती है कि अगली बार कुछ रोचक मिलेगा। यही अनिश्चित इनाम व्यक्ति को बार-बार ऐप खोलने की ओर धकेलता है। लगातार आती पोस्टें और तुरंत मिलने वाले नोटिफिकेशन ध्यान को ऐप में अटकाए रखते हैं।

याद रखने योग्य बात यह है कि समस्या ऐप के होने से नहीं, उपयोग पर नियंत्रण घटने और वास्तविक जीवन के काम प्रभावित होने से बनती है।

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