मुख्य तथ्य

  • आधिकारिक इकाई राजस्थान के उत्पादन क्षेत्रों को राज्य आय, बजट, कल्याण कानून, संस्थाओं और ग्रामीण विकास से जोड़ती है।
  • 2025-26 के अग्रिम अनुमान में चालू कीमतों पर GSDP ₹18.75 लाख करोड़ है;
  • कृषि को केवल फ़सलों की सूची से नहीं, बल्कि वर्षा, सिंचाई, मिट्टी, फ़सल चयन, बाज़ार और सूखे से निपटने की क्षमता के साथ समझना चाहिए।
  • पशुपालन ग्रामीण आय के जोखिम को बाँटता है और डेयरी, ऊन, खाद, परिवहन, प्रसंस्करण तथा सेवाओं में रोजगार देता है, पर यह चारे, पानी और पशु-स्वास्थ्य पर निर...
  • खनिजों से विकास तभी होता है जब नियंत्रित खनन, स्थानीय प्रसंस्करण, मज़दूर सुरक्षा, परिवहन और पर्यावरण प्रबंधन साथ हों;

मुख्य बिंदु

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    आधिकारिक इकाई राजस्थान के उत्पादन क्षेत्रों को राज्य आय, बजट, कल्याण कानून, संस्थाओं और ग्रामीण विकास से जोड़ती है।

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    2025-26 के अग्रिम अनुमान में चालू कीमतों पर GSDP ₹18.75 लाख करोड़ है; चालू कीमतों वाले सकल राज्य मूल्य संवर्धन में कृषि और संबद्ध गतिविधियों का हिस्सा 25.74 प्रतिशत, उद्योग का 26.55 प्रतिशत और सेवाओं का 47.71 प्रतिशत है।

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    कृषि को केवल फ़सलों की सूची से नहीं, बल्कि वर्षा, सिंचाई, मिट्टी, फ़सल चयन, बाज़ार और सूखे से निपटने की क्षमता के साथ समझना चाहिए।

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    पशुपालन ग्रामीण आय के जोखिम को बाँटता है और डेयरी, ऊन, खाद, परिवहन, प्रसंस्करण तथा सेवाओं में रोजगार देता है, पर यह चारे, पानी और पशु-स्वास्थ्य पर निर्भर है।

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    खनिजों से विकास तभी होता है जब नियंत्रित खनन, स्थानीय प्रसंस्करण, मज़दूर सुरक्षा, परिवहन और पर्यावरण प्रबंधन साथ हों; केवल कच्चा माल मिलना पर्याप्त नहीं है।

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    हस्तशिल्प और छोटे उद्यम कौशल तथा स्थानीय सामग्री को आय में बदलते हैं, जबकि कार्यशील पूंजी, गुणवत्ता, बुनियादी ढाँचा और बाज़ार तक पहुँच उनकी टिकाऊ सफलता तय करते हैं।

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    राज्य आय पूरी अर्थव्यवस्था के उत्पादन को मापती है, जबकि राज्य बजट सरकारी प्राप्तियों और खर्च का हिसाब है; दोनों को एक ही कुल राशि नहीं मानना चाहिए।

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    राजस्व घाटा, राजकोषीय घाटा और प्राथमिक घाटा क्रमशः राजस्व खाते, कुल उधारी की ज़रूरत और ब्याज के बोझ से जुड़े अलग प्रश्नों का उत्तर देते हैं।

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    बेरोजगारी का उपाय उसके रूप से मेल खाना चाहिए; मौसमी काम, छिपी बेरोजगारी, शिक्षित बेरोजगारी और अल्प-रोजगार के लिए अलग उपाय चाहिए।

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    कल्याण कानून, विकास और वित्तीय संस्थाएँ, ग्राम पंचायत तथा ग्राम सभा का सामाजिक अंकेक्षण सरकारी नीति को परिवार की सुरक्षा और जवाबदेह ग्रामीण क्रियान्वयन से जोड़ते हैं।

आधिकारिक पाठ्यक्रम और राजस्थान की अर्थव्यवस्था

मौजूदा आँकड़े और कानून 2025-26 तक के हैं।

आधिकारिक सीईटी वरिष्ठ माध्यमिक पाठ्यक्रम राजस्थान की अर्थव्यवस्था को एक जुड़ी हुई इकाई के रूप में रखता है। इसमें राज्य के विकास में उद्योग, कृषि, पशुपालन और खनिज क्षेत्र की भूमिका; अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ और समस्याएँ; राज्य आय और बजट; हस्तशिल्प, बेरोजगारी, सूखा और अकाल; कल्याणकारी योजनाएँ और अधिनियम; विकास तथा वित्तीय संस्थाएँ; छोटे उद्यम; ग्रामीण विकास में पंचायती राज; MGNREGA; और विकसित भारत—जी राम जी अधिनियम शामिल हैं। इन बिंदुओं को अलग-अलग सूची की तरह नहीं, बल्कि संसाधन से उत्पादन, उत्पादन से आय, आय से सरकारी वित्त और फिर विकास के क्रियान्वयन तक की कड़ी के रूप में समझना चाहिए।

राजस्थान का क्षेत्र बहुत बड़ा है और इसके इलाकों में गहरा अंतर है। पश्चिम के सूखे जिले, उत्तर के नहर-सिंचित क्षेत्र, खनिज पट्टियाँ, पूर्वी मैदान, दक्षिण-पूर्वी पठार और दक्षिण के जनजातीय इलाके एक जैसी आर्थिक दशाएँ नहीं रखते। कहीं वर्षा का जोखिम खेती को प्रभावित करता है, कहीं पशुपालन अधिक नियमित आय देता है, कहीं खनिज खनन और उद्योग का आधार बनते हैं, तो कहीं पारंपरिक कौशल हस्तशिल्प से आय देता है। यही क्षेत्रीय विविधता राज्य की अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषता है।

राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2025-26 में 2025-26 के लिए चालू कीमतों पर GSDP ₹18.75 लाख करोड़ का अग्रिम अनुमान है। चालू कीमतों वाले सकल राज्य मूल्य संवर्धन में कृषि और संबद्ध गतिविधियों का हिस्सा 25.74 प्रतिशत, उद्योग का 26.55 प्रतिशत और सेवाओं का 47.71 प्रतिशत है। ये उस वर्ष के अग्रिम अनुमान हैं, हमेशा के लिए तय अनुपात नहीं। परीक्षा में मुख्य बात यह है कि सेवाओं का मूल्य संवर्धन हिस्सा सबसे बड़ा है, फिर भी रोजगार, कच्चे माल, ग्रामीण मांग और क्षेत्रीय संतुलन के लिए कृषि, पशुधन, खनिज, उद्योग और हस्तशिल्प बहुत महत्त्वपूर्ण हैं।

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मॉडल उत्तर

राज्य आय पूरे राज्य की अर्थव्यवस्था में उत्पादन से बने मूल्य को मापती है। बजट केवल सरकार की प्राप्तियों और खर्च का हिसाब रखता है। निजी उत्पादन GSDP में जुड़ता है, पर उसकी पूरी राशि सरकारी आय नहीं बनती; केवल लागू कर, फ़ीस और दूसरी सरकारी प्राप्तियाँ बजट में आती हैं।

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