मुख्य तथ्य

  • बलवंत राय मेहता समिति, 1957 ने त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था के ज़रिए लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का समर्थन किया।
  • 2 अक्टूबर 1959 को जवाहरलाल नेहरू ने नागौर, राजस्थान में पंचायती राज का उद्घाटन किया; यह ऐतिहासिक शुरुआत बाद में मिले संवैधानिक दर्जे से अलग है।
  • 73वाँ संशोधन 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ; इससे भाग 9 और पंचायतों से जुड़े 29 विषयों वाली 11वीं अनुसूची जोड़ी गई।
  • राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 ग्रामीण त्रि-स्तरीय व्यवस्था चलाता है: ग्राम पंचायत–सरपंच, पंचायत समिति–प्रधान और जिला परिषद–प्रमुख।
  • अनुच्छेद 243D आरक्षण की संवैधानिक न्यूनतम सीमा तय करता है; राजस्थान के कानून में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण है।

मुख्य बिंदु

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    बलवंत राय मेहता समिति, 1957 ने त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था के ज़रिए लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का समर्थन किया।

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    2 अक्टूबर 1959 को जवाहरलाल नेहरू ने नागौर, राजस्थान में पंचायती राज का उद्घाटन किया; यह ऐतिहासिक शुरुआत बाद में मिले संवैधानिक दर्जे से अलग है।

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    73वाँ संशोधन 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ; इससे भाग 9 और पंचायतों से जुड़े 29 विषयों वाली 11वीं अनुसूची जोड़ी गई।

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    राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 ग्रामीण त्रि-स्तरीय व्यवस्था चलाता है: ग्राम पंचायत–सरपंच, पंचायत समिति–प्रधान और जिला परिषद–प्रमुख।

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    ग्राम सभा संबंधित गाँव क्षेत्र के पंजीकृत मतदाताओं का निकाय है, जबकि ग्राम पंचायत गाँव स्तर की चुनी हुई संस्था है।

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    अनुच्छेद 243D आरक्षण की संवैधानिक न्यूनतम सीमा तय करता है; राजस्थान के कानून में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण है।

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    पेसा, 1996 अनुसूचित क्षेत्रों के लिए भाग 9 का विस्तार और अनुकूलन करता है तथा ग्राम सभा-केंद्रित सामुदायिक सुरक्षा को विशेष कानूनी महत्त्व देता है।

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    74वाँ संशोधन 1 जून 1993 से प्रभावी हुआ; इससे भाग 9क और नगरपालिकाओं के 18 कार्यों वाली 12वीं अनुसूची जोड़ी गई।

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    राजस्थान नगर पालिका अधिनियम, 2009 राज्य में नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम का प्रमुख कानून है।

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    राज्य निर्वाचन आयोग स्थानीय चुनाव कराता है, राज्य वित्त आयोग स्थानीय वित्त की समीक्षा करता है और जिला योजना समिति ग्रामीण-शहरी योजनाओं को समेकित करती है।

अर्थ, उद्देश्य और संवैधानिक स्थिति

स्थानीय स्वशासन का अर्थ है कि राज्य सरकार से नीचे चुनी हुई संस्थाएँ स्थानीय प्रतिनिधियों के ज़रिए स्थानीय ज़रूरतों को सँभालें। राजस्थान में ग्रामीण पक्ष पंचायती राज और शहरी पक्ष नगर निकायों से जुड़ा है। इसका आधार लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण है: मोहल्ले की सेवाओं, गाँव की संपत्तियों और स्थानीय विकास के फ़ैसलों पर उन लोगों के नज़दीक चर्चा हो सके जिन पर इनका असर पड़ता है। इससे भागीदारी बढ़ती है, स्थानीय हालात की बेहतर समझ मिलती है और जनता निगरानी कर पाती है।

स्थानीय निकाय संवैधानिक और कानूनी अर्थ में शासन की संस्थाएँ हैं, पर वे संप्रभु नहीं हैं। संसद और राज्य विधानमंडल अपने संवैधानिक क्षेत्रों में काम करते हैं, जबकि पंचायतों और नगरपालिकाओं की शक्तियाँ भाग 9, भाग 9क, राज्य-कानूनों, नियमों, योजनाओं, कर्मचारियों और वित्तीय व्यवस्था से तय होती हैं। नीति-निदेशक तत्वों का अनुच्छेद 40 राज्य को ग्राम पंचायतों का संगठन करने और उन्हें स्वशासन की इकाई के रूप में काम करने योग्य शक्तियाँ देने की दिशा देता है। बाद के संविधान संशोधनों ने अधिक विस्तृत ढाँचा बनाया।

एक व्यावहारिक फर्क याद रखें। गाँव में स्थित किसी विभाग का दफ़्तर अपने-आप पंचायत संस्था नहीं बन जाता और शहर में काम करने वाली राज्य एजेंसी अपने-आप नगरपालिका नहीं होती। संस्था की कानूनी स्थापना, चुना हुआ प्रतिनिधित्व, तय क्षेत्र और सौंपे गए काम उसकी पहचान बताते हैं। स्थानीय सड़क, नाली, पानी, सफाई, रोशनी, अभिलेख, सामुदायिक संपत्ति, कल्याणकारी काम और स्थानीय योजना इनके दायरे में आ सकते हैं, पर वास्तविक जिम्मेदारी कानून और प्रशासनिक हस्तांतरण से तय होती है। इसलिए संवैधानिक अनुसूचियों को संभावित कार्य-क्षेत्र मानें; यह न मानें कि हर सूचीबद्ध काम हर निकाय को अपने-आप पूरा मिल गया।

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2 अक्टूबर 1959 की नागौर घटना राजस्थान में जवाहरलाल नेहरू द्वारा आधुनिक पंचायती राज के ऐतिहासिक उद्घाटन से जुड़ी है। 73वाँ संशोधन 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ और भाग 9 में विस्तृत संवैधानिक ढाँचा आया। पहला ऐतिहासिक आरंभ है, दूसरा संवैधानिक दर्जा।

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