संविधान — मौलिक अधिकार, नीति निदेशक तत्व और मौलिक कर्तव्य
मुख्य तथ्य
- संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ; साधारण कानून और सरकारी कार्रवाई इसकी सीमा में रहते हैं।
- 42वें संशोधन, 1976 से समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता जुड़े; संप्रभु, लोकतांत्रिक और गणराज्य मूल प्रस्तावना में थे।
- मौलिक अधिकार मुख्य रूप से भाग 3 के अनुच्छेद 12 से 35 में हैं; कुछ अधिकार हर व्यक्ति को मिलते हैं, जबकि अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ नागरिकों के लिए हैं...
- अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकार लागू कराने के लिए उच्चतम न्यायालय से जुड़ा है;
- नीति निदेशक तत्व भाग 4 के अनुच्छेद 36 से 51 में हैं; अनुच्छेद 37 के अनुसार वे अदालत से सीधे लागू नहीं होते, फिर भी शासन में मूलभूत हैं।
मुख्य बिंदु
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वरिष्ठ माध्यमिक सीईटी पाठ्यक्रम में संविधान की प्रकृति, प्रस्तावना, मौलिक अधिकार और नीति निदेशक तत्व राजस्थान के विशेष संदर्भ वाली भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।
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संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ; साधारण कानून और सरकारी कार्रवाई इसकी सीमा में रहते हैं।
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भारत का संविधान लिखित, विस्तृत और संसदीय है; इसमें संघीय शक्ति-विभाजन के साथ केंद्र को मज़बूत बनाने वाली एकात्मक विशेषताएँ भी हैं।
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प्रस्तावना भारत को संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बताती है और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता के लक्ष्य रखती है।
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42वें संशोधन, 1976 से समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता जुड़े; संप्रभु, लोकतांत्रिक और गणराज्य मूल प्रस्तावना में थे।
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मौलिक अधिकार मुख्य रूप से भाग 3 के अनुच्छेद 12 से 35 में हैं; कुछ अधिकार हर व्यक्ति को मिलते हैं, जबकि अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ नागरिकों के लिए हैं।
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अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकार लागू कराने के लिए उच्चतम न्यायालय से जुड़ा है; अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के अलावा अन्य विधिक उद्देश्यों के लिए भी रिट शक्ति देता है।
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नीति निदेशक तत्व भाग 4 के अनुच्छेद 36 से 51 में हैं; अनुच्छेद 37 के अनुसार वे अदालत से सीधे लागू नहीं होते, फिर भी शासन में मूलभूत हैं।
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मौलिक कर्तव्य भाग 4क के अनुच्छेद 51क में हैं; 42वें संशोधन से 10 कर्तव्य और 86वें संशोधन से शिक्षा संबंधी कर्तव्य जुड़ा, इसलिए अब कुल 11 कर्तव्य हैं।
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संस्थाओं के सवाल में संघ और राजस्थान की संस्थाओं के साथ संवैधानिक आयोग, कानून से बनी संस्था और प्रशासनिक पद का अंतर साफ़ रखें।
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भारतीय संविधान की प्रकृति
भारत का संविधान देश का सर्वोच्च कानून है। शासन की संस्थाएँ कैसे बनेंगी, किसे कौन-सी शक्ति मिलेगी, उस शक्ति की सीमा क्या होगी और लोक-कल्याण की दिशा क्या रहेगी—इन सबका आधार संविधान देता है। इसलिए कोई साधारण कानून, सरकारी आदेश या भर्ती नियम संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। इस टॉपिक को अनुच्छेदों की लंबी सूची की तरह नहीं, बल्कि शासन चलाने और उसे जवाबदेह रखने वाली व्यवस्था की तरह समझिए।
भारतीय संविधान लिखित और विस्तृत है। इसमें संघ और राज्य, न्यायालय, चुनाव, लोक सेवाएँ, वित्त, अधिकार, आपात उपबंध तथा संशोधन जैसी अनेक व्यवस्थाएँ दी गई हैं। यह संसदीय शासन स्थापित करता है। केंद्र में प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी रहती है। राजस्थान में मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।
भारत में संघीय ढांचा है क्योंकि संविधान संघ और राज्यों के बीच शक्तियाँ बांटता है। साथ ही एकीकृत न्यायपालिका, अखिल भारतीय सेवाएँ, आपात उपबंध और संघ की महत्वपूर्ण शक्तियाँ केंद्र को मज़बूत बनाती हैं। इसलिए परीक्षा में सही पहचान होती है—संघीय ढांचा, पर कुछ एकात्मक विशेषताएँ भी। स्वतंत्र न्यायपालिका और न्यायिक समीक्षा संविधान की सर्वोच्चता को व्यावहारिक सुरक्षा देते हैं। कोई विभाग अपने आदेश को केवल प्रशासनिक बताकर संवैधानिक सीमा से बाहर नहीं ले जा सकता।
संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ और 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। दोनों तारीखों को मिलाइए मत। पहली तारीख संविधान सभा द्वारा पाठ स्वीकार किए जाने से जुड़ी है, दूसरी संवैधानिक व्यवस्था के लागू होने से।
अभ्यास सवाल 1: राजस्थान का कोई भर्ती नियम समानता के संवैधानिक अधिकार से टकराता है। केवल विभाग द्वारा जारी होने के कारण वह नियम सही नहीं मान लिया जाएगा; उसे संविधान की कसौटी पर खरा उतरना होगा।
परीक्षा में संविधान की प्रकृति पूछी जाए तो सर्वोच्चता, संसदीय उत्तरदायित्व, संघीय शक्ति-विभाजन, स्वतंत्र न्यायपालिका, न्यायिक समीक्षा और कल्याणकारी लक्ष्य को एक साथ जोड़ें।
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मॉडल उत्तर
संविधान सर्वोच्च कानून है क्योंकि वही संस्थाएँ बनाता, शक्तियाँ बांटता और सरकारी अधिकार की सीमा तय करता है। साधारण भर्ती नियम समानता या किसी दूसरे संवैधानिक अधिकार से ऊपर नहीं हो सकता। राजस्थान का विभाग नियम बनाए और लागू करे, दोनों समय संविधान की सीमा मानेगा; केवल सरकारी आदेश होना वैधता का प्रमाण नहीं है।
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