मुख्य तथ्य

  • राजस्थान सीईटी (10+2 स्तर) के सिलेबस में जलवायु दशाएँ, प्राकृतिक वनस्पति, प्रमुख मिट्टियाँ, वन संसाधन, वन्यजीव, अभयारण्य और संरक्षण एक-दूसरे से जुड़े...
  • राजस्थान उष्णकटिबंधीय से उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में है, पर राज्य के भीतर शुष्क पश्चिम, अर्ध-शुष्क बीच का भाग और अपेक्षाकृत नम पूर्वी, दक्षिणी व दक्षिण...
  • मुख्य वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है; पश्चिमी विक्षोभ से सर्दियों में मावठ हो सकती है, जो गेहूँ, चना और सरसों के लिए उपयोगी रहती है।
  • पश्चिम से पूर्व की ओर नमी बढ़ने की सामान्य प्रवृत्ति है, लेकिन यह जिलों के बीच खिंची तय सीमा नहीं है; स्थलरूप, निकास और सिंचाई स्थानीय दशा बदलते हैं।
  • पश्चिमी राजस्थान में रेतीली मिट्टी, कंटीली झाड़ियाँ, पवन अपरदन और सूखी खेती-पशुपालन प्रमुख हैं;

मुख्य बिंदु

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    राजस्थान सीईटी (10+2 स्तर) के सिलेबस में जलवायु दशाएँ, प्राकृतिक वनस्पति, प्रमुख मिट्टियाँ, वन संसाधन, वन्यजीव, अभयारण्य और संरक्षण एक-दूसरे से जुड़े विषय हैं।

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    राजस्थान उष्णकटिबंधीय से उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में है, पर राज्य के भीतर शुष्क पश्चिम, अर्ध-शुष्क बीच का भाग और अपेक्षाकृत नम पूर्वी, दक्षिणी व दक्षिण-पूर्वी इलाके मिलते हैं।

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    मुख्य वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है; पश्चिमी विक्षोभ से सर्दियों में मावठ हो सकती है, जो गेहूँ, चना और सरसों के लिए उपयोगी रहती है।

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    पश्चिम से पूर्व की ओर नमी बढ़ने की सामान्य प्रवृत्ति है, लेकिन यह जिलों के बीच खिंची तय सीमा नहीं है; स्थलरूप, निकास और सिंचाई स्थानीय दशा बदलते हैं।

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    पश्चिमी राजस्थान में रेतीली मिट्टी, कंटीली झाड़ियाँ, पवन अपरदन और सूखी खेती-पशुपालन प्रमुख हैं; हाड़ौती में काली मिट्टी, अधिक नमी और सोयाबीन-गेहूँ का मेल मिलता है।

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    पूर्वी मैदानों में जलोढ़ मिट्टी, दक्षिणी-अरावली भागों में लाल-पीली व पहाड़ी मिट्टी और कोटा, बूंदी, बारां व झालावाड़ में काली मिट्टी का संबंध याद रखें।

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    वन और वन्यजीव पढ़ते समय घने जंगल के साथ खुले झाड़ीदार इलाके, घासभूमि, आर्द्रभूमि, ओरण और अलग-अलग आवासों के बीच संपर्क भी शामिल करें।

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    डेजर्ट नेशनल पार्क को थार और गोडावण से, ताल छापर को घासभूमि और कृष्णमृग से तथा केवलादेव को नियंत्रित जल वाली आर्द्रभूमि और प्रवासी जलपक्षियों से जोड़ें।

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    उपाय को समस्या से मिलाएँ: पवन अपरदन में शेल्टरबेल्ट, ढाल पर बहाव रोकने के लिए समोच्च काम, बीहड़ों में अवनालिका रोकने के उपाय और जलभराव या लवणता में निकास।

सिलेबस का दायरा और जलवायु की बुनियाद

राजस्थान सीईटी (10+2 स्तर) के राजस्थान भूगोल वाले हिस्से में जलवायु दशाएँ, प्राकृतिक वनस्पति, प्रमुख मिट्टियाँ, वन संसाधन, वन्यजीव, अभयारण्य और संरक्षण साफ़ तौर पर शामिल हैं। इसलिए इन बातों को अलग-अलग सूची की तरह नहीं, एक जुड़ी व्यवस्था की तरह समझिए। स्थलरूप और वर्षा लाने वाली हवाएँ नमी को प्रभावित करती हैं। नमी से मिट्टी बनने की प्रक्रिया और पेड़-पौधों का फैलाव बदलता है। आगे यही मिट्टी और वनस्पति खेती, कटाव तथा वन्यजीवों के आवास पर असर डालते हैं। भारत-भर की फ़सलों, खनिजों या उद्योगों में फैलना इस पाठ का उद्देश्य नहीं है।

राजस्थान उष्णकटिबंधीय से उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र में आता है, फिर भी पूरे राज्य को एक ही जलवायु नाम से समझना सही नहीं होगा। थार और उससे लगे पश्चिमी मैदान शुष्क या अर्ध-शुष्क हैं। पूर्वी मैदान, अरावली की पहाड़ियाँ, दक्षिणी जनजातीय पट्टी और दक्षिण-पूर्वी पठार अलग-अलग मात्रा में अधिक नमी पाते हैं। जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और पश्चिमी चूरू सूखे पश्चिम को समझाते हैं। जयपुर, अजमेर और अलवर बीच की अर्ध-शुष्क दशा दिखाते हैं। बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, झालावाड़ और माउंट आबू अपेक्षाकृत नम भागों के उदाहरण हैं। ये सामान्य क्षेत्रीय संबंध हैं, जिलों के बीच खिंची तय सीमाएँ नहीं; एक ही जिले में ढाल, निकास और सिंचाई के कारण फर्क मिल सकता है।

अरावली की दिशा मोटे तौर पर दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व है। दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा पश्चिमी राजस्थान में कई बार इसके लगभग समानांतर बढ़ती है, इसलिए बड़े इलाके में पहाड़ से टकराकर तेज़ उठाव और भरपूर वर्षा नहीं बनती। समुद्र से दूरी, गर्मियों की तेज़ गर्मी, अधिक वाष्पीकरण और अनिश्चित बारिश भी सूखापन बढ़ाते हैं। पूर्व, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व की ओर मानसूनी नमी और अनुकूल ऊँचाई मिलने से दशाएँ बदलती हैं। उत्तर लिखते समय कई कारण जोड़ें; अरावली हर बादल को रोकती है, ऐसा कथन न करें।

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मॉडल उत्तर

पश्चिमी भाग समुद्र के प्रभाव से दूर है, गर्मियों में ताप और वाष्पीकरण अधिक रहते हैं तथा मानसूनी हवा से हर जगह पर्याप्त उठाव और वर्षा नहीं बनती। अरब सागर शाखा कई बार अरावली के लगभग समानांतर बढ़ती है। इसलिए उत्तर में कई कारण जोड़ने चाहिए; यह कहना गलत होगा कि अरावली हर बादल को रोक देती है।

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