राजस्थान का जल-अपवाह: नदियाँ, बाँध और झीलें
मुख्य तथ्य
- राजस्थान सीईटी (10+2 स्तर) पाठ्यक्रम में यह विषय राजस्थान भूगोल के अंदर नदियाँ, बाँध और झीलें वाली सीमा में आता है;
- भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान 1985 में UNESCO विश्व धरोहर स्थल बना और राजस्थान में आर्द्रभूमि तथा पक्षी-आवास का बड़ा संदर्भ है।
- सांभर झील 23 मार्च 1990 को रामसर स्थल बनी और उसका आधिकारिक रामसर क्षेत्र 24,000 हेक्टेयर है।
मुख्य बिंदु
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राजस्थान सीईटी (10+2 स्तर) पाठ्यक्रम में यह विषय राजस्थान भूगोल के अंदर नदियाँ, बाँध और झीलें वाली सीमा में आता है; इसलिए पाठ राजस्थान के जल-अपवाह पर केंद्रित है, भारत-भर की नदी सूची पर नहीं।
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अरावली पहाड़ियाँ राजस्थान की मुख्य जलविभाजक रेखा बनाती हैं: पूर्व और उत्तर-पूर्व का अपवाह यमुना-गंगा जलग्रहण क्षेत्र से जुड़ता है, जबकि माही और साबरमती दक्षिण-पश्चिमी अपवाह को समझाती हैं।
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बनास राजसमंद जिले में कुंभलगढ़ के पास खमनोर पहाड़ियों से निकलती है, पूरी तरह राजस्थान में बहती है और सवाई माधोपुर जिले में रामेश्वर के पास चंबल से मिलती है।
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लूनी बेसिन अरावली के पश्चिम में है; लूनी अजमेर के पास से निकलकर पश्चिमी राजस्थान से कच्छ के रण की दिशा में बहती है।
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माही नदी बेसिन बाँसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और उदयपुर जिलों के हिस्सों में फैला है, इसलिए दक्षिणी राजस्थान की नदियों को समझने में माही सबसे महत्त्वपूर्ण है।
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केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान और सांभर झील राजस्थान के लंबे समय से मान्य रामसर स्थल हैं; राज्य की पूरी मौजूदा सूची के लिए नवीनतम आधिकारिक सूची देखें।
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भरतपुर का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान 1985 में UNESCO विश्व धरोहर स्थल बना और राजस्थान में आर्द्रभूमि तथा पक्षी-आवास का बड़ा संदर्भ है।
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सांभर झील 23 मार्च 1990 को रामसर स्थल बनी और उसका आधिकारिक रामसर क्षेत्र 24,000 हेक्टेयर है।
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जयसमंद, जिसे ढेबर झील भी कहा जाता है, उदयपुर के पास गोमती नदी पर बने बाँध से जुड़ी है; राजसमंद झील महाराणा राज सिंह प्रथम और गोमती, केलवा, ताली नदी-तंत्र से जुड़ी है।
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सीईटी के मिलान वाले प्रश्नों में हर जल-निकाय को प्रकार और जिले से जोड़ें: सांभर-खारी झील, केवलादेव-भरतपुर आर्द्रभूमि, जयसमंद-उदयपुर कृत्रिम झील, राजसमंद-राजसमंद ऐतिहासिक झील और सिलीसेढ़-अलवर झील।
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अपवाह की मूल रचना और अरावली की भूमिका
राजस्थान का अपवाह अरावली जलविभाजक से समझना सबसे आसान है। अरावली पहाड़ियाँ राज्य की मुख्य जलविभाजक रेखा बनाती हैं, इसलिए परीक्षा में पहला सवाल यह होना चाहिए कि नदी इस रेखा के किस ओर की है। पूर्व और उत्तर-पूर्व की नदियाँ सामान्यतः यमुना-गंगा जलग्रहण क्षेत्र से जुड़ती हैं। दक्षिण-पश्चिम राजस्थान में माही और साबरमती के जलग्रहण क्षेत्र आते हैं, जबकि पश्चिमी राजस्थान के बड़े हिस्से में आंतरिक अपवाह है, जहाँ मौसमी धाराएँ रेत या बंद बेसिन में खो जाती हैं।
राजस्थान सीईटी (10+2 स्तर) के लिए ढाँचा व्यावहारिक रखें। चंबल, बनास, काली सिंध, पार्वती, गंभीर, मेज और बाणगंगा पूर्वी अपवाह मानचित्र समझाती हैं। माही, साबरमती और पश्चिमी बनास दक्षिणी तथा दक्षिण-पश्चिमी किनारे को समझाती हैं। लूनी पश्चिमी अरावली पक्ष को बताती है। घग्घर, कांतली और मरुस्थलीय बेसिन आंतरिक अपवाह समझाते हैं, जबकि साबी-सोता और रूपारेल उत्तर-पूर्वी क्षेत्रीय तंत्र हैं। झीलें भी इसी तर्क से जुड़ती हैं: सांभर, डीडवाना, पचपदरा और लूणकरणसर खारे या बंद-बेसिन भू-दृश्यों से जुड़ी हैं।
मुख्य तरीका: पहले अपवाह की दिशा पहचानें, फिर नदी, जिला, बाँध या झील जोड़ें। यह तरीका पाठ को राजस्थान सीईटी (10+2 स्तर) के राजस्थान की नदियाँ, बाँध और झीलें वाले पाठ्यक्रम पर केंद्रित रखता है।
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मॉडल उत्तर
अरावली राज्य की मुख्य जलविभाजक रेखा बनाती है। इसके पूर्व और उत्तर-पूर्व की नदियाँ आमतौर पर यमुना-गंगा जलग्रहण क्षेत्र से जुड़ती हैं, जबकि पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी ढाल आंतरिक बेसिन, लूनी या माही-साबरमती जैसे अरब सागर पक्ष के तंत्रों की ओर जाती हैं। इसलिए एक ही स्थलरूप से प्रवाह-दिशा, बेसिन और अंतिम निकास समझे जा सकते हैं।
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