राजस्थान में जनजातीय, किसान और प्रजामंडल आंदोलन
मुख्य तथ्य
- 17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर ब्रिटिश और रियासती बलों की गोलीबारी हुई; गोविन्द गुरु से जुड़ा यह प्रसंग भील प्रतिरोध की केंद्रीय स्मृति बन गया।
- 1897 में बिजोलिया किसान आंदोलन मेवाड़ के बिजोलिया ठिकाने में शुरू हुआ; यह राजस्थान का सबसे लंबा और सबसे चर्चित किसान आंदोलन माना जाता है।
- 1916 में विजय सिंह पथिक के आने से बिजोलिया आंदोलन स्थानीय शिकायत से संगठित किसान संघर्ष बना; अवैध लाग-बाग और बेगार इसके प्रमुख मुद्दे थे।
- 1921-22 में मोतीलाल तेजावत ने एकी आंदोलन को भील, गरासिया और आसपास के जनजातीय समाज में फैलाया; इसकी मांगें लगान, बेगार और वन-अधिकार से जुड़ी थीं।
- 1923 में बेगूँ क्षेत्र के गोविंदपुरा गोलीकांड ने आंदोलन को व्यापक पहचान दी; रूपाजी और कृपाजी इससे जुड़े किसान शहीदों के रूप में याद किए जाते हैं।
मुख्य बिंदु
- 1
गोविन्द गुरु ने सम्प सभा के माध्यम से भील समाज में सुधार और संगठन का काम आगे बढ़ाया; इसी धारा ने मानगढ़ को जनजातीय जागरण का बड़ा केंद्र बनाया।
- 2
17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर ब्रिटिश और रियासती बलों की गोलीबारी हुई; गोविन्द गुरु से जुड़ा यह प्रसंग भील प्रतिरोध की केंद्रीय स्मृति बन गया।
- 3
1897 में बिजोलिया किसान आंदोलन मेवाड़ के बिजोलिया ठिकाने में शुरू हुआ; यह राजस्थान का सबसे लंबा और सबसे चर्चित किसान आंदोलन माना जाता है।
- 4
1916 में विजय सिंह पथिक के आने से बिजोलिया आंदोलन स्थानीय शिकायत से संगठित किसान संघर्ष बना; अवैध लाग-बाग और बेगार इसके प्रमुख मुद्दे थे।
- 5
1921-22 में मोतीलाल तेजावत ने एकी आंदोलन को भील, गरासिया और आसपास के जनजातीय समाज में फैलाया; इसकी मांगें लगान, बेगार और वन-अधिकार से जुड़ी थीं।
- 6
1923 में बेगूँ क्षेत्र के गोविंदपुरा गोलीकांड ने आंदोलन को व्यापक पहचान दी; रूपाजी और कृपाजी इससे जुड़े किसान शहीदों के रूप में याद किए जाते हैं।
- 7
1931 में जयपुर प्रजामंडल राजपूताना के आरंभिक प्रजामंडल संगठनों में उभरा और नागरिक अधिकारों तथा उत्तरदायी शासन की मांग से जुड़ा।
- 8
1927 में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् ने देशी रियासतों में उत्तरदायी शासन की मांग को व्यापक मंच दिया।
आगे पढ़ें
राजपूताना में आंदोलनों की पृष्ठभूमि
आधुनिक राजस्थान का बड़ा भाग 1947 से पहले राजपूताना की रियासतों में बंटा था। यहां ब्रिटिश भारत जैसा प्रत्यक्ष औपनिवेशिक प्रशासन हर जगह नहीं था, पर ब्रिटिश सर्वोच्चता और रियासती शासन मिलकर जनता पर नियंत्रण रखते थे। जागीरदार, ठिकानेदार और रियासती अधिकारी लगान, लाग-बाग, बेगार और सामाजिक नियंत्रण के जरिए ग्रामीण समाज पर दबाव डालते थे। इसलिए राजस्थान में प्रतिरोध केवल अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं था; वह सामंती शोषण, रियासती निरंकुशता और जन-अधिकारों की कमी के विरुद्ध भी था।
CET वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर इस विषय को तीन धाराओं में समझना उपयोगी है। पहली धारा जनजातीय आंदोलनों की है, जिसमें भील, गरासिया और मीणा जैसे समुदायों की समस्याएं सामने आती हैं। दूसरी धारा किसान आंदोलनों की है, जहां बिजोलिया, बेगूँ और शेखावाटी जैसे क्षेत्र लगान तथा बेगार के विरुद्ध खड़े हुए। तीसरी धारा प्रजामंडल आंदोलन की है, जिसने रियासतों में उत्तरदायी शासन, नागरिक स्वतंत्रता और प्रतिनिधि संस्थाओं की मांग उठाई।
मुख्य बात यह है कि ये तीनों धाराएं अलग होते हुए भी जुड़ी थीं: आर्थिक शोषण ने किसान और जनजातीय असंतोष पैदा किया, और उसी असंतोष को प्रजामंडलों ने राजनीतिक भाषा दी।
पूरा नोट खोलें
यह सार्वजनिक पृष्ठ पहला उपलब्ध खंड दिखाता है। स्टडी पैक पूरा विषय और सभी पुनरावलोकन सामग्री खोलता है।
7 और खंड पूरे नोट में हैं
स्टडी पैक खोलें