राजस्थान के दुर्ग, महल, बावड़ियाँ और मंदिर स्थापत्य
मुख्य तथ्य
- 1156 में रावल जैसल ने जैसलमेर की स्थापना की; पीले बलुआ पत्थर का यह मरुस्थलीय दुर्ग अपनी दीवारों के भीतर बसी आबादी के कारण आबाद दुर्ग के रूप में जाना ज...
- 1459 में राव जोधा ने जोधपुर बसाया और मेहरानगढ़ दुर्ग की शुरुआत की; इससे राठौड़ सत्ता मण्डोर से अधिक सुरक्षित चट्टानी राजधानी की ओर गई।
- 1588 में बीकानेर का जूनागढ़ दुर्ग राजा राय सिंह द्वारा निर्मित हुआ; यह बताता है कि राजस्थान में पहाड़ी दुर्गों के साथ समतल दुर्ग भी महत्त्वपूर्ण हैं।
- 1592 में राजा मान सिंह प्रथम ने आमेर महल-दुर्ग का निर्माण शुरू कराया; माओटा झील, दीवान-ए-आम, आंगन, परकोटे और शीश महल इसकी पहचान हैं।
- 1699 में रानी नाथावती जी ने बूंदी की रानीजी की बावड़ी बनवाई; यह सूखे समय में पानी तक पहुँच, गहरी सीढ़ीदार रचना और राजकीय संरक्षण से जुड़ी है।
मुख्य बिंदु
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1156 में रावल जैसल ने जैसलमेर की स्थापना की; पीले बलुआ पत्थर का यह मरुस्थलीय दुर्ग अपनी दीवारों के भीतर बसी आबादी के कारण आबाद दुर्ग के रूप में जाना जाता है।
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1459 में राव जोधा ने जोधपुर बसाया और मेहरानगढ़ दुर्ग की शुरुआत की; इससे राठौड़ सत्ता मण्डोर से अधिक सुरक्षित चट्टानी राजधानी की ओर गई।
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1588 में बीकानेर का जूनागढ़ दुर्ग राजा राय सिंह द्वारा निर्मित हुआ; यह बताता है कि राजस्थान में पहाड़ी दुर्गों के साथ समतल दुर्ग भी महत्त्वपूर्ण हैं।
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1592 में राजा मान सिंह प्रथम ने आमेर महल-दुर्ग का निर्माण शुरू कराया; माओटा झील, दीवान-ए-आम, आंगन, परकोटे और शीश महल इसकी पहचान हैं।
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1699 में रानी नाथावती जी ने बूंदी की रानीजी की बावड़ी बनवाई; यह सूखे समय में पानी तक पहुँच, गहरी सीढ़ीदार रचना और राजकीय संरक्षण से जुड़ी है।
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1727 में सवाई जय सिंह द्वितीय ने जयपुर की स्थापना की; ग्रिड योजना, परकोटा, द्वार, बाज़ार, चौपड़ और राजमहल क्षेत्र इसकी नगरीय विरासत की प्रमुख पहचान हैं।
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1799 में महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने जयपुर का हवामहल बनवाया; लाल चंद उस्ताद से जुड़ा इसका अनेक-खिड़की वाला अग्रभाग हवा, गोपनीयता और जुलूस-दर्शन के काम आया।
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2010 में UNESCO ने जयपुर के जंतर मंतर को विश्व धरोहर में शामिल किया; राजस्थान पर्यटन इसे सवाई जय सिंह द्वितीय की वेधशाला बताता है, जो 1734 में पूरी हुई।
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2013 में UNESCO ने राजस्थान के 6 पहाड़ी दुर्ग विश्व धरोहर में शामिल किए: चित्तौड़गढ़, कुम्भलगढ़, रणथम्भौर, गागरोन, आमेर और जैसलमेर।
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2019 में UNESCO ने जयपुर शहर को विश्व धरोहर में शामिल किया; 1727 की स्थापना, ग्रिड योजना, चौपड़, बाज़ार, द्वार और राजमहल-केंद्रित शहरी रूप इसके मुख्य संकेत हैं।
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स्थापत्य को समझने का आधार
राजस्थान के दुर्ग, महल, बावड़ियाँ, हवेलियाँ और मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक सीईटी के इसी पाठ्यक्रम-बिंदु में आते हैं: राजस्थान की कला और संस्कृति - स्थापत्य और चित्रकला। परीक्षा के लिए हर छोटे स्मारक की सूची रटना ज़रूरी नहीं है। मुख्य तरीका यह है कि स्थल, संरक्षक या शासक-घराना, सामग्री, विशेषता और उपयोग को साथ पढ़ें। दुर्ग रक्षा, मार्ग-नियंत्रण, शरण और राजसत्ता दिखाते हैं। महल दरबार, प्रशासन, उत्सव और कलात्मक रुचि बताते हैं। बावड़ियाँ सूखे क्षेत्र में पानी तक पहुँच का उपाय हैं। मंदिर धर्म, मूर्तिकला, संरक्षकों की भूमिका और बस्ती-इतिहास से जुड़ते हैं।
एक ही स्थल की कई पहचान हो सकती हैं। आमेर दुर्ग भी है और महल-परिसर भी। चित्तौड़गढ़ में परकोटा, महल, मंदिर, जलाशय और विजय-स्मारक साथ मिलते हैं। जयपुर महल-स्थापत्य को नगरीय योजना से जोड़ता है। बूंदी दुर्ग, महल-चित्रकला और बावड़ियों से जुड़ती है। जैसलमेर मरुस्थलीय रक्षा, बलुआ पत्थर, हवेलियों और आबाद दुर्ग की पहचान दिखाता है। इस तरह पढ़ने से विषय केवल नामों की लंबी सूची नहीं रह जाता।
मुख्य बात: हर स्मारक को क्षेत्र, शासक या संरक्षक, सामग्री और उद्देश्य से जोड़कर दोहराएँ।
दूसरा उपयोगी तरीका बनावट और काम में फ़र्क करना है। परकोटा, द्वार, बुर्ज, आंगन, जलाशय, देवस्थान और दरबार-कक्ष भौतिक हिस्से हैं; रक्षा, पूजा, निवास, व्यापार, समारोह और पानी की व्यवस्था उनके काम हैं। एक ही हिस्सा कई काम कर सकता है। आंगन आवाजाही को व्यवस्थित करने के साथ रोशनी देता और समारोह की जगह बनता है। जलाशय सैनिकों के साथ निवासियों, पशुओं और धार्मिक ज़रूरतों के काम भी आता है। इसलिए दुर्ग के भीतर बनी हर इमारत को केवल रक्षा से जोड़ना ठीक नहीं है।
संरक्षकों की भूमिका को भी सावधानी से समझें। कोई शासक नगर बसा सकता है या परिसर का निर्माण शुरू करा सकता है, लेकिन बाद के शासक उसमें द्वार, महल, बाग या चित्रित कक्ष जोड़ सकते हैं। उत्तर में उसी संरक्षक का नाम लिखें जिसका संबंध पक्का हो; पूरे वर्तमान परिसर को एक ही व्यक्ति की रचना न मानें। स्थापत्य कई चरणों में बनता है और मरम्मत, दोबारा उपयोग तथा बाद में किए गए जोड़ भी उसके इतिहास का हिस्सा हैं। रिवीजन के लिए चार बातें साथ रखें: स्थान, रूप, काम और पक्का ऐतिहासिक संबंध।
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मॉडल उत्तर
दुर्ग के भीतर महल, मंदिर, बस्ती, व्यापारिक स्थान, जल-संग्रह की रचनाएँ और सैनिक चौकियाँ हो सकती थीं। भू-आकृति, द्वार, दीवार, जलाशय और अंदर के भवन मिलकर सत्ता तथा रोज़मर्रा का जीवन चलाते थे। इसलिए उत्तर में रक्षा के साथ निवास, पूजा, प्रशासन, व्यापार और पानी की व्यवस्था जोड़नी चाहिए; हर भवन को सैनिक उपयोग का नहीं मानना चाहिए।
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