मुख्य तथ्य

  • बागोर भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के किनारे स्थित राजस्थान का महत्त्वपूर्ण मध्यपाषाण और सूक्ष्म-पाषाण स्थल है;
  • आहड़-बनास संस्कृति दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की ताम्रपाषाण ग्राम-संस्कृति थी;
  • आहड़, उदयपुर के पास धूलकोट टीले से जुड़ा, आहड़-बनास संस्कृति का प्रकार-स्थल है;
  • बालाथल उदयपुर जिले का आहड़-बनास स्थल है; दुर्गीकृत ताम्रपाषाण बस्ती, घरेलू संरचनाएँ, मृद्भांड और ग्राम-जीवन के प्रमाण इसके मुख्य बिंदु हैं।
  • गणेश्वर सीकर-नीम का थाना क्षेत्र में खेतड़ी ताँबा-पट्टी के निकट ताम्रयुगीन अवशेषों से जुड़ता है;

मुख्य बिंदु

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    बागोर भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के किनारे स्थित राजस्थान का महत्त्वपूर्ण मध्यपाषाण और सूक्ष्म-पाषाण स्थल है; इसे शिकार-संग्रह जीवन से पशुपालन की ओर बढ़ते समाज के संकेतों के लिए पढ़ें।

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    आहड़-बनास संस्कृति दक्षिण-पूर्वी राजस्थान की ताम्रपाषाण ग्राम-संस्कृति थी; बनास-बेड़च-आहड़ नदी क्षेत्र, काला-लाल मृद्भांड, पत्थर-ताँबा तकनीक और कृषि-पशुपालन इसकी मुख्य पहचान हैं।

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    आहड़, उदयपुर के पास धूलकोट टीले से जुड़ा, आहड़-बनास संस्कृति का प्रकार-स्थल है; काला-लाल मृद्भांड, ताँबे का प्रयोग और ग्राम-बसाहट इसके परीक्षा-योग्य संकेत हैं।

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    बालाथल उदयपुर जिले का आहड़-बनास स्थल है; दुर्गीकृत ताम्रपाषाण बस्ती, घरेलू संरचनाएँ, मृद्भांड और ग्राम-जीवन के प्रमाण इसके मुख्य बिंदु हैं।

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    गणेश्वर सीकर-नीम का थाना क्षेत्र में खेतड़ी ताँबा-पट्टी के निकट ताम्रयुगीन अवशेषों से जुड़ता है; सरकारी पर्यटन स्रोत यहाँ ताँबे की अनेक वस्तुओं और मिट्टी के बर्तनों का उल्लेख करता है।

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    कालीबंगा हनुमानगढ़ जिले में घग्घर नदी-क्षेत्र का प्रमुख हड़प्पाई स्थल है; जुता खेत, अग्नि-वेदियाँ, दुर्गीकरण और नगर-योजना इसकी सबसे मजबूत पहचान हैं।

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    बैराठ या विराटनगर जयपुर जिले का आरंभिक ऐतिहासिक स्थल है; मत्स्य परंपरा, अशोक के अभिलेख और बौद्ध अवशेष इसके मुख्य संकेत हैं।

प्रागैतिहासिक राजस्थान को पढ़ने का तरीका

राजस्थान का इतिहास राजवंशों से बहुत पहले शुरू होता है। CET वरिष्ठ माध्यमिक 2026 के पाठ्यक्रम में यह विषय राजस्थान का इतिहास के अंतर्गत "प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्त्विक स्थल" के रूप में आता है। इसलिए यहाँ ध्यान राजस्थान के स्थलों, उनके काल, भूगोल और परीक्षा-पहचान पर रहना चाहिए, पूरे भारत के प्राचीन इतिहास पर नहीं। पुरापाषाण औजार, मध्यपाषाण शिविर, ताम्रपाषाण गाँव, हड़प्पाई संपर्क और फिर जनपद-मौर्यकालीन केंद्र मिलकर प्राचीन राजस्थान की आधार-रेखा बनाते हैं।

मध्यपाषाण चरण में छोटे सूक्ष्म-पाषाण और स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग दिखाई देता है। बागोर, भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के किनारे, इस चरण का सबसे उपयोगी राजस्थान उदाहरण है। ताम्रपाषाण काल में पत्थर और ताँबा साथ-साथ चलते हैं; लोग गाँव बसाते हैं, मृद्भांड बनाते हैं, खेती और पशुपालन करते हैं। आहड़-बनास और गणेश्वर-जोधपुरा इसी पृष्ठभूमि में पढ़े जाते हैं। हड़प्पाई चरण के लिए कालीबंगा सबसे मजबूत राजस्थान स्थल है, जबकि बैराठ जैसे स्थल आरंभिक ऐतिहासिक चरण में अभिलेख, बौद्ध अवशेष और राजनीतिक परंपरा से जुड़ते हैं।

मुख्य बात यह है: स्थल का नाम अकेला याद न करें, उसके साथ एक भू-संकेत और एक पुरातात्त्विक पहचान जरूर जोड़ें।

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