राजस्थान में कृषि, उद्यानिकी, वानिकी और पशुपालन: पौधों और पशुओं का आर्थिक महत्व
मुख्य तथ्य
- कृषि एक अनुप्रयुक्त विज्ञान है, क्योंकि इसमें मिट्टी, बीज, सिंचाई, खाद, उर्वरक, फसल सुरक्षा, मशीन और जलवायु का ज्ञान साथ काम करता है।
- राजस्थान में खेती को शुष्क और अर्द्ध-शुष्क स्थितियों से जोड़कर समझना चाहिए: कम वर्षा, अनिश्चित मानसून, अधिक वाष्पीकरण और पानी की कमी।
- बाजरा, दलहन और तिलहन सूखी खेती में महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनमें से कई फसलें कम नमी में भी अपेक्षाकृत बेहतर टिकती हैं।
- नहर और अन्य सिंचाई साधन कुछ क्षेत्रों में खेती को अधिक भरोसेमंद बनाते हैं, पर पूरे राज्य में जल-संरक्षण और सूखा-तैयारी की जरूरत बनी रहती है।
- उद्यानिकी में फल, सब्जियां, मसाले, औषधीय पौधे, सुगंधित पौधे और संरक्षित खेती आते हैं; इससे पोषण, आय और मूल्यवर्धन बढ़ता है।
मुख्य बिंदु
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कृषि एक अनुप्रयुक्त विज्ञान है, क्योंकि इसमें मिट्टी, बीज, सिंचाई, खाद, उर्वरक, फसल सुरक्षा, मशीन और जलवायु का ज्ञान साथ काम करता है।
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राजस्थान में खेती को शुष्क और अर्द्ध-शुष्क स्थितियों से जोड़कर समझना चाहिए: कम वर्षा, अनिश्चित मानसून, अधिक वाष्पीकरण और पानी की कमी।
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बाजरा, दलहन और तिलहन सूखी खेती में महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इनमें से कई फसलें कम नमी में भी अपेक्षाकृत बेहतर टिकती हैं।
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नहर और अन्य सिंचाई साधन कुछ क्षेत्रों में खेती को अधिक भरोसेमंद बनाते हैं, पर पूरे राज्य में जल-संरक्षण और सूखा-तैयारी की जरूरत बनी रहती है।
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उद्यानिकी में फल, सब्जियां, मसाले, औषधीय पौधे, सुगंधित पौधे और संरक्षित खेती आते हैं; इससे पोषण, आय और मूल्यवर्धन बढ़ता है।
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वानिकी लकड़ी और गैर-लकड़ी उत्पाद देती है, साथ ही जैव-विविधता, मिट्टी-पानी संरक्षण और मरुस्थलीकरण नियंत्रण में बड़ी भूमिका निभाती है।
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पशुपालन में गाय, भैंस, भेड़, बकरी, ऊंट और मुर्गीपालन शामिल हैं; इससे दूध, ऊन, मांस, अंडे, खाद, श्रम, परिवहन और ग्रामीण आय मिलती है।
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कृषि एक अनुप्रयुक्त विज्ञान
कृषि केवल खेत में बीज डालने का काम नहीं है। यह एक अनुप्रयुक्त विज्ञान है, जिसमें पौधे, मिट्टी, पानी, मौसम, औजार, पशु और बाजार की समझ जुड़ी होती है। इसका उद्देश्य भोजन, रेशा, चारा, ईंधन, कच्चा माल और आय पैदा करना है, लेकिन ऐसा करते समय मिट्टी और पानी को लंबे समय तक उपयोगी रखना भी जरूरी है। CET में इस अध्याय से सामान्यतः यही पूछा जाता है कि खेती में विज्ञान का उपयोग कैसे होता है।
कृषि की पहली नींव मिट्टी है। मिट्टी की बनावट, उर्वरता, जैविक पदार्थ, जल-धारण क्षमता, लवणता और जल-निकास को समझे बिना सही फसल और सही खाद तय नहीं हो सकती। रेतीली मिट्टी पानी जल्दी छोड़ती है, चिकनी मिट्टी पानी रोकती है पर निकास धीमा हो सकता है, और दोमट मिट्टी सामान्यतः संतुलित मानी जाती है। मिट्टी परीक्षण से पता चलता है कि खेत को नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, सूक्ष्म पोषक तत्व, गोबर की खाद, कम्पोस्ट या किसी सुधार की जरूरत है।
बीज दूसरा बड़ा आधार है। अच्छा बीज शुद्ध, जीवित, स्वस्थ और स्थानीय जलवायु के अनुकूल होना चाहिए। उन्नत किस्में अधिक उत्पादन, रोग-सहिष्णुता, सूखा-सहिष्णुता, जल्दी पकने या बेहतर गुणवत्ता में मदद कर सकती हैं। सूखे क्षेत्र में जल्दी पकने वाली और कम पानी में टिकने वाली किस्म कई बार बहुत ऊंचे उत्पादन वाली पर अधिक पानी मांगने वाली किस्म से बेहतर होती है।
सिंचाई तब जरूरी होती है जब वर्षा कम हो या समय पर न हो। कुएं, टांके, तालाब, नहर, नलकूप, फव्वारा और बूंद-बूंद सिंचाई अलग-अलग स्थितियों में काम आते हैं। कुशल सिंचाई का अर्थ है सही समय पर सही मात्रा में पानी देना। फसल सुरक्षा में खरपतवार, कीट, रोग, चूहे और पक्षियों से बचाव आता है। समेकित कीट प्रबंधन में प्रतिरोधी किस्म, फसल चक्र, खेत की सफाई, जैविक नियंत्रण, यांत्रिक उपाय और जरूरत पड़ने पर रसायन का सावधान उपयोग शामिल है।
यंत्रीकरण का अर्थ है औजारों और मशीनों से काम को समय पर, कम श्रम और अधिक दक्षता से करना। बीज ड्रिल, पंप, स्प्रेयर, थ्रेशर, ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और छोटे कृषि औजार इसके उदाहरण हैं। छोटी जोतों में बड़ी मशीन खरीदना हमेशा व्यावहारिक नहीं होता, इसलिए किराये पर मशीन सेवा भी उपयोगी हो सकती है। जलवायु उपयुक्तता का अर्थ है फसल को तापमान, वर्षा, पाला, लू, हवा और बढ़वार अवधि के अनुसार चुनना।
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