राजस्थान की सिंचाई परियोजनाएँ और इंदिरा गांधी नहर
मुख्य तथ्य
- आरएसएसबी सीईटी स्नातक 2026 में यह विषय राजस्थान की अर्थव्यवस्था के अंतर्गत आता है: सिंचाई और नदी-घाटी परियोजनाएँ, बंजर भूमि तथा सूखा-प्रवण क्षेत्र विक...
- राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2025-26 में 2024-25 का कुल शुद्ध सिंचित क्षेत्र 99,27,680 हेक्टेयर और प्रमुख, मध्यम तथा लघु परियोजनाओं से बनी सिंचाई सुविधा 40...
- इंदिरा गांधी नहर प्रणाली हरिके बैराज से शुरू होती है; आधिकारिक लंबाई विभाजन 204 किमी फीडर और 445 किमी मुख्य नहर है, इसलिए 649 किमी पूरी प्रणाली की लंब...
- इंदिरा गांधी नहर परियोजना में 16.17 लाख हेक्टेयर सीसीए में सिंचाई सुविधा दी गई है, जबकि चौधरी कुंभाराम आर्य लिफ्ट योजना के अंतर्गत अतिरिक्त 0.10 लाख ह...
- राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2025-26 में एकीकृत संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल/ईआरसीपी ढाँचा 17 जिलों में पेयजल उपलब्धता, 2.51 लाख हेक्टेयर नए सिंचाई क्षेत्...
मुख्य बिंदु
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आरएसएसबी सीईटी स्नातक 2026 में यह विषय राजस्थान की अर्थव्यवस्था के अंतर्गत आता है: सिंचाई और नदी-घाटी परियोजनाएँ, बंजर भूमि तथा सूखा-प्रवण क्षेत्र विकास परियोजनाएँ।
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राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2025-26 में 2024-25 का कुल शुद्ध सिंचित क्षेत्र 99,27,680 हेक्टेयर और प्रमुख, मध्यम तथा लघु परियोजनाओं से बनी सिंचाई सुविधा 40.19 लाख हेक्टेयर दर्ज है।
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इसी समीक्षा में राजस्थान की प्रमुख सिंचाई परियोजनाओं में इंदिरा गांधी नहर, माही, नर्मदा नहर, बीसलपुर और चंबल कमांड क्षेत्र का उल्लेख है।
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इंदिरा गांधी नहर परियोजना पश्चिमी राजस्थान की जीवनरेखा कही गई है; इसके उद्देश्यों में सिंचाई, पेयजल, सूखा-रोधीकरण, पर्यावरण सुधार, वनीकरण, रोजगार सृजन और पुनर्वास शामिल हैं।
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इंदिरा गांधी नहर प्रणाली हरिके बैराज से शुरू होती है; आधिकारिक लंबाई विभाजन 204 किमी फीडर और 445 किमी मुख्य नहर है, इसलिए 649 किमी पूरी प्रणाली की लंबाई है, केवल मुख्य नहर की नहीं।
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इंदिरा गांधी नहर परियोजना में 16.17 लाख हेक्टेयर सीसीए में सिंचाई सुविधा दी गई है, जबकि चौधरी कुंभाराम आर्य लिफ्ट योजना के अंतर्गत अतिरिक्त 0.10 लाख हेक्टेयर के लिए 6 नई नहरों का निर्माण जारी है।
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राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2025-26 में एकीकृत संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल/ईआरसीपी ढाँचा 17 जिलों में पेयजल उपलब्धता, 2.51 लाख हेक्टेयर नए सिंचाई क्षेत्र और 1.52 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षेत्र की बहाली से जुड़ा है।
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बंजर भूमि और सूखा-प्रवण क्षेत्र विकास को जलग्रहण कार्य, जल-संचयन, चारागाह सुधार, सूक्ष्म सिंचाई, नहर पुनः अस्तरीकरण, निकास और भूजल संरक्षण से जोड़कर पढ़ना चाहिए।
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पाठ्यक्रम का ढाँचा: सिंचाई, नदी-घाटी और सूखा-प्रवण क्षेत्र
आरएसएसबी सीईटी स्नातक 2026 में यह विषय राजस्थान की अर्थव्यवस्था के अंतर्गत इसी पाठ्यक्रम बिंदु में आता है: "सिंचाई और नदी-घाटी परियोजनाएँ, बंजर भूमि तथा सूखा-प्रवण क्षेत्र विकास परियोजनाएँ"। इसलिए इसे केवल नहरों की सूची की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। पानी की परियोजनाओं को कृषि, पेयजल, क्षेत्रीय असंतुलन, सूखा राहत, बंजर भूमि सुधार और ग्रामीण आजीविका से जोड़ना जरूरी है।
राजस्थान की अर्थव्यवस्था पानी की मूल कमी से प्रभावित है। राज्य का बड़ा हिस्सा शुष्क और अर्ध-शुष्क है, जबकि भरोसेमंद सतही जल समान रूप से उपलब्ध नहीं है। पश्चिमी राजस्थान में वर्षा कम, मिट्टी रेतीली और कई नदियाँ मौसमी हैं। पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में नदी-प्रवाह, तालाब, बांध और नहर कमांड अपेक्षाकृत अधिक मिलते हैं। इसी अंतर के कारण सिंचाई कृषि के साथ-साथ बसावट, सूखा राहत, पशुपालन, पेयजल और क्षेत्रीय विकास का भी विषय बन जाती है।
सीईटी के लिए स्रोतों को नहर, बांध, तालाब, कुआँ, नलकूप, लिफ्ट योजना, जलग्रहण कार्य और सूक्ष्म सिंचाई में बाँटकर पढ़ें। नहरें वहाँ अधिक उपयोगी हैं जहाँ स्थानीय बेसिन के बाहर से या बड़े बैराज से नदी-जल लाया जा सकता है। बांध नदी-घाटियों में मानसूनी जल रोकते हैं। तालाब, एनीकट, खेत-तलाई और जोहड़ स्थानीय बहाव को सँभालते हैं। कुएँ और नलकूप आज भी महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अति-दोहन ने कई क्षेत्रों में भूजल संकट बढ़ाया है।
मुख्य बात: राजस्थान में सिंचाई केवल खेत की लागत नहीं, क्षेत्रीय संतुलन का साधन भी है।
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