मुख्य तथ्य

  • स्नातक स्तर की परीक्षा में भारत की अर्थव्यवस्था का यह भाग नियोजन, राष्ट्रीय आय, बजट, बैंकिंग, लोक वित्त, जीएसटी, राजकोषीय और मौद्रिक नीतियां, सब्सिडी,...
  • पंचवर्षीय योजनाएं 1951 में शुरू हुईं; योजना आयोग 1950 में बना था।
  • बजट और लोक वित्त में सरकार की प्राप्तियां, व्यय, घाटा, ऋण, कर और कल्याण-प्राथमिकताएं आती हैं;
  • राजकोषीय नीति कर, सार्वजनिक व्यय, उधारी और सब्सिडी से काम करती है, जबकि मौद्रिक नीति रेपो दर, नकदी और आरक्षित अनुपात जैसे साधनों से महंगाई और ऋण-स्थित...
  • कृषि, उद्योग, सेवा और व्यापार को उत्पादकता, रोजगार, महंगाई, ऋण, लॉजिस्टिक्स, बाजार पहुंच, तकनीक और समावेशन जैसे वर्तमान मुद्दों से जोड़कर पढ़ना चाहिए।

मुख्य बिंदु

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    स्नातक स्तर की परीक्षा में भारत की अर्थव्यवस्था का यह भाग नियोजन, राष्ट्रीय आय, बजट, बैंकिंग, लोक वित्त, जीएसटी, राजकोषीय और मौद्रिक नीतियां, सब्सिडी, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, ई-कॉमर्स, क्षेत्रीय मुद्दे, क्रांतियां, सुधार और उदारीकरण को साथ पढ़ाता है।

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    पंचवर्षीय योजनाएं 1951 में शुरू हुईं; योजना आयोग 1950 में बना था। 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग की जगह नीति आयोग बना, जिसका जोर नीति-सलाह, निगरानी और सहकारी संघवाद पर है।

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    बजट और लोक वित्त में सरकार की प्राप्तियां, व्यय, घाटा, ऋण, कर और कल्याण-प्राथमिकताएं आती हैं; बैंकिंग और मौद्रिक नीति ऋण, महंगाई और निवेश को प्रभावित करती हैं।

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    राजकोषीय नीति कर, सार्वजनिक व्यय, उधारी और सब्सिडी से काम करती है, जबकि मौद्रिक नीति रेपो दर, नकदी और आरक्षित अनुपात जैसे साधनों से महंगाई और ऋण-स्थितियों को संभालती है।

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    कृषि, उद्योग, सेवा और व्यापार को उत्पादकता, रोजगार, महंगाई, ऋण, लॉजिस्टिक्स, बाजार पहुंच, तकनीक और समावेशन जैसे वर्तमान मुद्दों से जोड़कर पढ़ना चाहिए।

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    हरित, श्वेत और नीली क्रांतियां कृषि, दुग्ध और मत्स्य क्षेत्र के लिए परीक्षा के स्थायी आधार हैं, लेकिन उनकी सीमाएं और क्षेत्रीय असमानता भी उतनी ही जरूरी है।

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    जीएसटी 1 जुलाई 2017 से गंतव्य-आधारित अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था के रूप में लागू हुआ; दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता 2016 ने समयबद्ध समाधान ढांचा दिया; पीएलआई 14 रणनीतिक क्षेत्रों में उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन देती है और इसका सत्यापित वर्तमान प्रोत्साहन परिव्यय ₹1.91 लाख करोड़ है।

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    परीक्षा उत्तर में हर सुधार को उसकी समस्या से जोड़ें: कर एकीकरण के लिए जीएसटी, दबावग्रस्त परिसंपत्तियों के लिए आईबीसी, किसान आय के लिए पीएम-किसान, बाजार पहुंच के लिए ई-नाम, विनिर्माण पैमाने के लिए पीएलआई और लॉजिस्टिक्स तालमेल के लिए गति शक्ति।

नियोजन व्यवस्था: पंचवर्षीय योजनाओं से नीति आयोग तक

भारत में आर्थिक नियोजन स्वतंत्रता के बाद सीमित संसाधनों, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और सार्वजनिक निवेश को व्यवस्थित करने का तरीका था। योजना आयोग 15 मार्च 1950 को बना और प्रथम पंचवर्षीय योजना 1951 में शुरू हुई। प्रथम योजना में कृषि, सिंचाई, खाद्य सुरक्षा, सामुदायिक विकास और पुनर्वास को प्राथमिकता मिली, क्योंकि देश खाद्यान्न कमी और विभाजन के दबाव से जूझ रहा था। द्वितीय पंचवर्षीय योजना, जिसे पी.सी. महालनोबिस से जोड़ा जाता है, भारी उद्योग, पूंजीगत वस्तुओं, इस्पात, मशीन निर्माण और सार्वजनिक क्षेत्र के निवेश की ओर मुड़ी। बाद की योजनाओं में आत्मनिर्भरता, गरीबी-निवारण, रोजगार, उदारीकरण, अवसंरचना और समावेशी वृद्धि जैसे लक्ष्य जुड़े।

नियोजन व्यवस्था ने बांधों, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों, कृषि अनुसंधान और सामाजिक कार्यक्रमों को आधार दिया, लेकिन समय के साथ यह केंद्रीकृत आवंटन और योजना-आकार की खींचतान से भी जुड़ गई। बारहवीं पंचवर्षीय योजना के बाद योजना आयोग की जगह नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया, यानी नीति आयोग ने ली। नीति आयोग 1 जनवरी 2015 को बना। इसका अध्यक्ष प्रधानमंत्री होता है और शासी परिषद में राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल होते हैं। योजना आयोग की तरह यह राज्यों को योजना-धन आवंटित नहीं करता; इसका काम नीति-सलाह, निगरानी, सहकारी संघवाद, प्रतिस्पर्धी संघवाद और संकेतक-आधारित समीक्षा है।

परीक्षा के लिए मुख्य फर्क यह है कि 2015 के बाद नियोजन खत्म नहीं हुआ, बल्कि उसका रूप बदला। भारत तय योजना-व्यय से लक्ष्य, डैशबोर्ड, राज्य-रैंकिंग, दीर्घकालीन दृष्टि-पत्र, एसडीजी निगरानी और क्रियान्वयन समीक्षा की ओर आया। आज नियोजन का अर्थ एक केंद्रीय योजना दस्तावेज से अधिक, केंद्र, राज्यों, बाजार और कल्याण कार्यक्रमों को मापने योग्य विकास-लक्ष्यों से जोड़ना है।

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