राजस्थान में पंचायती राज और नगरीय स्वशासन
मुख्य तथ्य
- अनुच्छेद 40 ने ग्राम पंचायतों को नीति-निदेशक तत्वों में रखा, जबकि 73वें संविधान संशोधन ने बाद में पंचायतों को भाग 9 और 11वीं अनुसूची के माध्यम से संवै...
- 24 अप्रैल 1993 को 73वाँ संविधान संशोधन प्रभावी हुआ; इससे भाग 9, अनुच्छेद 243 से 243O और 11वीं अनुसूची पंचायतों के लिए जोड़ी गई।
- 1 जून 1993 को 74वाँ संविधान संशोधन प्रभावी हुआ; इससे भाग 9क, अनुच्छेद 243P से 243ZG और 12वीं अनुसूची नगर निकायों के लिए जोड़ी गई।
- राजस्थान का ऐतिहासिक महत्व इस बात से जुड़ा है कि त्रि-स्तरीय पंचायती राज का औपचारिक आरंभ 2 अक्टूबर 1959 को नागौर से माना जाता है, बाद में 1990 के दशक...
- राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद की ग्रामीण स्थानीय-शासन व्यवस्था को राज्य-कानूनी आधार देता है।
मुख्य बिंदु
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CET स्नातक तैयारी में राजस्थान की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर स्थानीय स्वशासन और पंचायती राज पढ़े जाते हैं, इसलिए यह विषय परीक्षा के लिए प्रासंगिक है।
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अनुच्छेद 40 ने ग्राम पंचायतों को नीति-निदेशक तत्वों में रखा, जबकि 73वें संविधान संशोधन ने बाद में पंचायतों को भाग 9 और 11वीं अनुसूची के माध्यम से संवैधानिक ढाँचा दिया।
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24 अप्रैल 1993 को 73वाँ संविधान संशोधन प्रभावी हुआ; इससे भाग 9, अनुच्छेद 243 से 243O और 11वीं अनुसूची पंचायतों के लिए जोड़ी गई।
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1 जून 1993 को 74वाँ संविधान संशोधन प्रभावी हुआ; इससे भाग 9क, अनुच्छेद 243P से 243ZG और 12वीं अनुसूची नगर निकायों के लिए जोड़ी गई।
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राजस्थान का ऐतिहासिक महत्व इस बात से जुड़ा है कि त्रि-स्तरीय पंचायती राज का औपचारिक आरंभ 2 अक्टूबर 1959 को नागौर से माना जाता है, बाद में 1990 के दशक में मिले संवैधानिक दर्जे से पहले।
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राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद की ग्रामीण स्थानीय-शासन व्यवस्था को राज्य-कानूनी आधार देता है।
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राजस्थान में पेसा का कार्यान्वयन पंचायती राज मंत्रालय द्वारा सूचीबद्ध अनुसूचित क्षेत्र संबंधी राज्य प्रावधानों से जुड़ता है, जिनमें 1999 का संशोधन अधिनियम और 2011 के नियम शामिल हैं।
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राजस्थान नगर पालिका अधिनियम, 2009 राज्य के नगर निगम, नगर परिषद और नगरपालिका बोर्ड जैसे शहरी स्थानीय निकायों का मुख्य विधिक आधार है।
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राज्य निर्वाचन आयोग, राज्य वित्त आयोग और जिला योजना समिति स्थानीय स्वशासन को चुनाव, धन और जिला-स्तरीय योजना से जोड़ते हैं।
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संवैधानिक आधार और राजस्थान की पृष्ठभूमि
स्थानीय स्वशासन का अर्थ है कि गाँव और शहर के रोजमर्रा के सार्वजनिक कामों में स्थानीय लोगों की चुनी हुई संस्थाएँ भूमिका निभाएँ। CET स्नातक तैयारी में यह विषय राजस्थान की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर पढ़ा जाता है: राज्यपाल, मुख्यमंत्री, राज्य विधानसभा, उच्च न्यायालय, राजस्थान लोक सेवा आयोग, जिला प्रशासन, राज्य मानवाधिकार आयोग, लोकायुक्त, राज्य निर्वाचन आयोग, राज्य वित्त आयोग, राज्य सूचना आयोग, स्थानीय स्वशासन और पंचायती राज। इसलिए यह स्नातक-स्तर प्रश्नपत्र के लिए प्रासंगिक विषय है।
नीति-निदेशक तत्वों का अनुच्छेद 40 राज्य से कहता है कि वह ग्राम पंचायतों का संगठन करे और उन्हें स्वशासन की इकाई के रूप में काम करने लायक शक्तियाँ और अधिकार दे। राजस्थान का इस विषय में विशेष ऐतिहासिक स्थान है, क्योंकि बलवंतराय मेहता समिति की लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण वाली सोच के बाद 2 अक्टूबर 1959 को नागौर में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का औपचारिक उद्घाटन हुआ। इसे बाद के संविधान संशोधनों से अलग याद रखना चाहिए: 1959 राजस्थान से जुड़ी ऐतिहासिक शुरुआत है, जबकि 1993 पंचायतों और नगर निकायों की संवैधानिक मजबूती का चरण है।
परीक्षा-बिंदु: स्थानीय निकाय स्वतंत्र संप्रभु सरकारें नहीं हैं। वे संविधान, राज्य-कानून, वित्तीय व्यवस्था, चुनाव, अंकेक्षण और राज्य की निगरानी के अधीन स्वशासन की संस्थाएँ हैं।
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