मुख्य तथ्य

  • संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई; उद्देश्य प्रस्ताव 13 दिसंबर 1946 को रखा गया और 22 जनवरी 1947 को स्वीकार हुआ।
  • प्रारूप समिति 29 अगस्त 1947 को बनी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर उसके अध्यक्ष थे;
  • अनुच्छेद 1 भारत, अर्थात इंडिया, को राज्यों का संघ बताता है और भारत के क्षेत्र को राज्यों, संघ राज्य क्षेत्रों तथा अर्जित किए गए अन्य क्षेत्रों के रूप...
  • अनुच्छेद 2 से 4 संसद को राज्यों के प्रवेश, स्थापना, गठन और बदलाव की रूपरेखा देते हैं;
  • अनुच्छेद 5 से 11 प्रारंभिक नागरिकता और नागरिकता पर संसद की शक्ति से जुड़े हैं;

मुख्य बिंदु

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    वर्तमान CET स्नातक पाठ्यक्रम में संविधान सभा, डॉ. बी.आर. आंबेडकर की भूमिका, संविधान की प्रकृति और विशेषताएं, प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, नीति निदेशक तत्व, संघीय ढांचा, संशोधन, आपातकालीन प्रावधान और लोकहित याचिका स्पष्ट रूप से शामिल हैं।

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    संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई; उद्देश्य प्रस्ताव 13 दिसंबर 1946 को रखा गया और 22 जनवरी 1947 को स्वीकार हुआ।

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    प्रारूप समिति 29 अगस्त 1947 को बनी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर उसके अध्यक्ष थे; संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ और उसका अधिकांश भाग 26 जनवरी 1950 से लागू हुआ।

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    प्रस्तावना भारत को संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बताती है और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता का वादा करती है।

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    अनुच्छेद 1 भारत, अर्थात इंडिया, को राज्यों का संघ बताता है और भारत के क्षेत्र को राज्यों, संघ राज्य क्षेत्रों तथा अर्जित किए गए अन्य क्षेत्रों के रूप में समझाता है।

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    अनुच्छेद 2 से 4 संसद को राज्यों के प्रवेश, स्थापना, गठन और बदलाव की रूपरेखा देते हैं; अनुच्छेद 3 में प्रभावित राज्य विधानमंडल से राय लेना जरूरी है, पर वह अंतिम रोक नहीं है।

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    अनुच्छेद 5 से 11 प्रारंभिक नागरिकता और नागरिकता पर संसद की शक्ति से जुड़े हैं; 1955 का नागरिकता अधिनियम बाद की नागरिकता प्राप्ति और समाप्ति को चलाता है।

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    संविधान लिखित सर्वोच्चता, संसदीय शासन, मजबूत केंद्र वाला संघीय ढांचा, एकल नागरिकता, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, न्यायिक समीक्षा, मौलिक अधिकार, नीति निदेशक तत्व और मूल कर्तव्य को साथ लेकर चलता है।

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    42वें संशोधन ने प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता जोड़े तथा अनुच्छेद 51क के जरिए मूल कर्तव्य जोड़े; 86वें संशोधन ने बाद में बच्चे की शिक्षा से जुड़ा कर्तव्य जोड़ा।

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    केशवानंद भारती ने संशोधन शक्ति पर मूल संरचना की सीमा रखी; एस.आर. बोम्मई ने पंथनिरपेक्षता को मूल विशेषता माना और अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग को न्यायिक समीक्षा के दायरे में रखा।

प्रस्तावना: संविधान की पहचान और दिशा

प्रस्तावना संविधान की सार्वजनिक पहचान और नैतिक दिशा बताती है। इसमें भारत को संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य कहा गया है और राज्य को न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता की दिशा दी गई है। CET में हर शब्द को उसके संवैधानिक अर्थ में पढ़ना चाहिए। संप्रभु का अर्थ है कि भारत किसी बाहरी शक्ति के कानूनी अधीन नहीं है। लोकतांत्रिक शासन चुनाव, प्रतिनिधित्व और जनता के प्रति जवाबदेही पर चलता है। गणराज्य का अर्थ है कि राज्य का प्रमुख वंशानुगत नहीं होता। न्याय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक है; स्वतंत्रता विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना से जुड़ी है; समानता प्रतिष्ठा और अवसर दोनों की है; बंधुता व्यक्ति की गरिमा को राष्ट्रीय एकता और अखंडता से जोड़ती है।

प्रस्तावना व्याख्या में भी सहायक है। यह संविधान के मूल्यों को समझाती है, लेकिन ऐसा स्वतंत्र अनुच्छेद नहीं है जिसके आधार पर सीधे रिट दायर की जाए। बेरुबारी संघ मत में इसे संविधान का भाग नहीं माना गया था। बाद में केशवानंद भारती में इसे संविधान का भाग माना गया, फिर भी यह अपने-आप लागू होने वाला अलग अधिकार-स्रोत नहीं बनी। परीक्षा का मुख्य फंदा 42वां संशोधन है: इसी ने प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता जोड़े, 44वें संशोधन ने नहीं।

याद रखें: प्रस्तावना संवैधानिक मूल्य देती है; लागू होने वाली शक्तियां और उपचार सामान्यतः आगे के अनुच्छेदों से आते हैं।

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