संविधान, अधिकार, नीति-तत्व, कर्तव्य और राजस्थान राजनीति
मुख्य तथ्य
- संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ; इसके अधिकांश प्रावधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुए।
- भाग 3 में मूल अधिकार हैं; अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय को उनके प्रवर्तन की रिट शक्ति देता है, जबकि अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को व्यापक रिट क्षेत्राध...
- भाग 4 में नीति-निदेशक तत्व हैं; अनुच्छेद 37 उन्हें न्यायालय से सीधे लागू न होने पर भी शासन में मूलभूत मानता है।
- 42वें संशोधन ने अनुच्छेद 51ए में 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े; 86वें संशोधन ने अनुच्छेद 21ए और अनुच्छेद 51ए(ट) में शिक्षा-कर्तव्य जोड़ा, जो 1 अप्रैल 2010 से...
- राजस्थान राजनीति में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, 200 सीटों वाली विधानसभा, राजस्थान उच्च न्यायालय, राजस्थान लोक सेवा आयोग, जिला प्रशासन, राज्य निर्वाचन आयोग...
मुख्य बिंदु
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यह फाइल CET स्नातक-स्तर के 'राजस्थान के विशेष संदर्भ में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था' खंड के अंतर्गत है: संविधान सभा, डॉ. बी.आर. आंबेडकर, संविधान की विशेषताएं, प्रस्तावना, मूल अधिकार, नीति-निदेशक तत्व, संघीय ढांचा, संशोधन, आपात उपबंध और जनहित याचिका।
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संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ; इसके अधिकांश प्रावधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुए।
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भाग 3 में मूल अधिकार हैं; अनुच्छेद 32 उच्चतम न्यायालय को उनके प्रवर्तन की रिट शक्ति देता है, जबकि अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को व्यापक रिट क्षेत्राधिकार देता है।
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भाग 4 में नीति-निदेशक तत्व हैं; अनुच्छेद 37 उन्हें न्यायालय से सीधे लागू न होने पर भी शासन में मूलभूत मानता है।
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केशवानंद भारती ने संविधान संशोधन पर मूल संरचना की सीमा तय की; मिनर्वा मिल्स ने मूल अधिकारों और नीति-निदेशक तत्वों के सामंजस्य को महत्त्व दिया।
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42वें संशोधन ने अनुच्छेद 51ए में 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े; 86वें संशोधन ने अनुच्छेद 21ए और अनुच्छेद 51ए(ट) में शिक्षा-कर्तव्य जोड़ा, जो 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ।
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राजस्थान राजनीति में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, 200 सीटों वाली विधानसभा, राजस्थान उच्च न्यायालय, राजस्थान लोक सेवा आयोग, जिला प्रशासन, राज्य निर्वाचन आयोग, राज्य वित्त आयोग, राज्य सूचना आयोग, स्थानीय स्वशासन और पंचायती राज पढ़ना जरूरी है।
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संवैधानिक ढांचा और पाठ्यक्रम-सीमा
यह विषय CET स्नातक-स्तर के पाठ्यक्रम के इसी खंड में आता है: संविधान सभा; संविधान-निर्माण में डॉ. बी.आर. आंबेडकर की भूमिका; भारतीय संविधान की प्रकृति और विशेषताएं; प्रस्तावना; मूल अधिकार; राज्य के नीति-निदेशक तत्व; संघीय ढांचा; संविधान संशोधन; आपात उपबंध; और जनहित याचिका। इसी खंड से आगे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संसद, उच्चतम न्यायालय और राजस्थान की संस्थाएं भी जुड़ती हैं। इसलिए इसे शक्ति, अधिकार, जवाबदेही और राजस्थान प्रशासन के नक्शे के रूप में पढ़ना चाहिए।
संविधान 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत हुआ। इसके अधिकांश प्रावधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुए, जिसे गणतंत्र दिवस के रूप में याद किया जाता है। प्रस्तावना भारत को संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बताती है और न्याय, स्वतंत्रता, समानता तथा बंधुता को मार्गदर्शक मूल्य बनाती है। प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. आंबेडकर थे; परीक्षा में उनका महत्व केवल नाम याद रखने तक सीमित नहीं है। उनकी संवैधानिक सोच राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र, विधि के समक्ष समानता और संस्थागत सुरक्षा से जोड़ती है।
CET के लिए संविधान को तीन परतों में पढ़ना सबसे सुरक्षित है: प्रस्तावना के मूल्य, भाग 3 के प्रवर्तनीय अधिकार और सरकार को जवाबदेह बनाने वाली संस्थाएं। कोई अनुच्छेद तभी उपयोगी बनता है जब आप यह जोड़ सकें कि शक्ति किसके पास है, सीमा क्या है और दुरुपयोग की समीक्षा कौन कर सकता है।
सार: यह स्नातक-स्तर के पाठ्यक्रम के दायरे में आने वाला राजनीति-विज्ञान विषय है; संविधान को मूल्य, लागू नियम और जवाबदेह संस्थाओं के संयुक्त ढांचे के रूप में पढ़ें।
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