मुख्य तथ्य

  • 20वीं पशुधन गणना 2019 में राजस्थान का कुल पशुधन लगभग 5.68 करोड़ दर्ज हुआ और कुल पशुधन में यह उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर रहा;
  • राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2023-24 में कृषि और संबद्ध GSVA के भीतर पशुधन का हिस्सा 48.58% और फसल क्षेत्र का हिस्सा 44.53% अनुमानित है;
  • याद रखने योग्य संस्थागत बिंदु हैं: 19.02.2015 को सूरतगढ़ से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का शुभारंभ, 13 मई 2010 से RAJUVAS बीकानेर, 1962 से CSWRI अविकान...

मुख्य बिंदु

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    वर्तमान CET स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम में राजस्थान की अर्थव्यवस्था के अंतर्गत खाद्य व वाणिज्यिक फसलें, सिंचाई और नदी-घाटी परियोजनाएँ, उद्योग, कल्याणकारी योजनाएँ, सहकारिता, छोटे उद्यम, वित्तीय संस्थाएँ, पंचायती राज और MGNREGA स्पष्ट रूप से शामिल हैं।

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    राजस्थान का फसल-नक्शा वर्षा, मिट्टी और सिंचाई से तय होता है: बाजरा, मोठ, मूंग और ग्वार सूखी खरीफ पट्टी में ठीक बैठते हैं, जबकि गेहूँ, सरसों और चना रबी की नमी और सिंचाई से अधिक जुड़े हैं।

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    राजस्थान की आधिकारिक कृषि सांख्यिकी बाजरा को खरीफ की प्रमुख खाद्यान्न फसल और गेहूँ को रबी की प्रमुख खाद्यान्न फसल बताती है; तिलहन, रेशा, तंबाकू, रंग और चारा मुख्य गैर-खाद्य फसल समूह बनाते हैं।

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    राजस्थान सरकार की निवेश सामग्री राज्य को मोठ, पोषक अनाज, सरसों, बाजरा, ग्वार गम, मसालों, ईसबगोल, औषधीय-सुगंधित फसलों और मोटी ऊन में प्रथम स्थान पर बताती है।

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    20वीं पशुधन गणना 2019 में राजस्थान का कुल पशुधन लगभग 5.68 करोड़ दर्ज हुआ और कुल पशुधन में यह उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर रहा; बकरी और ऊँट राज्य की शुष्क अर्थव्यवस्था में विशेष महत्त्व रखते हैं।

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    राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2023-24 में कृषि और संबद्ध GSVA के भीतर पशुधन का हिस्सा 48.58% और फसल क्षेत्र का हिस्सा 44.53% अनुमानित है; पशुधन उत्पादों में दूध मूल्य के आधार पर सबसे प्रमुख है।

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    याद रखने योग्य संस्थागत बिंदु हैं: 19.02.2015 को सूरतगढ़ से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का शुभारंभ, 13 मई 2010 से RAJUVAS बीकानेर, 1962 से CSWRI अविकानगर, 1984 से NRCC बीकानेर और 1977 से RCDF/सरस।

पाठ्यक्रम-संबंध और कृषि का आधार

यह विषय CET स्नातक स्तर के पाठ्यक्रम में राजस्थान की अर्थव्यवस्था वाले भाग से सीधे जुड़ता है, खासकर राजस्थान की खाद्य और वाणिज्यिक फसलें, सिंचाई और नदी-घाटी परियोजनाएँ, उद्योग, सहकारी आंदोलन, छोटे उद्यम, वित्तीय संस्थाएँ और ग्रामीण विकास में पंचायती राज संस्थाओं की भूमिका। यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के उस बिंदु से भी जुड़ता है जिसमें राजस्थान के विशेष संदर्भ में कृषि, बागवानी, वानिकी और पशुपालन शामिल हैं। इसलिए परीक्षा में कृषि को केवल बिखरी हुई सामान्य ज्ञान सूची की तरह नहीं, बल्कि आर्थिक-भूगोल के विषय की तरह पढ़ना चाहिए।

राजस्थान की कृषि वर्षा, मिट्टी, सिंचाई और बाजार तक पहुँच से तय होती है। पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी जिलों में वर्षा कम और अनिश्चित रहती है, इसलिए सूखी खेती, चारा प्रबंधन और पशुपालन का सहारा महत्त्वपूर्ण हो जाता है। नहर-आधारित और पूर्वी जिलों में रबी खेती अधिक मजबूत हो सकती है। दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में कई जगह अपेक्षाकृत अधिक वर्षा तथा काली मिट्टी या पठारी दशाएँ मिलती हैं, इसलिए मक्का, सोयाबीन, धनिया जैसी फसलें शुष्क पश्चिम की तुलना में अधिक स्वाभाविक लगती हैं।

परीक्षा के लिए सुरक्षित तरीका यह है: पहले ऋतु पहचानें, फिर पानी का स्रोत, फिर फसल पट्टी। बाजरा, ग्वार या मोठ का प्रश्न अक्सर सूखी खेती की ओर ले जाता है; गेहूँ, सरसों या चना रबी की नमी और सिंचाई से जुड़ते हैं; और पशुधन का प्रश्न ऐसे राज्य में जोखिम-प्रबंधन से जुड़ता है जहाँ खेती जलवायु पर बहुत निर्भर है।

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