मुख्य तथ्य

  • जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्ययोजना में राजस्थान की औसत वार्षिक वर्षा लगभग 570 मिमी दी गई है और अधिकतर वर्षा जून-सितंबर के ग्रीष्म मानसून से मिलती है।
  • 19 मई 2016 को IMD ने फलोदी में 51.0 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया; यह राजस्थान की तीखी ग्रीष्म गर्मी का संकेत है।
  • 19 फरवरी 2015 को मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना राजस्थान के सूरतगढ़ से राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुई; इससे मृदा-जाँच और संतुलित उर्वरक सलाह को बढ़ावा मिला।
  • भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार राजस्थान का वन आवरण 16,548.21 वर्ग किमी, यानी गणना किए गए क्षेत्र का 4.84% है।

मुख्य बिंदु

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    CET स्नातक पाठ्यक्रम में राजस्थान भूगोल के तहत जलवायु दशाएँ, मिट्टियाँ, प्राकृतिक वनस्पति, वन्यजीव और अभयारण्य जैसे विषय शामिल हैं; इसलिए यह विषय पाठ्यक्रम के अंदर है।

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    राजस्थान की जलवायु को पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की वर्षा-ढाल से समझें: पश्चिमी राजस्थान शुष्क-अर्ध-शुष्क है, जबकि पूर्वी और दक्षिणी राजस्थान में अर्ध-शुष्क, उप-आर्द्र और आर्द्र क्षेत्र मिलते हैं।

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    जलवायु परिवर्तन पर राज्य कार्ययोजना में राजस्थान की औसत वार्षिक वर्षा लगभग 570 मिमी दी गई है और अधिकतर वर्षा जून-सितंबर के ग्रीष्म मानसून से मिलती है।

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    19 मई 2016 को IMD ने फलोदी में 51.0 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया; यह राजस्थान की तीखी ग्रीष्म गर्मी का संकेत है।

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    19 फरवरी 2015 को मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना राजस्थान के सूरतगढ़ से राष्ट्रीय स्तर पर शुरू हुई; इससे मृदा-जाँच और संतुलित उर्वरक सलाह को बढ़ावा मिला।

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    भारतीय वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार राजस्थान का वन आवरण 16,548.21 वर्ग किमी, यानी गणना किए गए क्षेत्र का 4.84% है।

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    केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान पुनरावृत्ति के लिए उपयोगी है, क्योंकि इसका रामसर और यूनेस्को दर्जा राजस्थान की वनस्पति, आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी और संरक्षण को जोड़ता है।

पाठ्यक्रम से जुड़ी भौतिक पृष्ठभूमि

यह विषय CET स्नातक स्तर के राजस्थान भूगोल खंड के अंदर है, क्योंकि वर्तमान RSSB पाठ्यक्रम में भूगर्भिक संरचना और भौतिक विभाजन, जलवायु दशाएँ और प्रदेश, मिट्टियाँ, प्राकृतिक वनस्पति, वन्यजीव-अभयारण्य और जल-संरक्षण जैसे विषय दिए गए हैं। इसलिए जलवायु, मिट्टी और वनस्पति को अलग-अलग सूची की तरह नहीं, बल्कि एक ही मानचित्र पर पढ़ें। अरावली, थार मरुस्थल, पूर्वी मैदान और दक्षिण-पूर्वी पठारी क्षेत्र इस पूरे अध्याय की बुनियादी पृष्ठभूमि बनाते हैं।

अरावली के पश्चिम में वर्षा कम, दैनिक ताप-अंतर अधिक, रेतीली और लवणीय प्रवृत्तियाँ अधिक तथा वनस्पति मुख्यतः कंटीली झाड़ी या घासभूमि के रूप में मिलती है। अरावली के पूर्व और दक्षिण-पूर्व में वर्षा तथा नदी-क्रिया अधिक प्रभावी है, इसलिए जलोढ़, काली, लाल और वनीय मिट्टियाँ, खेती की सघनता और शुष्क पर्णपाती वनस्पति अधिक स्पष्ट दिखती हैं।

CET के लिए जिलों को संकेत की तरह याद करें। जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर शुष्क मरुस्थलीय पट्टी की ओर संकेत करते हैं। जयपुर, अलवर, भरतपुर और दौसा अर्ध-शुष्क से उप-आर्द्र संक्रमण दिखाते हैं। कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ हाड़ौती, काली मिट्टी और अपेक्षाकृत मजबूत मानसून प्रभाव से जुड़ते हैं। उदयपुर, सिरोही, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ पहाड़ी और अपेक्षाकृत अधिक वर्षा वाले दक्षिणी राजस्थान से जुड़े हैं।

मुख्य पकड़: राजस्थान को केवल मरुस्थल न मानें। पश्चिम और उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर नमी, मिट्टी की गहराई और वनस्पति के प्रकार में स्पष्ट क्षेत्रीय बदलाव दिखता है।

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