राजस्थान का अपवाह तंत्र: नदियाँ और झीलें
मुख्य तथ्य
- 1960: CWC के बड़े बाँधों के राष्ट्रीय रजिस्टर में चंबल पर गांधी सागर बाँध का पूरा होने का वर्ष 1960 दिया है;
- 1970: CWC राणा प्रताप सागर को चंबल पर 1970 में पूरा बाँध बताता है;
- 1972: CWC के बड़े बाँधों के राष्ट्रीय रजिस्टर में चंबल पर जवाहर सागर बाँध का पूरा होने का वर्ष 1972 दिया है।
- 1999: CWC बीसलपुर बाँध को बनास नदी पर 1999 में पूरा बताता है; यह टोंक, जयपुर और अजमेर से जुड़ी सिंचाई तथा पेयजल योजना में बनास का व्यावहारिक संकेत है।
- केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान और सांभर झील राजस्थान के पुराने रामसर संकेत हैं: राष्ट्रीय आर्द्रभूमि पोर्टल की आधिकारिक रामसर सूची केवलादेव की तारीख 1...
मुख्य बिंदु
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1960: CWC के बड़े बाँधों के राष्ट्रीय रजिस्टर में चंबल पर गांधी सागर बाँध का पूरा होने का वर्ष 1960 दिया है; मंदसौर जिले के आधिकारिक पेज पर भी नवंबर 1960 से बिजली उत्पादन और वितरण शुरू होने का उल्लेख है।
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1970: CWC राणा प्रताप सागर को चंबल पर 1970 में पूरा बाँध बताता है; CET में इसे रावतभाटा/चित्तौड़गढ़, चंबल बाँध-श्रृंखला और जलविद्युत-सिंचाई उपयोग से जोड़कर पढ़ें।
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1972: CWC के बड़े बाँधों के राष्ट्रीय रजिस्टर में चंबल पर जवाहर सागर बाँध का पूरा होने का वर्ष 1972 दिया है।
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1999: CWC बीसलपुर बाँध को बनास नदी पर 1999 में पूरा बताता है; यह टोंक, जयपुर और अजमेर से जुड़ी सिंचाई तथा पेयजल योजना में बनास का व्यावहारिक संकेत है।
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केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान और सांभर झील राजस्थान के पुराने रामसर संकेत हैं: राष्ट्रीय आर्द्रभूमि पोर्टल की आधिकारिक रामसर सूची केवलादेव की तारीख 1 अक्टूबर 1981, क्षेत्र 2873 हेक्टेयर, और सांभर की तारीख 23 मार्च 1990, क्षेत्र 24000 हेक्टेयर, देती है।
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राष्ट्रीय आर्द्रभूमि पोर्टल की 21 अप्रैल 2026 तक अद्यतन आधिकारिक रामसर सूची के अनुसार राजस्थान में पाँच रामसर स्थल हैं: केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान, सांभर झील, मेनार आर्द्रभूमि परिसर, खीचन आर्द्रभूमि और सिलीसेढ़ झील।
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2024-2025: PIB के अनुसार संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल लिंक, ERCP के साथ, 28 जनवरी 2024 के समझौता ज्ञापन और 5 दिसंबर 2024 के समझौता करार तक पहुँचा; इससे पूर्वी राजस्थान की जल-योजना चंबल तंत्र से जुड़ी रहती है।
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तालाब और जल-संरक्षण विधियाँ इसी पाठ्यक्रम बिंदु का हिस्सा हैं: जोहड़, नाड़ी, तालाब, टांका, कुंड, बावड़ी, खड़ीन, एनीकट, रिसाव तालाब, चेक डैम और खेत-तालाब को राजस्थान की कम वर्षा और स्थानीय ढाल के साथ पढ़ना चाहिए।
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अरावली जलविभाजक और अपवाह की मूल रचना
राजस्थान की नदियों को समझने की शुरुआत अरावली से करनी चाहिए। अरावली श्रेणी राज्य में मोटे तौर पर दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की दिशा में फैली है और मुख्य जलविभाजक की तरह काम करती है। इसके पूर्व और दक्षिण-पूर्व की नदियाँ सामान्यतः चंबल-यमुना-गंगा तंत्र से जुड़कर बंगाल की खाड़ी की ओर जाती हैं। दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम में माही, साबरमती तथा लूनी-सम्बद्ध प्रवाह अरब सागर की दिशा से जुड़ते हैं। उत्तर-पश्चिम और मरुस्थलीय भागों में कई धाराएँ समुद्र तक नहीं पहुँचतीं; वे रेत, बंद अवसाद, खारे मैदान या मौसमी झीलों में समाप्त हो जाती हैं।
CET स्नातक स्तर पर यह तीन-भागी ढाँचा सबसे उपयोगी है। चंबल, बनास, काली सिंध, पार्वती, बनगंगा, गंभीर और मेज पूर्वी अपवाह की तस्वीर बनाते हैं। लूनी, माही, साबरमती और पश्चिमी बनास दक्षिण-पश्चिमी तथा पश्चिमी ढाल को समझाते हैं। घग्घर, कांतली, साबी, सोता-रूपारेल और मरुस्थलीय नदी-क्षेत्र आंतरिक अपवाह की पहचान देते हैं। सांभर, डीडवाना, पचपदरा और लूणकरणसर जैसी झीलें भी इसी बंद या कमजोर अपवाह वाली भौगोलिक रचना से जुड़ी हैं।
मुख्य पकड़: पहले प्रवाह की दिशा पहचानें, फिर उसी से नदी, जिला, बाँध और झील का मिलान करें।
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